व्योमकेश शास्त्री बनाम नीलकंठ चिंतामणि


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व्योमकेश शास्त्री आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के द्वारा रचा काल्पनिक चरित्र है। काफी हद तक आचार्य जी का ‘क्लोन’। जितने आचार्य जी का लेखन मुझे भाता है उतने ही व्योमकेश का चरित्र भी। व्योमकेश से प्रेरित हो कर मैं भी अपने क्लोन बनाता रहता हूं अपनी मानसिक दुनियां में।

आचार्य जी के उपन्यास चारुचंद्रलेख और अनामदास का पोथा में यह चरित्र, व्योमकेश शास्त्री, आता है जो उपन्यास की कथा कहता/लिखता है।

व्योमकेश आचार्य जी की मानसिक, दार्शनिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। मैने इस बारे में पढ़ा – व्योमकेश शास्त्री को एक विद्वान, विचारशील और कभी-कभी व्यंग्यात्मक स्वभाव वाले व्यक्ति के रूप में (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा) चित्रित किया गया है। यह चरित्र एक आत्मकथात्मक छाया की तरह लगता है, क्योंकि इसमें डा. द्विवेदी के अपने व्यक्तित्व और विचारों की झलक मिलती है। वे व्योमकेश शास्त्री के माध्यम से समाज, धर्म, परंपरा, और इतिहास पर अपनी दृष्टि रखते हैं।

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मुझसे लोग कहते रहे हैं कि मैं अपनी रेल जिंदगी के बारे में लिखूं। ऐसा नहीं कि मैं कोई महत्वपूर्ण बात कहूंगा और मैं कोई दार्शनिक या साहित्यकार हूं। पर शायद लोगों में अमूमन किसी दूसरे के बारे में जानने की जेन्युइन इच्छा होती है। मैं भी किसी अदना से भी, गंवई चरित्र से भी, मिलता हूं तो उसके बारे में जानना चाहता हूं। शायद वही भाव हो लोगों के उस आग्रह में जब वे कहते हैं कि मैं अपनी रेल जिंदगी के बारे में अपने मेमॉयर्स लिखूं।

पर जितना मैं लिखने की सोचता हूं, उतना ही मुझे लगने लगता है कि मैं खुद वह सब नहीं कह पाऊंगा। मेरे पास कोई नोट्स नहीं हैं। कोई दस्तावेज नहीं है जिससे मैं अपने अतीत को पूरी इमानदारी से उतार सकूंं। जब उस मेमॉयर्स लेखन में भी कल्पना होगी ही तो बेहतर है कि कथा मेरे स्थान पर कोई व्योमकेश जैसा चरित्र कहे।

और तब बनता है नीलकंठ। अकेला नीलकंठ तो छोटा सा नाम लगता है। लोग उसकी एक अदना से पक्षी या शंकर जी के गले से तुलना कर सकते हैं। आचार्य जी ने भी व्योमकेश को व्योमकेश जैसा अदना नहीं रखा – विद्वान ‘शास्त्री’ की पदवी दे दी। मैने भी नीलकंठ को मात्र नीलकंठ नहीं रखा, नीलकंठ चिंतामणि बना दिया।

जब नाम बन गया तो कल्पना की उड़ान लम्बी होने लगी। कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है, पर मेरे ख्याल से आचार्य हजारीप्रसाद जी ने पहले व्योमकेश के चरित्र को रचा होगा, फिर चारुचंद्रलेख का तानाबाना व्योमकेश के माध्यम से बुना होगा। मेरे मामले में नीलकंठ के रचे जाने के बाद अब मेमॉयर्स की घटनायें, पात्र, काल, रचे जाने के लिये पंक्तिबद्ध होने लगेंगे। मन में जो केकोफोनी है, जो कुछ धुंधला या गड्डमड्ड है, उसे शेप में आने में समय लगेगा, पर आयेगा। मेरे अंदर अपनी बेवकूफियां उजागर करने के बारे में जो घनघोर लाज है, नीलकंठ उससे भी बड़ी सहजता से पार पायेगा। नीलकंठ वह सब लाहे लाहे करेगा!

