मुस्कान


मुस्कान (सबसे छोटी) व अन्य। फोटो खिंचाने दक्ष में खड़े!
मुस्कान (सबसे छोटी) व अन्य। फोटो खिंचाने दक्ष में खड़े!

बैशाखी की सुबह थी। एक दिन पहले ही मैने देखा था पानी में पैदल चल कर सात आठ लोग गंगा पार कर टापू पर जा रहे थे सब्जियाँ उगाने के काम के लिये। आज भी मुझे अपेक्षा थी कि कुछ उसी तरह के लोग दिखेंगे।

और; वे चिल्ला (गंगा किनारे की बस्ती, जहां वे श्रमिक रहते हैं) से आते हुये दिखे। मैं गंगा तट पर उस जगह के लिये बढ़ा जहां वे पंहुचने वाले थे। इस समूह में कुछ महिलायें,बच्चे-बच्चियां और एक पुरुष था। समूह तट पर रुका। गंगाजी का निरीक्षण किया और फिर नदी पार करने की बजाय अपना सामान समेट किसी और जगह जाने लगा। आगे जा कर वे लोग प्रतीक्षा करने लगे। मैने उस नयी जगह पर पंहुच कर आदमी से पूछा – आज पैदल पार नहीं कर रहे? कल तो मैने लोगों को देखा था पार करते?

आदमी ने उत्तर दिया – नाव का इंतजार कर रहे हैं।

आदमी जमीन पर प्रतीक्षा में लेट गया था। सिर के नीचे कपड़े को तकिया बना कर रख भी लिया था। उन्हे लगता है मालुम था कि प्रतीक्षा में समय लगेगा। औरत जो अभी खड़ी थी, ने कहा – नदी में पानी एक दिन में बढ़ गया है। पैदल पार करना ठीक नहीं है।

प्रतीक्षारत समूह।
प्रतीक्षारत समूह।

 

समूह की तीन लड़कियां समय का सदुपयोग करने के लिये मंजन करने लगीं गंगाजी के किनारे। मुझे फोटो खींचते देख औरत ने सबसे छोटी बालिका को कहा – जा फोटो हईंचत हयें। तुहूं खिंचाईले। (जा फोटो खींच रहे हैं, तू भी खिंचा ले।)

बालिका एक बनियान चड्ढ़ी पहने थी। समूह में सब से छोटी वही थी। मेरे पास आई तो मैने उसे गंगा तट पर सूर्य को सामना करते हुये खड़ा होने को कहा। फोटो खिंचता देख एक अन्य लड़की और लड़का तुरंत उस बालिका के साथ आ कर खड़े हो गये।

फोटो खींच कर मोबाइल की स्क्रीन पर मैने उन सभी को दिखाई। जितनी प्रसन्नता उन बच्चों को हुई वह शब्दों में नहीं लिख सकता मैं ( मैं अभी लेखक जो नहीं बन पाया हूं)।

बच्ची का नाम पूछा मैने। उसने बताया – मुस्कान। बहुत सही नाम रखा है उसकी माई ने!

इस बीच मेरे घर के पास रहने वाला दर्जी कछार के सवेरे के निपटान के बाद वहां से गुजर रहा था। वह बच्चों से बोला – जेकर जेकर फोटो खिंचान बा, ओनके पकड़ि लई जईहीं (जिस जिस की फोटो खींची है, उनको अब पकड़ ले जायेंगे!)। बच्चे खिलखिला कर हंसे। उन्हे विश्वास नहीं था दर्जी की बातों पर! या शायद मेरी शक्ल पर्याप्त डरावनी नहीं है! :lol:

घर आ कर मैं जब मोबाइल में खींचे चित्रों को ध्यान से देख रहा था, तो मैने पाया कि दिन भर टापू पर काम करने के लिये वे लोग अपना सामान लिये हुये थे। पोटली-गठरी, थैला, खाने के डिब्बे और पानी की बोतलें/जरीकेन।

यह मुझे विचित्र लगा – गंगा चारों तरफ रहेंगी उनके। पानी की कमी नहीं। पर पीने का पानी वे घर से ले कर जा रहे हैं। उन्हे भी यकीन नहीं रहा गंगाजी के पानी की निर्मलता का! :-(

वे अगर पानी में हिल कर चले जाते तो मुझे यह अवसर न मिलता उनसे बोलने-बतियाने का। अप्रेल के महीने में गंगाजी में पानी बढ़ता है, पहाड़ों पर बर्फ पिघलने के कारण। वही हो रहा है। सब्जियाँ बोने वाले यह फिनॉमिना जानते हैं। वे जानते हैं कि कब गंगा को हिल कर पार करना है और कब नाव पर। वे यह भी जानते हैं कि कछार के कितने हिस्से में कछार में सब्जियां बोनी हैं और कितना गंगाजी के घटने बढ़ने के लिये छोड़ना है!

