गोधर कोलियरी – अण्डरग्राउण्ड खदान


खदान दिखाने वाले नन्दकुमार दास (बांये) और अजित।
खदान दिखाने वाले नन्दकुमार दास (बांये) और अजित।

धनबाद के पास स्टेशन है कुसुण्डा। वहां कई कोयला खदानें हैं। ओपन-कास्ट भी और अण्डरग्राउण्ड भी। मैं वहां खदान देखने नहीं, रेलवे के वैगनों में लदान देखने गया था। पिछले तीन चार दिन तेज बारिश होती रही थी। खनन का काम बहुत नहीं हो पाया था। इस लिये लदान का काम धीमा था। बहुत जगह साइडिंग में रेलवे के रेक थे, पर पर्याप्त मात्रा में कोयला नहीं था। मौसम खुला रहने पर एक दो दिन में खनन और लदान का काम तेजी पकड़ेगा।

गोधर कोलियरी के बाहर का दृष्य। ट्रॉली की पटरी और कोयले का भण्डार दिख रहा है।
गोधर कोलियरी के बाहर का दृष्य। ट्रॉली की पटरी और कोयले का भण्डार दिख रहा है।

लदान का काम देखने को  नहीं था, तो मैने आस पास की कोयला खदान को देखने की ओर अपने को मोड़ा। कुसुण्डा के पास यह थी – गोधर कोलियरी।

गोधर कोलियरी का प्रवेश।
गोधर कोलियरी का प्रवेश।

इस अण्डरग्राउण्ड कोलियरी के बाहर काफ़ी कोयला था। बचपन से छोटे वैगनों में खदान से कोयला निकालने के लिये बिछी रेल-पटरी का चित्र हम देखते आये हैं। वे ट्रॉली/वैगन और रेल की पटरी दिखाई दे रही थी। मैं उन्ही का चित्र ले रहा था। कुछ खदान श्रमिक खदान में जा रहे थे। एक श्रमिक नें मेरे साथ सहायक ऑपरेटिंग मैनेजर और टी.आई. साहब से पता किया कि हम रेलवे से हैं। फिर उसने मुझे निमन्त्रण दिया – अन्दर आ कर देखिये न!

उस श्रमिक से बाद में मैने नाम पूछा। बताया नन्दकुमार दास। उनके साथ पीली कमीज पहने दूसरे सज्जन भी थे। अजित। इन दोनों ने हमें खदान दिखाई।


खदान देखने में मेरे साथ थे –

श्री सन्दीप कुमार, धनबाद रेल मण्डल के सहायक परिचालन प्रबंधक और श्री संजीव कुमार झा, यातायात निरीक्षक, धनबाद रेल मण्डल। सन्दीप मोतिहारी के रहने वाले हैं और इस समय धनबाद रेलवे स्टेशन के स्टेशन मैनेजर का भी काम देख रहे हैं। संजीव भी मूलत: उत्तर बिहार – मधुबनी के हैं।


हमारे साथ के टी.आई. साहब ने सोचा कि खदान में घुसने के पहले विधिवत पता कर लिया जाये। खदान के मैनेजर साहब ने कहा कि थोड़ी दूर हम लोग जा कर देख सकते हैं। वे हमें खदान के अन्तिम छोर तक जाने की भी अनुमति दे देंगे, अगर हम इण्डेमिनिटी बॉण्ड भर कर दें कि कुछ होने पर खदान प्रबन्धन की जिम्मेदारी न होगी। हमारा इरादा अन्तिम छोर तक जाने का नहीं था – सो इनडेमिनिटी बॉण्ड भरने पर विचार नहीं किया। उस खदान श्रमिक – नन्दकुमार दास के आमन्त्रण पर खदान में कुछ दूर तक गये हम। करीब 100-125 मीटर तक।

पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे। साइड में जो पाइप दिख रहा है, उससे खदान में होने वाला पानी बाहर निकाला जाता है।
पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे।
साइड में जो पाइप दिख रहा है, उससे खदान में होने वाला पानी बाहर निकाला जाता है।