नीलकंठ एक दिन में नहीं बना। पिछले साल भर से वह गढ़ा जा रहा है। यूं कहें तो अभी भी पूरी तरह नहीं बन पाया है वह। वह मेरा क्लोन भर है या एक समग्र चरित्र जो मेरे और मेरे जैसे तीन चार और को रिप्रजेंट करता है? वह आदमी क्यों है? औरत नहीं हो सकता था? औरत का नाम भी मैने चुना था – चित्रा या चित्रलेखा कृष्णमूर्ति। पर जब नीलकंठ उभरने लगा तो मैने चित्रलेखा को मिटा दिया। अपने आप को एक नारी के रूप में सोचना बहुत ही कठिन काम था मेरे लिये। नारी का नजरिया सही सही उतारने की मेरी कैपेबिलिटी बहुत ही सीमित है। अगर में कभी एक सधा हुआ लिक्खाड़ बन सका तो चित्रा कृष्णमूर्ति सृजित करने की जहमत उठा सकूंगा।

अभी तो, नीलकंठ चिंतामणि मेरे अपने जैसा है।

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नीलकंठ के चरित्र पर मेरी पत्नीजी की टिप्पणी है – बढ़िया। तुमने बच्चा पैदा कर दिया है। अब उसकी अच्छे से मालिश करो; दूध और पौष्टिक आहार दो। मुगली घुट्टी-उट्टी पिलाओ। जब वह पुष्ट हो जायेगा तभी तो कथा कहेगा!

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चैट जीपीटी (चैटी) को मैं नीलकंठ का एक चित्र बनाने को कहता हूं। चैटी मचान पर बैठ कर होने वाली मेरी मानसिक हलचल को जानता है। वह यह भी जानता है कि मैं वहां से बैठ रेलवे की पटरी और उसके जरीये अपना अतीत देखता हूं। चैटी ने (मेरे ख्याल से) नीलकंठ का एक स्मार्ट चित्र बनाया। रेल पटरी के पास एक मचान बनाया और सामने से एक गुजरती ट्रेन दिखाई। यह जरूर है कि वह सवारी गाड़ी की बजाय मालगाड़ी दिखाता तो ज्यादा अच्छा होता!

चित्र पर चैटी केप्शन लगाता है – “ये रहा नीलकंठ चिंतामणि का वह गहन सोच में डूबा हुआ चित्र, जो मचान पर बैठा है। इसमें उनकी साहित्यिक और दार्शनिक छवि स्पष्ट रूप से उभरती है। आपकी कल्पना के मुताबिक यह दृश्य बेहद शांत और आत्म-विश्लेषणकारी प्रतीत होता है।”

चैटी का बनाया चित्र –


प्रेमसागर जी का सम्मान हुआ


<<< प्रेमसागर जी का सम्मान हुआ >>>

परसों प्रेमसागर जी ने मुझे फोन कर बताया कि समस्तीपुर के पास एक मंदिर में उनका स्वागत सम्मान किया जाने वाला है और वे वहां जाने के लिये अपने गांव से निकल कर रेलवे स्टेशन पर आ चुके हैं। उनका निकटस्थ रेलवे स्टेशन जीरादेई है। सिवान के पास। बाबू राजेंद्र प्रसाद जीरादेई के निवासी थे।

प्रेमसागर मुझे अगस्त 2021 में मिले थे और उसके बाद उन्होने 12 ज्योतिर्लिंग पदयात्रा की। उनके साथ वर्चुअल ट्रेवलॉग लेखन मैंने किया। मैं अपने घर से नहीं निकला पर प्रेमसागर के माध्यम से मैने भारत भ्रमण कर लिया। प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा पर 100 ब्लॉग पोस्टें हैं। उसके बाद उन्होने शक्तिपीठ पदयात्रायें भी की। उनपर चौरासी पोस्टें ब्लॉग पर हैं। कुल मिला कर अच्छी खासी उपस्थिति मेरे ब्लॉग पर प्रेमसागर की है। बहुत से पाठक उनके बारे में जानते होंगे।

