मेरे बाबा का समय


एक पोते की स्मृति और अपना ही भविष्य टटोलने की कोशिश।

मैं छोटा था। चार साल का। बब्बा एक लाठी लिए, धोती-बंडी पहने स्कूल को निकलते थे। पास के गांव शम्भू के पूरा में प्राइमरी के हेड मास्टर थे। बच्चे बहुत डरते थे। बड़े भी उन्हें आते देख पगडंडी से नीचे उतर जाते थे। अपने बाबा पर मुझे गर्व भी था और उनसे डर भी बहुत लगता था।

अब उनके जाने के चालीस साल बाद उनके बारे में सोचता हूं तो बहुत कुछ उमड़ता-घुमड़ता है मन में। सबसे ज्यादा तो उनके जीवन की सादगी और उनकी दिनचर्या पर ध्यान जाता है।

आजकल दुनिया लंबी उम्र के नुस्ख़े खोज रही है। कोई उपवास की घड़ी बाँध रहा है, कोई कैलोरी गिन रहा है, कोई सप्लीमेंट की शीशियाँ सजा रहा है। इन सबको देखते हुए मुझे बार-बार अपने बाबा की याद आती है। वे इन शब्दों से अपरिचित थे। उन्हें “टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग”, “सर्कैडियन रिद्म” या “लॉन्गेविटी” जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था। वे बस अपना जीवन जीते थे। और ऐसा जीते थे कि सत्तासी वर्ष की आयु तक पहुँच कर गए।

हर एकादशी को वे अलोना खाते थे। किस उम्र से यह करना शुरू किया, वह बताने वाला अब कोई नहीं। मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने अपने जीवन में कितनी एकादशियाँ अलोना कीं। शायद हजारों। पर यह जरूर था कि उसमें कोई प्रदर्शन नहीं था, कोई धार्मिक आडंबर भी नहीं। जैसे साँस लेना स्वाभाविक है, वैसे ही वह व्रत भी उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।

उनके दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले हो जाती थी। गाँव अभी नींद में होता और वे दिन का स्वागत करने निकल पड़ते। पहला भोजन लगभग नौ-दस बजे होता। उसके बाद खेत, मेड़, रास्ते, लोग, मौसम या प्राइमरी स्कूल—सब उनके दिन के साथी थे। भोजन के बाद थोड़ी-सी झपकी। शाम ढलते-ढलते घर वापसी। रात का भोजन एक-दो रोटियों का होता, जिन्हें वे दूध में मींजकर खा लेते। उससे अधिक की उन्हें न आवश्यकता थी, न इच्छा। आठ-नौ बजे तक उनका दिन समाप्त हो जाता।

भोजन दिन में दो बार होता था। यदा कदा चना-चबैना होता रहा होगा, जिसकी मुझे स्मृति नहीं है।

उन्होंने कभी व्यायाम नहीं किया। कोई वजन नहीं उठाया, कोई मुगदर नहीं भांजा। उस अर्थ में कतई नहीं, जिसमें आज हम व्यायाम समझते हैं।

उनका व्यायाम खेत तक जाने वाली पगडंडी थी। उनका जिम गाँव की मेड़ें थीं। उनके ट्रेडमिल की जगह कच्ची सड़क थी, जिस पर वे अस्सी वर्ष पार कर जाने के बाद भी रोज़ बारह-पंद्रह किलोमीटर चल लेते थे। शरीर दुबला था, लेकिन दुर्बल नहीं। उसमें सहज श्रम की कमाई थी, प्रदर्शन की नहीं।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उन्होंने भोजन नहीं नापा, भूख को पहचाना। उन्होंने कैलोरी नहीं गिनी, श्रम किया। उनके पास घड़ी नहीं थी। दालान से बाहर निकल, आसमान में सूरज निहार कर वे कह देते थे—दो बज गए हैं। उन्होंने नींद का ऐप नहीं लगाया, अँधेरा होते ही सो गए। उन्होंने स्वास्थ्य की चिंता नहीं की; जीवन जिया। शायद स्वास्थ्य उसी का एक उपफल था।