लगता है पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे। अपने टोप हाथ में लिये। कुछ के हाथ में बेलचे थे। अपनी पोटली/झोले लिये थे। शायद अपना भोजन रखा होगा उनमें। खदान के प्रारम्भ में काली मां का चित्र था दीवार पर। उस चित्र को नमस्कार कर आगे बढ़ रहे थे वे। खदान में काम करना खतरे से खाली नहीं। और जहां खतरा हो, वहां दैवी शक्ति का ध्यान व्यक्ति बरबस कर लेता है।

खदान के मुहाने पर काली मां का चित्र। सामने नदकुमार दास हमें बुलाते हुये।
खदान के मुहाने पर काली मां का चित्र। सामने नदकुमार दास हमें बुलाते हुये।

नन्दकुमार और अजित ने अपने टोप लगा लिये और उसके सामने लगी टॉर्च जला ली। वे हमारे आगे आगे चले और हमें बारबार हिदायत देते रहे कि फ़िसलन है, इस लिये हम लोग संभाल कर पैर रखें। बरसात का मौसम था। खदान की छत से पानी टपक रहा था। खदान में फर्श पर कोयले की परत होने से फिसलन भी थी। श्रमिक लोग तो गम-बूट पहने थे, हमारे जूते जरूर उस फ़िसलन में चलने लायक नहीं थे। फिर भी स्थिति इतनी खराब नहीं थे।

खदान के अन्दर रोशनी।
खदान के अन्दर रोशनी।

खदान में रोशनी थी कुछ कुछ दूरी पर। उससे रास्ता स्पष्ट हो रहा था। लगभग 30 अंश के ढलान पर हम चल रहे थे। तीस चालीस कदम पर मैं रुक गया तो नन्दकुमार जी ने कहा – “थोड़ा और आइये। आगे जंक्शन है। वहां तक देख जाइये”।

जंक्शन यानी वह स्थान जहां सीधी खदान की सुरंग से दो दिशाओं में लम्बवत सुरंगें फूटती थीं। वहां रोशनी कुछ ज्यादा थी। बाजू की तरह की सुरंगों में हम कुछ दूर घूमे। मुझे लगा कि अनजान आदमी इन सुरंगों की भूलभुलैया में अगर फ़ंस जाये तो इन्ही में उसका दम निकल जाये।

जंक्शन के पास दीवार पर लिखा यह संरक्षा का नारा।
जंक्शन के पास दीवार पर लिखा यह संरक्षा का नारा।

लम्बी सुरंग में दूर तक रोशनी दिख रही थी। मानो अन्त में बाहर निकलने का मार्ग हो और अन्त में सूर्य की रोशनी हो। पर नन्दकुमार ने बताया कि सुरंग के अन्त में भी काम चल रहा है खनन का। “करीब सताईसवें पिल्लर पर खुदाई हो रही है।”

नन्दकुमार ने मुझे अपनी टॉर्च से पिल्लर (पिलर) दिखाये। खदान को सपोर्ट देने के लिये दीवार में ईंटों से मोटे खम्भे बने थे। इसके अलावा खदान की छत को धसकने से बचाने के लिये कुछ कुछ दूरी पर बल्लियां रखी हुई थीं फ़र्श पर; जिन्हे जरूरत पड़ने पर छत को टेका दिया जा सकता था।  दो पिलर के बीच 70 से 100 फ़िट का फ़ासला है। इस तरह लगभग पौना किलोमीटर लम्बी खदान है गोधर कोलियरी। इसके अलावा जंक्शन से बाजू में फैली सुरंगें अलग।

खदान के अन्दर पिलर दिखाते नन्दकुमार दास।
खदान के अन्दर पिलर दिखाते नन्दकुमार दास।

नंदकुमार ने बताया कि एक ट्रॉली में लगभग सवा टन कोयला समाता है। पांच ट्रॉली का सेट एक साथ लोड हो कर रोप-पुली के जरीये बाहर आता है। अन्दर निकलने वाला कोयला और पत्थर, दोनो इसी ट्रॉली में बाहर भेजे जाते हैं।

लगभग 15-20 मिनट हम लोग रहे होंगे खदान में। अजित और नन्दकुमार कुछ दूर हमें वापस छोडने आये। बहुत अच्छा लगा उनका साथ। पता नहीं, जिन्दगी में फिर कभी उनसे मिलना होगा या नहीं; पर उनसे मुलाकात का यह दस्तावेज ब्लॉग पर तो रहेगा!