शक्तिपीठ पदयात्रा के बाद प्रेमसागर अपने रास्ते गये और मैं अपना रिटायरमेंट जीवन जीता रहा हूं। अचानक प्रेमसागर को मेरी याद आई। शायद मेरे ब्लॉग के माध्यम से अपना सम्मानित होने की सूचना देना चाहते हों।

समस्तीपुर के पास भीहड़ा गांव में बिचला हरिमंदिर में 16 दिसम्बर को कार्यक्रम था। उसकी आधा दर्जन फोटो प्रेमसागर ने भेजी हैं। साथ में एक राइट अप भी है। सम्भवत: प्रेस विज्ञप्ति है वह –

>>> आज भीड़हा के बिचला हरि मंदिर पर अयोध्या के परम् संत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर राम शिरोमणि दास जी महाराज फलहारी महात्यागी जी के सानिध्य में सनातन धर्म सम्मेलन का संगीत मायआयोजन किया गया,जिसमें सनातनी चेतना भजन से गायिका मौसम चौधरी और राजू ठाकुर के द्वारा सनातन जागृति की गई, वहीं इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आचार्य किशोर कुणाल जी ने वीडियो के माध्यम से सभी सनातनियों को एकजुट होने और युवाओं को इस तरह के कार्यक्रम से जुड़ने का आह्वान किया, वही विद्यमान मुख्य अतिथि बैद्यनाथ चौधरी बैजू बाबू ने सनातनी एकता को प्रदर्शित करने और अपनी धर्म और संस्कृति बचाने का आह्वान किया, वहीं श्री राम सुमति दास महात्यागी (राष्ट्रीय वैदिक योग ट्रस्ट के संस्थापक)जी ने जीवन जीने की धार्मिक कला एवं पद्धति जुड़कर धर्म की रक्षा करने का आह्वान किया, वहीं सिवान से चलकर आए संत श्री प्रेम शिवशक्तिदास जी का सम्मान हुआ जिन्होंने 12 ज्योतिर्लिंग और 45 शक्तिपीठ की पद यात्रा की है। इस कार्यक्रम की संचालन कमिटी इस प्रकार है:– दीपेंदु राय (युवकसंघ अध्यक्ष सह अधिवक्ता संघ उपाध्यक्ष), मुखिया प्रतिनिधि छत्नेश्वर राय, युवा समाजसेवी राम मोहन राय,अश्विनी कुमार राय,संतोष राय, सुदर्शन राय (गंगा राम)।

उक्त राइट-अप की भाषा वैसी नहीं जैसी मैं लिखता। पर मैने जस का तस रखा है, जिससे समारोह का स्तर और प्रकार समझा जा सके। कार्यक्रम में प्रेमसागर को संत श्री प्रेम शिवशक्ति दास का सम्बोधन दिया गया है। किसी आदमी का बाबा बनना मुझे रुचता नहीं। पर प्रेमसागर अपने रास्ते चल रहे हैं और मैं अपने। वैसे उन्होने फिलहाल कोई आश्रम नहीं बनाया है। पर उन्होने जो पदयात्रा की है – हजारों किलोमीटर की पदयात्रा – उससे उनका आम जनता के बीच महिमामंडन तो तय है।

उनका एक चित्र लगा रहा हूं। “अयोध्या के परम् संत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर राम शिरोमणि दास जी महाराज फलहारी महात्यागी जी” एक बड़े सिहासन पर बैठे हैं। बाकी संत लोग दांये बांये हैं। दांई ओर कोने में प्रेमसागर जी हैं। समारोह ठीकठाक स्तर का लग रहा है।

प्रेमसागर ने बताया कि वे प्रयाग में कल्पवास की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिये हो सका तो अपने गांव से एक साइकिल से रवाना होंगे। घाघरा (सरयू) पार कर बलिया से साइकिल यात्रा शुरू करेंगे। बलिया से गाजीपुर, वाराणसी और फिर मेरे घर होते हुये प्रयागराज। कल से कम एक पखवाड़ा संगम में कल्पवास होगा कुम्भ के दौरान।