पर यदि कोई मुझसे पूछे कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति क्या थी, तो मैं खेतों का नाम नहीं लूँगा।

मैं कहूँगा—उनकी जिज्ञासा।

जीवन के अंतिम वर्ष में उनकी आँखें धुँधला चुकी थीं। पढ़ना कठिन हो गया था पर उनके भीतर शिक्षक का अनुशासन कमजोर नहीं हुआ था। उन्होंने मेरे द्वारा उन्हें ला कर दी के. एम. मुंशी का “लोपामुद्रा” पचासी-छियासी की उम्र में पूरी पढ़ी।

मुझे उन्हें चारपाई पर बैठे, सिर किताब में गड़ाये पन्ने दर पन्ने पढ़ते हुये का दृश्य आज भी विस्मित करता है। शरीर थक सकता है, आँखें कमज़ोर हो सकती हैं, लेकिन यदि मन अभी भी किसी पुस्तक के अगले पन्ने तक पहुँचना चाहता है, तो मनुष्य वास्तव में बूढ़ा नहीं हुआ है।

अंतिम महीनों में उम्र ने उनपर अपना अधिकार जताया। कुछ मतिभ्रम हुआ, पैरों ने जवाब देना शुरू किया, एक सर्दी और कफ़ ने उन्हें बिस्तर पर रोक लिया। लेकिन इससे पहले उन्होंने अपने हिस्से का जीवन पूरा जी लिया था। ऐसा नहीं लगता कि मृत्यु ने उन्हें बीच रास्ते से उठाया। लगता है जैसे उन्होंने अपना काम पूरा किया और फिर चुपचाप चले गए।

मेरे पर-बाबा भी पचासी वर्ष से अधिक जिए थे। उनकी पत्नी – मेरी बुढ़िया आइया – भी उनके कुछ वर्ष बाद तक रहीं। इसलिए कभी-कभी सोचता हूँ—क्या यह विरासत रक्त में थी या जीवन-पद्धति में? शायद दोनों में। पर यदि मुझे किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं जीवन-पद्धति को चुनूँगा। क्योंकि वही विरासत हर पीढ़ी को फिर से अर्जित करनी पड़ती है।

अब मैं जब साइकिल लेकर गाँव की सड़क पर निकलता हूँ, खेतों की ओर देखता हूँ, किसी पेड़ की नई पत्ती पर ठिठक जाता हूँ, या घर लौटकर कोई पुस्तक खोल लेता हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि मैं केवल अपना दिन नहीं जी रहा। मेरे भीतर कहीं बाबा का जीवन-अनुशासन भी चल रहा है।

समय बदल गया है। अब हमारी थाली बदल गई है, हमारा काम बदल गया है, हमारी रातें कृत्रिम रोशनी से भर गई हैं। लेकिन कुछ बातें अभी भी बचाई जा सकती हैं—सादा भोजन, नियमित दिनचर्या, चलते रहने की आदत, और जीवन के अंतिम पड़ाव तक जिज्ञासु बने रहने की ललक।

शायद दीर्घजीविता का सबसे बड़ा रहस्य वर्षों की गिनती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि जीवन के कितने वर्षों तक मनुष्य का औत्सुक्य कायम रहता है।

बाबा ने मुझे यही सिखाया। बिना कभी सिखाने की कोशिश किए। बिना कभी कहे। कहा तो शायद उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं। उनके द्वारा मेरी प्रशंसा भी मुझे किसी और के बताने पर ही पता चली।

बाबा को याद करते-करते मैं अनायास अपना हिसाब लगाने लगता हूँ।

वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे।

वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे। मैं अब साइकिल चलाता हूँ। वे पैदल चलते थे, मैं पैडल भरता हूँ। वे लोपामुद्रा पढ़ते थे, मैं किंडल पर किताबें पढ़ता हूँ। वे लालटेन के समय के आदमी थे, मैं इंटरनेट के समय का।

हमारे बीच आधी सदी से ज्यादा का फ़ासला है, पर कुछ बातें अब भी एक-सी हैं—सुबह जल्दी उठने की इच्छा, दिन भर कुछ करते रहने की बेचैनी, और यह विश्वास कि मनुष्य को आख़िरी साँस तक जिज्ञासु बने रहना चाहिए।

