कोविड19 और रोजमर्रा की जिंदगी – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट


रीता पाण्डेय ने आज लिखा –


मेरे भाई और उसके मित्र के बीच फोन पर वार्तालाप –

मित्र – बॉस, बड़ी मुश्किल से पुलीस वालों से बचकर घर लौट पाया।

भाई – कहाँ गया था बे?

“गांव गया था बॉस, वहां से छ सात लिटर दूध ले कर आया।”

“अबे, गधे, दूध तो यहांं भी मिलता है।”

“सच कहूं तो बॉस, यहां दो कमरे के फ्लैट में पड़े पड़े दिमाग खराब हो गया था; सोचा थोड़ा हवा-पानी बदल लूं; गांव में।”

रोजी रोटी के लिये जूझते लोग शहर जाने को कब तक रोक पायेंगे?

बात वैसे हंसी-मजाक की है; पर गहराई में देखा जाये तो यह त्रासदी भी है। आखिर बंद घरों-कमरों में टेलीविजन के सहारे कितना वक्ख्त गुजरेगा? शहर के घर खासतौर पर वे जहां एक छोटे कमरे में 5-6 लोग शिफ्टवाइज रहते थे और काम पर जाते थे। अपने परिवार से दूर, रोजीरोटी के लिये मशक्कत की जिंदगी बिताते, झोंपड़पट्टी या चाल में रहते लोग नित्य नर्क का दर्शन करते हैं।

मुम्बई की झोंपड़पट्टी। चित्र नेट से लिया गया।

कमोबेश हर बड़े शहर में झोंपड़पट्टी होती है और उसमें अपने रिश्तेदार या परिचितों के जरीये साल दर साल लोग आते, बढ़ते जा रहे हैं। गोरखपुर और बनारस के स्टेशनों पर मैने यह भीड़ देखी है जो मुम्बई, अहमदाबाद, सूरत, पंजाब जाने के लिये प्लेटफार्मों पर पड़ी रहती है। कुटीर उद्योंगो को नष्ट कर पहले अंग्रेजों ने और अब आधुनिक अर्थव्यवस्था ने जो चोट निम्न मध्यवर्ग और निम्न वर्ग को पन्हुचाई है; उसे आजादी के बाद कोई सरकार खतम या कम नहीं कर पाई।

मेरे देखते देखते पूर्वांचल के इलाके के कई चीनी मिल बंद हो गये। किसी पारिवारिक परिचित से सुना था कि औराई चीनी मिल में गन्ने की सप्लाई कर सीजन में वे दो लाख कमा लेते थे। गोरखपुर का खाद का कारखाना अगर योगीजी की सरकार फिर चालू करा दें और वह सतत चलने लायक रहे तो यह इलाके की बड़ी सेवा होगी। वर्ना इस इलाके में दूर दूर तक कोई कल कारखाना नजर नहीं आता और नया लगने की आस भी नजर नहीं आती।

आखिर, अगर च्वाइस देखी जाये तो खाने कमाने के लिये कोई व्यक्ति अपने घर से दूर नहीं जाना चाहता। अपने परिवार के साथ रहना चाहता है। खुली हवा में सांस लेना चाहता है। भले ही पगार थोड़ी कम मिले।

पता नहीं कोरोनावायरस का यह काल खतम होने पर कुछ हालात बदलेंगे या नहीं। लोगों को घर के आसपास रोजगार मिलना शुरू होगा या नहीं…।


कोविड19 और आत्मनिर्भरता – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट


आजकल घर का काम निपटा कर मेरी पत्नीजी कागज कलम उठा कुछ न कुछ रोज लिख रही हैं। जितना काम – घर की साफ सफाई, पौधों की देखभाल, कपड़े धोना, प्रेस करना आदि – पहले करती थीं, उससे दुगना कर रही हैं। पर उसके बावजूद भी आधा घण्टा समय निकाल कर एक – डेढ़ पेज लिख रही हैं। मेरा काम उसे टाइप कर ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट के रूप में प्रस्तुत करना हो गया है!