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खदान में पानी काफी होता है। बारिश का पानी भी रिस कर खदान में पंहुचता है। यह पाइप के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। कोलियरी के बाहर मैने एक जगह इस पानी की निकासी और उसमें नहाते बच्चे-बड़े देखे।

खदान का पानी बाहर गिराया जा रहा है।
खदान का पानी बाहर गिराया जा रहा है।

क्या हाल है रिलीफ का उत्तराखण्ड में?!


वर्षा का दौर थमा है। तात्कालिक राहत का समय पूरा हुआ। अब वहां के जो बाशिन्दे हैं, उत्तराखण्ड के ग्रामीण, उनको बसाने, उनके रोजगार-जीवन यापन पर ध्यान देने का समय है।

कुछ की खेती बरबाद हुयी। कुछ के खेत भूस्खलन में नष्ट हुये होंगे। कईयों के मवेशी काल के ग्रास में जा चुके होंगे। कुछ पर्यटन या निर्माण कार्य में मेहनत-मजूरी पाते रहे होंगे और अब उनपर जीविका का संकट होगा।

चूंकि मैने शैलेश पाण्डेय के रोप-वे बनाने के कार्य के विषय में पोस्टें लिखी थीं ब्लॉग पर; मुझे इन प्रश्नो पर जिज्ञासायें थीं। शैलेश के एक फोन कॉल ने वे जिज्ञासायें उभार दीं।

रोप-वे विषयक पोस्टें:

शैलेश की रिपोर्ट – रुद्रप्रयाग और श्रीनगर के बीच सेशैलेश की कार्य योजना – फाटा से मन्दाकिनी पर ग्रेविटी गुड्स रोप-वे राहत सामग्री के लियेमन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाने में सफल रही शैलेश की टीममन्दाकिनी नदी पर रोप-वे : अपडेट

शैलेश ने बताया कि उनकी रेलगाँव के धीर सिंह टिण्डूरी से बात चीत हुयी है। धीर सिंह ने बताया कि मन्दाकिनी पर रोप वे तो ठीक काम कर रहा है, पर गांववालों की हालत ठीक नहीं चल रही। स्थानीय प्रशासन और सरकार उदासीन से हैं। बाहरी सहायता भी अब लगभग समाप्त हो चली है।

शैलेश पाण्डेय (बायें) के साथ रेलगांव निवासी धीर सिंह टिण्डूरी।  यह चित्र उस समय का है, जब शैलेश फाटा-रेलगांव में रोप-वे का निर्माण करने गये थे।
शैलेश पाण्डेय (बायें) के साथ रेलगांव निवासी धीर सिंह टिण्डूरी।
यह चित्र उस समय का है, जब शैलेश फाटा-रेलगांव में रोप-वे का निर्माण करने गये थे।

उनके फोन के बाद मैने सीधे जानकारी लेने के लिये श्री धीर सिंह को फोन लगाया। धीर सिंह टिण्डूरी फोन का उत्तर देने में और जानकारी देने में प्रॉम्प्ट हैं। उन्हे शायद लगता है कि फोन बाहरी दुनियां से वह सम्पर्क खोलता है, जिससे स्थानीय लोगों को सहायता मिल सकती हो।