फिर भी मैं उनसे पीछे हूँ। काफी पीछे।

मुझे मधुमेह है। घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस है। गर्मी में हाँथ का बेना नहीं, एयर कंडीशनर चाहिए। सर्दी में अलाव की बजाय हीटर का सहारा लेना पड़ता है। सप्ताह में दो रातें ऐसी आती हैं जब नींद रूठ जाती है। मेरा शरीर उनके शरीर जैसा सहज नहीं रहा।

कभी-कभी लगता है कि मैंने विज्ञान तो बहुत पा लिया, पर शरीर की वह सादगी खो दी, जो उन्हें बिना जाने मिली थी।

फिर अपने ही विचार पर मायूस सा मुस्कुरा देता हूँ। आखिर हर पीढ़ी को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है। अपने काल-समय के अनुसार।

बाबा की लड़ाई अभाव, मलेरिया, अकाल और कठिन श्रम से थी। एक बार सियार ने काट लिया तो रेबीज़ के इलाज के लिए उन्हें कसौली तक जाना पड़ा। मेरी लड़ाई मधुमेह, बैठकर काम करने की आदत और चौबीस घंटे जगती हुई दुनिया से है।

इसलिए मेरा उद्देश्य बाबा जैसा बनना नहीं है। वह संभव भी नहीं। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि जब मेरी उम्र सत्तासी वर्ष हो, तब भी नियमित, हर सुबह साइकिल निकालने का मन करे, कोई नई किताब मुझे पुकारे, और किसी पौधे की नई पत्ती देखकर मैं ठिठक जाऊँ।

यदि ऐसा हुआ, तो समझूँगा कि मैंने बाबा से मिली विरासत का कुछ हिस्सा बचा लिया। और सतासी से जितना ज्यादा जिया, वह बोनस ही माना जाएगा!

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The World Is Wrinkled — थॉमस फ्रीडमैन की पुस्तक पर सीक्वेल 


फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।

थॉमस फ्रीडमैन का ताजा लेख है न्यूयॉर्क टाइम्स में – Everybody Is a Loser in This Middle East War. वह लेख पढ़ा। 

फिर उनकी पुरानी पुस्तक The World Is Flat निकाल ली।

उसे उलटते-पलटते एक प्रश्न मन में आया…  क्या आज भी दुनिया उतनी ही सपाट है जितनी बीस वर्ष पहले दिखाई देती थी?

कुछ वर्ष पहले तक मैं दुनिया को समझने के लिए नक्शे देखता था। अब कभी-कभी लोगों की दिनचर्या देखता हूँ।

गांव में बैठा हूँ, पर सोच कभी विरार की लोकल ट्रेन में चली जाती है, कभी बंगलूरू के किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के शयनकक्ष में और कभी पुणे की टैक्सी में बैठे उस बिहारी युवक तक पहुँच जाती है जो मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है। 

सोचता हूँ—  मुंबई के विरार में रहने वाला एक युवक रोज़ चर्चगेट तक आने-जाने में तीन घंटे खर्च करता है। उसका मोबाइल उसे दुनिया भर की खबरें दे सकता है, लेकिन घर पहुँचने में फिर भी डेढ़ घंटा लगता है।

बंगलूरू का एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात के दो बजे फ़ोन उठाता है। शिकागो में बैठा उसका सहकर्मी किसी समस्या में फँसा है। तकनीक ने दोनों को लगभग एक ही कमरे में ला दिया है, लेकिन समय-क्षेत्र अब उसके शयनकक्ष तक पहुँच गया है।

पुणे में टैक्सी चलाने वाला बिहार का एक युवक मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है। उसे उम्मीद है कि किसी दिन कोई जर्मन पर्यटक उसे पूरे भारत के भ्रमण के लिए नियुक्त कर सकता है। वह पुणे की सड़कों पर गाड़ी चला रहा है, बिहार में अपनी पत्नी को महीने का खर्च चलाने के लिये पैसे भेजने हैं, पर उसके सपनों का एक हिस्सा यूरोप में घूम रहा है।