मैने कभी माघ मेला क्षेत्र में दिन नहीं गुजारे। मन में साध थी वह जमावड़ा देखने की। लगता है भगवान जानते हैं कि मैं खुद तो मेला की किचिर पिचिर में जाने से रहा, सो वे प्रेमसागर के माध्यम से कल्पवास दिखायेंगे मुझे। अगर वैसा हुआ तो कुछ ब्लॉग पोस्टें कल्पवास पर भी बनेंगी! उसमें अभी महीना भर है। इसबीच मौका लगा तो कुम्भ और माघ मेला पर पढ़ने, जानकारी जुटाने और नोट्स बनाने का काम कर सकता हूं। पर फिलहाल मन बनाना है उसके लिये!


कल्पना में रेल कथा


<<< कल्पना में रेल कथा >>> मैं मचान पर बैठता हूं तो आधा किलोमीटर दूर रेलवे फाटक से गुजरती ट्रेने देख मेरे अतीत से प्रेरित; पॉपकॉर्न की तरह, कथायें फूटने लगती हैं। कुछ इस तरह लगता है कि मैं अर्धनिद्रा में चला गया हूं और केलिडोस्कोप में सीन-प्लॉट-पात्र-घटनायें बन बिगड़ रहे हैं। जमीन से सात फुट ऊपर छोटे से स्पेस में सीमित मचान की तासीर है यह।

*** *** कल्पना में एक दूर दराज की हरिहर खंड (165 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन जिसके दोनो ओर जंक्शन यार्ड हैं) की इकहरी रेल लाइन है। हरिहर खंड पर केवल दो जोड़ा पैसेंजर ट्रेने चलती हैं। कोई मालगाड़ी नहीं। रेलवे का उपेक्षित सा खंड है यह। इसके आसपास के गांव के लोगों या छोटे बच्चों ने कभी मालगाड़ी देखी ही नहीं।

उधर मंडल के डिविजनल दफ्तर में डीओएम साहब, हरिशंकर जी बहुत परेशानी में हैं। मालगाड़ियां फंस गई हैं। हर स्टेशन पर दो तीन स्टेबल हो गई हैं। ज्यादातर खुले डिब्बे वाली हैं। हर मालगाड़ी में पचास से ज्यादा कोयला लदान के खाली डिब्बे हैं। डिवीजन से उन्हें बाहर निकालना उनकी प्राथमिकता है। मालगाड़ियां कहीं जायें, जहन्नुम में जायें पर उनके मंडल से बाहर जायें।

दो तीन बड़े एक्सीडेंट्स और सर्दी से रेल पटरियां टूटने के कारण महीना भर रेल यातायात प्रभावित रहा है। ट्रेनों की स्पीड कम रही है तो डिवीजन पर जितनी मालगाड़ियां होनी चाहियें, उससे दुगुनी फंसी हैं इस समय।

बगल में दूसरे जोन की डिवीजन का डीओएम, गोविंद राजू सुझाता है – उसको लाइमस्टोन लदान के लिये चार मालगाड़ियां चाहियें। उसके लोडिंग प्वाइंट हरिहर खंड के अंत पर ही हैं। अगर हरिशंकर खाली मालगाड़ियां उसके यहां भेज दे तो हरिशंकर सिस्टम भी हल्का हो जायेगा और गोविंद राजू को लदान के वैगन भी मिल जायेंगे।

क्या उचित होगा जर्जर हरिहर खंड पर माल गाड़ी ठेलना? आजतक उसपर मालगाड़ी नहीं चली। उसकी पटरियां, उनकी फिटिंग मालगाड़ी के लिये फिट भी हैं या नहीं, पक्का नहीं कहा जा सकता। उपेक्षित खंड के मेंटीनेंस पर इंजीनियर भी कम ही ध्यान देते होंगे। फिर जोन में बैठा बुढ़ऊ (चीफ फ्रेट ट्रेन मैनेजर – सीएफटीएम; हरिशंकर का बॉस) को पता चलेगा कि हरिशंकर ने खलिया बॉक्स वैगन लाइमस्टोन के लिये भेज दिये हैं तो वह हरिशंकर की बहुत ऐसी तैसी करेगा। बुढ़ऊ की प्रयॉरिटी कोयला लदान है, लाइमस्टोन नहीं।