धीर सिंह ने बताया कि शैलेश की टीम का बनाया रोप-वे ठीक से काम कर रहा है। अब उन लोगों ने उसमें परिवर्तन कर एक व्यक्ति द्वारा चलने वाला सेल्फ-प्रोपेल्ड रोप वे बना लिया है। जहां उनका यह रोप वे काम कर रहा है, वहीं पीडब्ल्यूडी का बनाया रोप वे लोगों के बैठते ही लटक जाता है। लिहाजा वह काम का नहीं है।

मन्दाकिनी नदी की कटान और अतिवृष्टि ने रेलगांव के लोगों की लगभग चार हेक्टेयर खेती की जमीन खत्म कर दी है। लोगों के पास खेती का उपाय नहीं बचा। खच्चरों से सामान ढोने का काम नहीं हो रहा – क्यों कि आस पास निर्माण कार्य ठप है। मेहनत मजदूरी भी नहीं के बराबर मिल रही है।

वे लोग रुद्रप्रयाग के डी.एम से मिलने गये थे कि इस दुर्दशा के बारे में। अनुरोध था कि वे वन विभाग की लगभग डेढ़ हेक्टेयर जमीन – जिसपर वन विभाग की नर्सरी है और बाकी जंगल है (जिसमें जलाऊ लकड़ी के ही पेड़ हैं, कोई बहुमूल्य वृक्ष नहीं) – गांव के 18-19 परिवारों को खेती करने के लिये दे दें, जिससे लोगों की गुजर बसर हो सके। पर डी.एम. साहब ने कहा कि भूगर्भ विभाग की टीम आयेगी और वन पंचायत इस बारे में कुछ निर्णय ले सकेगी। कुल मिला कर उनसे कोई आश्वासन नहीं मिला। पहले सरकारी महकमे के लोग गांव की ओर रुख करते भी थे, अब कोई नहीं आता। “अब कितनी बार डी.एम. साहब के पास जायें”।

फाटा-रेलगांव की सड़क भी नहीं बनी। जीप जैसी छोटी गाड़ी आ जा पाती है। उससे बड़ी गाड़ियों के लिये रास्ता नहीं है। जब राहत मिल रही थी तो रोप वे से 200-300 चक्कर रोज लगते थे। अब 20-30 फेरे ही लगते हैं।

“सरकार उदासीन है। सहायता है नहीं। काम-किसानी है नहीं। हालत खराब हैं, साहब।” धीर सिंह असहाय नहीं लगना चाहते फोन पर बात करते हुये। पर यह भाव उनकी बातचीत से झलक ही जाता है।

आपको आश्चर्य हो रहा है इस पोस्ट में वर्णित दशा से? मुझे नहीं। जब तक मीडिया का फोकस रहता है – सरकारी अमला (और एनजीओ भी) तत्पर रहते हैं काम करता दीखने में। उसके बाद तो सन्नाटा पसरना ही है। वही हो रहा है!

अशोक कुमार, फ़िल्मिस्तान स्टूडियो और लल्लू बाबू


Photo0040_001लल्लू बाबू मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद फ़िल्म इण्डस्ट्री में भी हाथ आजमा कर आ चुके हैं।

लल्लू बाबू यानी श्री विपिन बिहारी उपाध्याय। उनकी सबसे छोटी बिटिया और मेरी बिटिया जेठानी-देवरानी हैं। उनकी सबसे बड़ी बिटिया मेरे सबसे बड़े साले साहब की पत्नी हैं। एक अन्य बिटिया के पति मेरे फेसबुक के मित्र श्री प्रवीण दुबे उज्जैन में चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स हैं। अत: हम दोनो का बहुत घनिष्ठ और रोचक रिश्ता है।

लल्लू बाबू और मैं एक रिश्ते की तलाश के लगभग फाइनल चरण के लिये घर के बड़े-बुजुर्ग की भूमिका में जा रहे थे। करीब साढ़े चार घण्टे का सड़क से रास्ता। सो उनसे बहुत बातचीत हुयी। उनके जीवन के अनेक पक्षों का पता चला मुझे। उस बातचीत में लल्लू बाबू का सफल व्यक्ति होना और उनकी मनमौजियत; साफ साफ जाहिर हुये।

बात बात में पता चला कि वे अपनी जवानी के दिनों में बम्बई जा कर फिल्म इण्डस्ट्री में जोर अजमाईश भी कर चुके हैं।

अच्छा, वहां कैसे पंहुच गये?