हां, वे यह भी जानते हैं कि गंगाजी का पानी पीने योग्य नहीं रहा! :-(

This slideshow requires JavaScript.

माई बुडि जाब। (माँ डूब जाऊंगा।)



सूरज की पानी में परछाई से गुजर रहा है बच्चा!
सूरज की पानी में परछाई से गुजर रहा है बच्चा!

सात आठ लोगों का समूह था। अपना सामान लिये गंगा में उभर आये टापू पर सब्जियाँ उगाने के काम के लिये निकला था घर से। गंगाजी में पानी ज्यादा नहीं था।

एक रास्ता पानी में खोज लिया था उन्होने जिसे पानी में हिल कर पैदल चलते हुये पार किया जा सकता था। यह सुनिश्चित करने के लिये कि एक ही रास्ते पर चलें; एक ही सीध में एक के पीछे एक चल रहे थे वे। सब की रफ्तार में अंतर होने के कारण एक से दूसरे के बीच दूरी अलग अलग थी।

सब से आगे एक आदमी था। उसके पीछे दो औरतें। उसके बाद एक बच्चा। बच्चा इतना छोटा नहीं था कि पार न कर सकता गंगा के प्रवाह को। पर था वह बच्चा ही। डर रहा था। उसकी मां उससे आगे थी और शायद मन में आश्वस्त थी कि वह पार कर लेगा; अन्यथा उसके आगे वह काफी दूर न निकल जाती। इतना धीरे चलती कि वह ज्यादा दूर न रहे।

बच्चा डरने के कारण बहुत बोल रहा था, और इतने ऊंचे स्वर में कि मुझे दूर होने पर भी सुनाई पड़ रहा था। मां भी उसी तरह ऊंची आवाज में जवाब दे रही थी।

माई, पानी बढ़त बा! (माँ, पानी बढ़ रहा है!)

कछु न होये, सोझे चला चलु। (कुछ नहीं होगा, सीधे चला चल)। 

पनिया ढेर लागत बा। (पानी ज्यादा लग रहा है।) 

न मरबे। (मरेगा नहीं तू।) 

अरे नाहीं! माई डर लागत बा। बुडि जाब। (अरे नहीं माँ, डर लग रहा है। डूब जाऊंगा।) 

न मरबे! चला आऊ! (नहीं मरेगा; चला आ।) 

आगे का आदमी और स्त्री टापू पर पंहुच चुके थे। लड़का एक जगह ठिठका हुआ था। मां को यकीन था कि वह चला आयेगा। टापू पर पंहुच कर उसने पीछे मुड़ कर लड़के की ओर देखा भी नहीं। धीरे धीरे लड़का गंगा नदी पार कर टापू पर पंहुच गया। उनकी गोल के अन्य भी एक एक कर टापू पर पंहुच गये।

नेपथ्य में सूर्योदय हो रहा था। हो चुका था। लड़के को सूरज की झिलमिलाती परछाईं पार कर आगे बढ़ते और टापू पर पंहुचते मैने देखा। … अगले सीजन तक यह लड़का दक्ष हो जायेगा और शेखी बघारेगा अपने से छोटों पर। गंगा पार होना उसने सीख लिया। ऐसे ही जिन्दगी की हर समस्या पार होना सीख जायेगा।

माई डर लागत बा। बुडि जाब। (माँ, डर लग रहा है। डूब जाऊंगा।) 

न मरबे! चला आऊ! (नहीं मरेगा; चला आ।) 

नदी पार करते लोग।
नदी पार करते लोग।

तीन बनी


image

नत्तू पांडे के पास तीन खरगोश हैं – ह्वाईट बनी, ब्लैक बनी और बदमाश बनी। ह्वाईट और बदमाश बनी सफेद रंग के हैं। बदमाश बनी शराराती और कटखना है। उसकी बदमाशी के कारण उसे अलग पिंजरे में रखा जाता है। वह नत्तू पांड़े को दो तीन बार खरोंच चुका है।

ब्लैक बनी मादा है। वह दो बार बच्चे दे चुकी है, पर वे जी नहीं पाए।

नत्तू पांडे अपने खरगोशों से बहुत प्यार करते हैं। ये तीनों खरगोश नत्तू पांड़े के गांव, फुसरो (बोकारो से तीस किलोमीटर दूर) रहते हैं!

Design a site like this with WordPress.com
Get started