कॉन्फ्लिक्टिंग प्रयॉरिटीज, फंसा हुआ माल यातायात और किसी तरह खाली मालगाड़ियों को मंडल से बाहर फैंकना – यह सब सोचने में हरिशंकर बहुत परेशान है। वह अंतत: तय कर लेता है कि खाली मालगाड़ियां बाहर निकालेगा हरिहर खण्ड पर। गोविंदराजू को फोन कर हरिशंकर कहता है – “गोविंद, अगली ट्रेन से एक जोड़ा क्र्यू (ट्रेन ड्राइवर, असिस्टेंट और गार्ड) भेजो। एक खाली मालगाड़ी रवाना करता हूं। सही सही पंहुच गई तो दूसरी और तीसरी भेजूंगा। कल सवेरे बुढ़ऊ से बातचीत के पहले तीन गाड़ियां तो निकालनी हैं। फिर जो होगा, देखी जायेगी। बॉस ज्यादा से ज्यादा मेरा ट्रांसफर करवा देगा न, करा दे। इस थर्ड क्लास डिवीजन में रहना कौन चाहता है!”

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सीन बदलता है। रेल फाटक से एक मालगाड़ी गुजर रही है। एक छोटा बच्चा देख कर अपनी माई की साड़ी में दुबकता है – हऊ देखु माई! कइसन गाड़ी बा। येहमें त कौनो खिडकी नाहीं बा। (देख अम्मा, यह कैसी गाड़ी है। इसमें तो खिड़की दरवाजे ही नहीं हैं। लोग कैसे चढ़ते, बैठते होंगे)।” छोटा बच्चा तो जानता ही नहीं मालगाड़ी क्या होती है! हरिहरखंड पर तो कोई मालगाड़ी चली ही नहीं।

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और बुढ़ऊ डांट लगाने की बजाय हरिशंकर को शाबाशी देते हैं। यह भी कहते हैं कि राजू से पूछ लो – और रेक चाहियें तो वे भी दे दो। थर्मल पावर हाउसों की डिमांड घट गई है। इतने सारे वैरियेबल हैं ट्रेन परिचालन में कि कब डांट पड़ेगी और कब शाबाशी मिल जायेगी, कहना कठिन है।

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हरिशंकर की तरह तनाव मैने पूरी रेल जिंदगी में झेले हैं। ये तनाव किसी आम आदमी को, यहां तक कि मेरे अपने कर्मचारियों – स्टेशन मास्टरों या ड्राइवर-गार्ड आदि को – भी समझ नहीं आते होंगे। रेल परिचालन में बहुत सारी अनिश्चिततायें हैं। उनसे निपटने के लिये हर समय आपको सतर्क रहना होता है। पर आपका जीवन उस तनाव में एकाकी होता है। अपना बोझ टांगने के लिये कोई खूंटी नहीं मिलती। … अब वह सब अतीत हो गया है। अब सारा तनाव पिघल चुका है। यादें बची हैं।

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मचान पर बैठ कर मुझे लगता है कि मेरी कहानी बुनने की क्षमता विकसित हो जायेगी अगर मैं ज्यादा समय मचान पर बिताता रहा। कहानियों के प्लॉट में धीरे धीरे और रंग भर जायेंगे। हरिहरखण्ड, हरिशंकर, गोविंद राजू और जोनल हेडक्वार्टर में बैठा बुढ़ऊ और भी जीवंत हो उठेंगे। मेरा अतीत, मेरे अनुभव उन्हें विविध रंग देंगे। … तिलस्मी जगह बन जायेगा मचान!

[चित्र – मचान पर बैठा मैं।]


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