इन लोगों में कोई समानता नहीं दिखती। फिर भी मुझे लगता है कि ये सब एक ही कहानी के पात्र हैं।

बीस वर्ष पहले थॉमस फ्रीडमैन ने “The World Is Flat”लिखी थी। उनका तर्क था कि तकनीक, इंटरनेट और वैश्वीकरण दुनिया को समतल बना रहे हैं। दूरी का महत्व घटेगा। प्रतिभा को अधिक अवसर मिलेंगे। दुनिया का एक कोना दूसरे कोने से अधिक आसानी से जुड़ सकेगा।

उस भविष्यवाणी में काफी सच्चाई थी।

मैं आज पूर्वांचल के एक गाँव में बैठकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बातचीत कर सकता हूँ। मेरी नातिन सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन लगभग प्रतिदिन मेरे साथ पढ़ती है। दुनिया के किसी विश्वविद्यालय में हुई चर्चा का सार कुछ मिनटों में मेरे सामने आ सकता है। यह सब फ्रीडमैन की सपाट होती दुनिया का ही हिस्सा है।

लेकिन मुझे लगता है कि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।

दुनिया सपाट नहीं हुई। दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गईं।

जब कपड़ा मेज़ पर फैला होता है तो उसकी सतह सरल होती है। लेकिन जब वही कपड़ा सिकुड़ता है या मोड़ा जाता है, तो दूर-दूर के हिस्से अचानक पास आ जाते हैं और पास के हिस्से दूर हो जाते हैं। मुझे आज की दुनिया कुछ ऐसी ही लगती है।

बंगलूरू और शिकागो पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उसी प्रक्रिया में किसी इंजीनियर की रात और दिन के बीच की दूरी बढ़ गई है।

जर्मनी और पुणे पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उस टैक्सी चालक के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है—उसे केवल सड़कें नहीं, भाषाएँ भी सीखनी हैं।

मैं अपने गाँव में बैठकर दुनिया से जुड़ सकता हूँ। लेकिन उसी समय मेरे आसपास ऐसे लोग भी हैं जिनकी दुनिया केवल मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक सीमित होती जा रही है।

दूरी समाप्त नहीं हुई है। दूरी का स्वरूप बदल गया है।

कभी दूरी किलोमीटर में मापी जाती थी। अब वह ध्यान, कौशल, भाषा और नेटवर्क में भी मापी जाती है।

एआई ने इस परिवर्तन को और तीव्र कर दिया है।

इसके समर्थक कहते हैं कि अब हर व्यक्ति के पास एक निजी शिक्षक, निजी शोध-सहायक और निजी सलाहकार होगा। यह बात काफी हद तक सही है। मैं स्वयं इसका लाभ उठाता हूँ। लेकिन मैं एक दूसरी संभावना भी देखता हूँ। हर व्यक्ति के पास अब एक निजी भ्रम-निर्माता, निजी मनोरंजन मशीन और निजी प्रतिध्वनि-कक्ष भी हो सकता है।

तकनीक दोनों भूमिकाएँ निभाने में सक्षम है।

समस्या मशीन में नहीं है। समस्या यह तय करने में है कि हम उससे क्या करवाना चाहते हैं।

हमने लंबे समय तक सूचना की कमी को समस्या माना था। अब सूचना की अधिकता समस्या बनती जा रही है। पहले ज्ञान तक पहुँचना कठिन था। अब ज्ञान और शोर को अलग करना कठिन हो गया है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि भविष्य की सबसे दुर्लभ वस्तु तेल, डेटा या बिजली नहीं होगी। वह होगी—अविभाजित ध्यान। एकाग्रता। फोकस। 

जिस व्यक्ति के पास किसी विषय पर लगातार दो घंटे सोचने की क्षमता बची होगी, वही वास्तव में संपन्न माना जाएगा।

फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।

हर नई तकनीक कुछ नई क्षमताएँ देती है। लेकिन वह कुछ पुरानी क्षमताओं को अनावश्यक भी बना सकती है। ट्रैक्टर ने खेती को अधिक उत्पादक बनाया, लेकिन अधिकांश लोगों से बैलों के साथ खेत जोतने की क्षमता छीन ली। जीपीएस ने रास्ता ढूँढना आसान किया, लेकिन दिशाबोध को कमज़ोर किया। एआई हमारे लिए लिख सकता है, पढ़ सकता है, सार बना सकता है, तर्क कर सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि वह क्या कर सकता है। प्रश्न यह है कि उसके उपयोग के बाद हम क्या करना बंद कर देंगे। हमारी कौन-कौन सी क्षमताएँ कुंद हो जायेंगी। 

प्रगति का प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम कितनी दूर और कितनी तेजी से जा सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि यदि वाहन रुक जाए तो क्या हम अभी भी चल सकते हैं। बिना जीपीएस के अपना गंतव्य तलाश सकते हैं? 

यहीं आकर मुझे झुर्रियों का रूपक एक और अर्थ देता है।

दुनिया सपाट नहीं हुई। दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गईं।

शुरू में मुझे लगता था कि झुर्रियाँ वृद्धावस्था का संकेत हैं। लेकिन बाद में मैंने सोचा कि वे हमेशा उम्र का संकेत नहीं होतीं। मनुष्य के चेहरे पर भी झुर्रियाँ तब अधिक दिखाई देती हैं जब वह थका हुआ हो, पर्याप्त नींद न ले पाया हो, शरीर पर तनाव अधिक हो। अच्छी नींद, थोड़ी सैर, साफ़ हवा और संतुलित दिनचर्या के बाद वही चेहरा कहीं अधिक तरोताज़ा दिखाई दे सकता है।

शायद सभ्यताओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।

संभव है कि हमारी सभ्यता बूढ़ी नहीं हुई है। संभव है कि वह केवल थकी हुई हो।

पिछले तीन दशकों में हमने वैश्वीकरण, इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया और अब एआई जैसी क्रांतियों को लगभग बिना रुके आत्मसात किया है। हमने अपने ऊपर बहुत कुछ एक साथ लाद लिया है। शायद हमें प्रगति रोकने की आवश्यकता नहीं है। शायद हमें उसे पचाने की आवश्यकता है।

शायद हमें और अधिक सूचना नहीं, बल्कि बेहतर छनाई चाहिए। और अधिक संपर्क नहीं, बल्कि अधिक अर्थपूर्ण संपर्क चाहिए। और अधिक गति नहीं, बल्कि बीच-बीच में ठहरकर यह देखने की आवश्यकता है कि हम जा कहाँ रहे हैं।

मैं यह नहीं कहूँगा कि दुनिया टूट रही है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि दुनिया सपाट हो रही है।

मैं केवल इतना कहूँगा कि दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गई हैं।

और झुर्रियाँ हमेशा पतन का संकेत नहीं होतीं।

कभी-कभी वे केवल यह बताती हैं कि शरीर या सभ्यता को थोड़ा विश्राम, थोड़ा संतुलन और थोड़ा आत्मनिरीक्षण चाहिए।

वैश्वीकरण ने दुनिया को जोड़ा। एआई ने उसे और कसकर मोड़ दिया। अब चुनौती जुड़ने की नहीं, उन झुर्रियों के बीच अपना संतुलन बनाए रखने की है।

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मानसून ने चुपचाप हाजिरी लगा दी


पूरे जून भर बादल आते रहे, अनमने से। बरसने का उनका कोई इरादा नहीं था। भदोही जिले में तो जून के अंत तक लगभग 99 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज हुई। धान की नर्सरियाँ प्रतीक्षा में सूखने लगी थीं और किसान आसमान को कुछ अधिक देर तक देखने लगे थे। मौसम विभाग के अनुमान हर घंटे अपने कहे से पलटते रहे, पर बादल मानो अपनी ही मर्जी पर अड़े थे।