उनकी पोस्ट प्रस्तुत है –


“अपना हाथ, जगन्नाथ” कहावत है। अपने हाथ, अपने परिवार पर भरोसा भारतीय समाज का मुख्य अंग हुआ करता था। घर के काम घर के लोग आपस में मिलबांट कर किया करते थे। गांव में तो यह अब भी दिखता है।

चिन्ना पांड़े बर्तन पोंछ कर रखती हुई

समय के साथ लोग नौकरियों पर निर्भर होते गये। तमाम काम मशीनों ने ले लिया। रसोई का बहुत सा काम मशीनों से होने लगा।

बचपन में देखा था पड़ोस के परिवार को। गांव में एक बूढ़ी नानी हुआ करती थीं। उनकी बहू कभी पेट दर्द की शिकायत करती तो बूढ़ी नानी कहतीं – पांच सेर गेंहू जांत (हाथ चक्की) से पीस लो; पेट दर्द अपने आप खतम हो जायेगा।

मेरी नानी कहा करती थीं कि सूर्योदय से पहले अपना आंगन बुहार देना चाहिये। इससे लक्ष्मी मईया प्रसन्न होती हैँ। आज की पीढ़ी के लिये शायद ये मजाक की बात लगती होगी।

सामान्यत: अपने हाथ से घर का काम करने की प्रवृत्ति खतम होती गयी। उससे मोटापा बढ़ा और मोटापे के साथ आयीं सौ बीमारियाँ।

ज्ञान दत्त पाण्डेय चाय बनाते हुए। वैसे रसोई का काम मुख्यत: बहू (बबिता) सम्भालती है।

धन्यवाद प्रधानमंत्री जी को दिया जाये या कोविड19 के भय को; हर व्यक्ति घर में कुछ न कुछ काम करना सीख गया है। मेरे घर में सब काम में लगे हैं। लड़का मटर छीलता है, सामान रखता-रखाता है। पति चाय बना लेते हैं। बिस्तर भी समेटते-सहेज लेते हैं। बहू पोती को पढ़ाती है और रसोईं का अधिकतर काम सम्भालती है। यहां तक की छ साल की पोती – चीनी भी बर्तन रखने में मेरी सहायता करती है।

कई तरह के वीडियो वायरल हो रहे हैं। बाईयाँ आ नहीं रही हैं तो फिल्मी हीरोइनेँ भी अपने घर में झाड़ू लगा रही हैं। बीस-इक्कीस दिन का लॉकडाउन बहुत सी आदतें बदल देगा; बहुत कुछ सिखा जायेगा।

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय मटर छीलते हुए

झूला


यह बेंत का बना झूला करीब डेढ़ दशक पुराना है। बरेली से खरीदा हुआ। उस समय मैं इज़्ज़त नगर गया था रेलवे की ड्यूटी पर और वहीं से खरीद कर साथ लेता आया था। इसकी कड़ी गोरखपुर के रेलवे स्टाफ ने कहीं से अरेंज कर दी। उसके बाद यह हमारे ड्राइंग रूम या बरामदे का अभिन्न अंग बन गया। रिटायरमेंट के बाद यह गांव के इस घर का अंग बन गया है।

झूला

सोचने की प्रक्रिया को यह उत्प्रेरित करता है। इसपर बैठ कर धीरे धीरे हिलते हुए मन में विचार बहुत गहरे से उठते हैं। देर तक ठहरते हैं। मन चंचल नहीं रहता। मानसिक हलचल मंद बयार में हिलती लहरों की तरह होती है।

गुड़िया (नाम चितवन) आई थी मुंबई से। वह वहां डाक्टर है। सफल। मुझसे बीस साल छोटी होगी। मुंबई के किसी प्राइम लोकेशन पर उसका अच्छा फ्लैट है। पर वह शहरी स्नॉब नहीं है। बहुत प्रिय व्यक्तित्व है उसका।

मेरा मकान देख कर गुड़िया बहुत प्रभावित और प्रसन्न थी। अपने भाई से बोली – बगल के (उसके पिता के खेत में) एक ऐसा ही बंगला बनना चाहिए। और उसमें “ऐसा झूला इज़ ए मस्ट”।

पोर्टीको, जिसमें झूला लगा है।

झूले की मरम्मत पर हम ध्यान देते हैं। उसकी पॉलिश नियमित की जाती है। उसकी सुतली कसी जाती है। डस्टिंग पर नियमित रहा जाता है।

गांव की जिन्दगी में कुछ ही चीजें हैं, जिनमें सेंस ऑफ प्राइड है मेरा। मेरी साइकिल और मेरा झूला उसमें से प्रमुख हैं।

Design a site like this with WordPress.com
Get started