सन 1951 की बात है। मैने मैट्रिक का इम्तिहान दिया था। दरभंगा में रह कर पढ़ाई कर रहा था अपने जीजा जी के पास। वे कॉलेज में प्रोफेसर थे। जिनके घर में हम रहते थे वो किसी बंगाली का था। बी.सी. चटर्जी। उनके घर में आना जाना था। उनके लड़के भी हम उम्र थे। मकान मलिकिन अपने को अशोक कुमार की बहिन बताती थीं। अशोक कुमार की चचेरी बहिन थीं।

इम्तिहान हो चुके थे। मेरा मन बम्बई घूमने का था। मकान मलिकिन जी को मैने आग्रह किया कि एक चिठ्ठी दे दें अशोक कुमार के नाम। उन्होने बंगला में चिठ्ठी लिख कर दे दी। चिठ्ठी ले कर मैं बम्बई पंहुच गया। स्टेशन के क्लॉक रूम में अपना सामान रखा और अशोक कुमार से मिलने निकल गया।

यात्रा के दौरान देखते बतियाते लल्लू बाबू।
यात्रा के दौरान देखते बतियाते लल्लू बाबू।

जुहू में रहते थे अशोक कुमार। दोमंजिला बंगला था। नीचे साज फेक्टरी थी। ऊपर की मंजिल पर वे रहते थे। उनकी गाड़ी सीधे दुमंजिले पर चली जाती थी।

खैर, उनसे मिलने गया तो दरवाजे पर दरबान ने ही रोक लिया। अन्दर ही न जाने दिया। मैने बताया कि उनके लिये मेरे पास चिठ्ठी है। वह फिर भी न माना। उसने कहा कि शाम चार बजे उनकी कार आयेगी बाहर से, तभी उनसे दरवाजे पर मिलना। और कहीं जाना नहीं था मुझे। वहीं खड़ा रहा। चार बजे अशोक कुमार की कार आयी। वो पीछे बैठे थे। आगे शोफर था। स्टुडीबेकर गाड़ी थी। बड़ी गाड़ी। मैने उनका रास्ता छेंक लिया। पूछने पर मैने उनकी बहन की चिठ्ठी उनको दी। चिठ्ठी पढ़ कर उन्होने मेरा नाम आदि पूछा और कहा कि मेरा सामान कहां है? मैने बताया कि वह मैने स्टेशन पर रखा है। मुझे उन्होने सामान ले कर आने को कहा और दरबान को हिदायत दी कि मेरा उनके गेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम कर दिया जाये।

तीन दिन तक उनके गेस्ट हाउस में रहा। ट्रे में ढंक कर नाश्ता खाना आता था मेरे लिये। सवेरे टोस्ट मक्खन। दोपहर में दाल-रोटी-चावल-सब्जी। मुझसे पूछा कि मछली खाता हूं। मैने बताया कि चल जाती है। तो कभी मछली भी होती थी खाने में। तीसरे दिन अशोक कुमार ने बुलाया।

अशोक कुमार को लगा कि लड़का लोग बम्बई आते हैं फिल्मों में काम करने के लालच में। मैं भी वैसे ही आया हूंगा। पर मैं सिर्फ देखने घूमने के चक्कर में पंहुचा था बम्बई। उन्होने मुझसे पूछा – फिल्मों में काम करना चाहते हो? मेरा इरादा नहीं था; पर लगा कि जब मौका मिल रहा है तो करने में हर्ज क्या है। मैने कहा – हां!