ऐसे में मानसून आया भी तो वैसे नहीं, जैसा देखता आया हूं। उसका आगमन किसी विजयी सेना जैसा होता था। पहले हवा चलती, फिर काले बादल उमड़ते, बिजली चमकती, गरज सुनाई देती और उसके बाद झमाझम वर्षा। मौसम का एप्प देखे बिना ही अहसास हो जाता था कि धरती के अधरों पर पहला मेघ झरने जा रहा है।

कल दोपहर मैं विश्राम के बाद स्ट्रेचिंग का व्यायाम कर रहा था। उमस थी तो बाहर क्या हो रहा है, वह झांकने का ध्यान ही नहीं आया। तभी पत्नीजी ने आकर कहा, “आज चाय बाहर पोर्टिको में पी जाए। बारिश हो रही है, मौसम अच्छा हो गया है।”

मैं बाहर आया तो सचमुच बारिश हो रही थी। इतनी चुपचाप कि उसके आने का पता ही नहीं चला। हवा बिल्कुल नहीं थी। पानी धीरे-धीरे गिर रहा था और धरती बिना किसी हड़बड़ी के उसे अपने भीतर समेटे जा रही थी। कहीं बहाव नहीं, कहीं उफान नहीं। बस, आकाश, पेड़ों और मिट्टी के बीच एक शांत संवाद हो रहा था।

तभी मन में आया—यह मानसून तो बिल्ली की तरह दबे पाँव घर में घुस आया है। शायद यह उपमा घर में घूमती उस बिल्ली से आई होगी जो कब किसी कबूतर के लिये दुबक कर बैठ जाती है, पता ही नहीं चलता।

एक और शरारती विचार आया। कहीं मानसून को भी मेरी तरह ऑस्टियोआर्थराइटिस तो नहीं हो गया? पहले वह दौड़ता हुआ आता था, अब जैसे लाठी टेकता हुआ चलता है। जो मानसूनी व्यवहार पहले असामान्य लगता था, वही अब सामान्य होने लगा है।

चाय लेकर बैठा तो सामने अपना बगीचा था। दस वर्ष पहले यह नहीं था। खेत था। कुछ खरपतवार थी, और कुछ नहीं। घर बनना शुरू हुआ तो उसके साथ पेड़ भी लगाने लगे हम —नीम, छितवन, आम, चीकू, अमरूद, नींबू, सागौन, शमी और तुलसी। पेड़ लगाने का सुख यह है कि आदमी अपने भविष्य का भी थोड़ा-सा रोपण कर देता है।

इस साल की इस पहली बारिश में सबसे अधिक प्रसन्न श्रावणी दिखाई दी। गुलाबी फूलों से लदी उसकी डालियाँ झुक गई थीं। लगा जैसे वह वर्षा का स्वागत नहीं, उसका अभिवादन कर रही हो। फूल नमस्कार की मुद्रा में थे।

सवेरे धूप निकलने पर अरुणा कपड़े धोकर बगीचे की रस्सियों पर डाल गई थी। शाम को लौटकर आती तो उतार लेती। पर मानसून ने दबे पांव अतिथि की तरह आकर धोखा दे दिया। कपड़े सूखने के बजाय भीग गए। बाहर निकला तो एक क्षण को लगा कि दौड़कर उतार लूँ। फिर लगा कि अब उसका कोई अर्थ नहीं है।

भीगे कपड़ों को देखकर बचपन याद आया। तब बारिश का मतलब ही भीगना होता था। कोई जल्दी नहीं होती थी। अब भीग जाने पर पहले कपड़े बदलने का विचार आता है। एलर्जी और छींकें याद आ जाती हैं।

मानसून का पहला दिन
मानसून का पहला दिन

उम्र आनंद नहीं छीनती, केवल उसकी शर्तें बदल देती है।

इसी बीच अमेजन का डिलीवरी करने वाला युवक पार्सल लेकर आया। बारिश के कारण अपनी मोटरसाइकिल कार के शेड में खड़ा कर वहीं रुक गया। पत्नीजी ने उसे भीतर बुला लिया। वह कुछ झिझकता हुआ आया। समझ नहीं पा रहा था कि जूते उतारे या नहीं। चाय के लिए भी उसने पहले मना किया, लेकिन उसके चेहरे से लग रहा था कि गरम चाय उसे अच्छी लगेगी।

पहला घूँट पीते ही उसका संकोच टूट गया। फिर उसने कप चाय दोनों हाथों से थाम लिया और अपनी कहानी शुरू कर दी। बनारस के पुराने मोहल्ले का जायसवाल परिवार। पुश्तैनी मकान का विवाद। सीधे-सादे पिता, जो भदोही आकर बस गए। जुझारू बेटा, जिसने अपना हिस्सा लेने के लिए मारपीट भी झेली और मुकदमा भी। पहले ऑटो चलाता था। अब अमेजन की डिलीवरी करता है। रोज पचास से अधिक पार्सल पहुँचाता है और लगभग तीस किलोमीटर के दायरे में घूमते-घूमते शाम को एक हजार रुपये के आसपास कमाकर घर लौटता है।

आश्चर्य मुझे उस युवक की कहानी पर नहीं, अपने ऊपर हुआ। मैं बहुत धैर्यवान श्रोता नहीं हूँ। अगर उसी समय कोई फोन आ गया होता, कोई मिलने आ गया होता या कोई और काम निकल आया होता, तो शायद मैं उठ खड़ा होता। लेकिन न कोई व्यवधान आया, न मैं उठा। वह बोलता गया और मैं सुनता रहा। बीच-बीच में मन में यह भी आया कि अब बात पूरी होनी चाहिए, लेकिन फिर लगा कि उसे आज कह लेने दीजिए। शायद उसे भी उस दिन जल्दी नहीं थी। बारिश ने उसकी दौड़ भी रोक दी थी और मेरी भी।

उसके जाने के बाद मैंने महसूस किया कि गिग इकॉनॉमी के बारे में मेरी धारणा थोड़ी बदल गई है। पहले उसमें केवल कठिनाई और असुरक्षा दिखाई देती थी। कल पहली बार उसमें श्रम का स्वाभिमान भी दिखाई दिया। मेहनत बहुत है, लेकिन वह किसी के सामने हाथ फैलाकर नहीं, अपने श्रम से घर चला रहा है। हर व्यवस्था का मूल्यांकन दूर से नहीं किया जा सकता; कभी-कभी एक कप चाय और आधे घंटे की बातचीत भी हमारी राय बदल देती है।

सोचता हूँ, नौकरी में होता तो यह बातचीत शायद पाँच मिनट भी न चलती। तब समय हमेशा किसी और का होता था। अब समय मेरा है। शायद इसी कारण अब लोगों की बातें सुनने का अवसर मिलता है। कौन जाने, वह युवक किसी दिन किसी कहानी या उपन्यास में एक छोटे-से पात्र के रूप में फिर सामने आ जाए। लेखक पात्र नहीं गढ़ता, उन्हें रास्ते में बटोरता चलता है। हर मौसम में — मानसून की किचिर पिचिर में भी!

शाम ढलने लगी थी। बारिश अब भी उसी मंथर गति से गिर रही थी। उसे देखते-देखते अचानक पिताजी याद आ गए। बुढ़ापे में उनके हाथ काँपते थे। एक चेक पर हस्ताक्षर करने में चार-पाँच चेक खराब हो जाते थे। हर हस्ताक्षर धीरे-धीरे बनता था, जैसे हाथ पहले रुकता हो, फिर आगे बढ़ता हो।

बारिश अब भी उतनी ही धीमी थी। लगा, जैसे कोई वृद्ध काँपते हाथों से रजिस्टर में अपनी हाजिरी दर्ज कर रहा हो। उसने कोई घोषणा नहीं की, बस बता गया कि वह आ चुका है।

आषाढ़ का पहला दिन था। कालिदास होते तो शायद “आषाढस्य प्रथमदिवसे…” से मेघदूत रच देते। मेरे हिस्से में बस बरामदे की एक कुर्सी, चाय का कप, भीगे कपड़े, एक अमेज़न वाला युवक और अपने पिता के काँपते हुए हस्ताक्षर आए। मुझे लगता है, फिलहाल यही मेरा मेघदूत है।

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