अगले दिन उन्होने मुझसे साथ चलने को कहा। ले कर गये फिल्मिस्तान स्टूडियो। हृषिकेश मुखर्जी के पिता का था फिल्मिस्तान। हृषिकेश भी वहीं काम करते थे। मुखर्जी जी से अशोक कुमार ने कहा कि मुझे कोई काम दे दें। मुखर्जी ने मुझसे पूछा – क्या जानते हो? जीप चला लेते हो? मैने कहा हां। फिर पूछा तैरना आता है? घुड़सवारी आती है? यह सब मैं जानता था। मेरा इम्तिहान भी लिया उन्होने। फिर अगले दिन से काम दे दिया फिल्म में। बताया कि रोज के सत्तर रुपये मिलेंगे। वहीं फिल्मिस्तान के गेस्ट हाउस में रहने-खाने का इंतजाम होगा।

हर शनिवार मुझे 420 रुपये मिलते थे। मेरा खर्चा छ सौ रुपया महीना था। हजार रुपया महीना बचा ले रहा था मैं। तीन महीना काम किया। फिल्म बनी – जलवा। उसमें अशोक कुमार हीरो थे। मीना कुमारी हीरोइन और पद्मिनी भी थीं। अशोक कुमार फिल्म में राजा थे और मुझे रोल मिला था उनके बिगड़े राजकुमार का।

तीन महीने काम के बाद मैं वापस घर आया। जो पैसा बचा लिया था, उससे एक सेकिण्ड हैण्ड जीप खरीद कर उसे चलाता हुआ पांच दिन में घर पंहुचा था बिहार में।

सन 1936 की पैदाइश है लल्लू बाबू की। बम्बई जब गये होंगे तो 15-16 साल के रहे होंगे। मैट्रिक की परीक्षा दे कर अकेले बम्बई जा कर फिल्म में हाथ अजमाईश करना और बचत के पैसे से जीप खरीद कर चलाते हुये वापस लौटना – यह कल्पना कर ही लगता है कि कितने एडवेंचर करने वाले किशोर रहे होंगे वे! जिस प्रकार से वे मुझे बता रहे थे, यह सब, उससे नहीं लगता था कि बताने में कोई नमक मिर्च लगा रहे हों। सपाट बयान कर रहे थे।

तो फिल्म का क्या हुआ?

“फिल्म फ्लॉप हो गयी और उसके बाद फिर बम्बई नहीं गया मैं। चल गयी होती तो आज कुछ और बात होती”

जी.एस. चावला की फिल्म थी वह। जलवा। चली नहीं। फ्लाप हो गयी। चल गयी रही होती तो मैं फिल्म इण्डस्ट्री में चला गया होता।

घर लौटा तो अम्मा बहुत नाराज थीं। मेरे एक चचेरे भाई थे। अब नहीं रहे। पर वे बहुत लूझ लगाने वाले; झगड़ा पैदा करने वाले थे। उन्होने मेरी अम्मा को समझाया कि तिलका दुसाध (डेहरी-पटना में नौटंकी पार्टी चलाने वाला) की बम्बई में नौटंकी है। मैं उसी में काम करता था। तिलका की पार्टी का नाम सुन कर मां ने मुझे धमकाया कि अगर फिर बम्बई गया तो आंगन के कुयें में कूद कर वे जान दे देंगी!

फिल्मिस्तान से बाद में तीन चिठ्ठियां भी आयीं। काम के लिये वापस बुलाया। पर फिर जाना हो नहीं पाया! :-(

लल्लू बाबू के जीवन का फिल्म अध्याय इस प्रकार खिलने के पहले ही खत्म हो गया। पर उनकी जिन्दगी में एडवेंचर और रिस्क, मनमौजियत और उद्यमिता बरकरार रहे। उन्होने यात्रा के  दौरान और भी बताया। पर यह पोस्ट बहुत लम्बी हो चली है। फिल्म प्रकरण के साथ ही इसे विराम देता हूं।

और जो बताया लल्लू बाबू ने, वह फिर कभी लिखूंगा – मसलन उन्होने कैसे छोडी डाक्टरी की पढ़ाई एक साल करने के बाद!  

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