माननीय एपीजे अब्दुल कलाम और गोपालकृष्ण विश्वनाथ



इतना बढ़िया वाकया गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी ने एक टिप्पणी में ठेल दिया जो अपने आप में पूरी सशक्त पोस्ट बनता। मैं उसे एक टिप्पणी में सीमित न रहने दूंगा। भले ही वह पुनरावृत्ति लगे।

आप श्री विश्वनाथ के बारे में जानते ही हैं। वे मेरे बिस्ट्स पिलानी के चार साल सीनियर हैं। उन्होने बताया है कि वे बेंगळूरू में नॉलेज प्रॉसेस आउटसोर्सिंग का अपना व्यवसाय चलाते हैं अपने घर बैठे। उनके घर-कम-दफ्तर की तस्वीरें आप देखें –

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श्री जी. विश्वनाथ मेरी भावी प्रधानमंत्री वाली पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में कहते हैं –

G Vishwanath Small सन १९८६ की बात है।

मैं मेकॉन (इन्डिया) लिमिटेड के बैंगलौर क्षेत्रीय कार्यालय के स्ट्रक्चरल सेक्शन में वरिष्ट डिजाईन इंजिनीयर था। वहां, सभा कक्ष में, नये प्रोजेक्ट का किक-ऑफ मीटिंग (kick off meeting) में अपने अनुभाग का प्रतिनिधित्व करने मुझे भेजा गया था।

हमारा ग्राहक था भारत सरकार का एक विभाग। उनकी तरफ़ से सबसे वरिष्ठ अधिकारी का स्वागत होने के बाद, हम तकनीकी बहस करने लगे। मुझे भी अपने अनुभाग के बारे में पाँच मिनट बोलने का अवसर मिला। इस वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे कुछ कठिन और चतुर सवाल भी पूछे। मीटिंग के बाद हमें उनसे हाथ भी मिलाने का अवसर मिला। लम्बे बाल वाले, छोटे कद के और एक “हिप्पी” जैसे दिखने वाले सज्जन थे वह।

मेरे अनुभाग के साथियों (जो मीटिंग में सम्मिलित नहीं थे) ने, उन सज्जन को देखकर विचार व्यक्त किया कि यह “जोकर” कहाँ से आ टपका और कैसे इस उच्च पद पर पहुंच गया!

अब ज्यादा सस्पेन्स में नहीं रखना चाहता हूँ आपको। प्रोजेक्ट था डिफेंस रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) का; पृथ्वी और त्रिशूल मिसाइल के लिये असेम्बली शॉप के निर्माण विषयक।

यह वरिष्ठ अधिकारी थे DRDO के सबसे वरिष्ठ वैज्ञानिक श्री ए पी जे अब्दुल कलाम।

हाथ मिलाते समय मैने सपने में भी सोचा नहीं था कि भारत के भविष्य के राष्ट्रपति से हाथ मिला रहा हू!

मानो या न मानो!

मानो या न मानो, डा. कलाम भारत के एक चमकते सितारे हैं और थे एक महान राष्ट्रपति। राजनैतिक जोड़तोड़ के चलते वे अगली टर्म के लिये नहीं बनाये गये – इसका मुझे बहुत कष्ट है।

साहेब, हमारे साथ यह हुआ होता जो विश्वनाथ जी के साथ हुआ था; तो जिस दिन डा. कलाम राष्ट्रपति बने होते; उस दिन हम अपने उस हाथ को पूरे दिन दूसरे हाथ से पकड़े; गाते घूमते कि यह वही हाथ है, जो मैने राष्ट्रपति जी से मिलाया था!

पता नहीं विश्वनाथ जी ने गाया था या नहीं!


मिलिये स्वघोषित भावी प्रधानमन्त्री से!



मेरे पास पर्सनल डाक बहुत कम आती है। पर एक मस्त ड़ाक आयी। और भला हो दफ्तर के दफ्तरी का कि उसे स्पैम मानकर छांट नहीं दिया।

एक पोस्ट कार्ड मिला मुझे अपने डाक-पैड में। इसको भेजने वाले हैं कोई ओमप्रकाश मिश्र। जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष। भावी प्रधान मन्त्री। जन्मस्थान चाका नैनी, इलाहाबाद।

कल को अगर सही में प्रधानमन्त्री बन जायें तो यह मत कहियेगा कि हमने आगाह नहीं किया था!Laughing

इस पोस्ट कार्ड के पीछे उनका मेनीफेस्टो छपा है। जो मेरी समझ में खास नहीं आया। आप चिरौरी करें तो मैं उसे भी स्कैन कर पेश कर दूंगा। अभी तो आप पोस्ट कार्ड के फ्रण्ट का जलवा देखें –

Pradhan Mantri modified
भावी प्रधानमन्त्री जी का पोस्टकार्ड। नीला चौखाना मेरा बनाया है।

इस देश में तरह तरह के रोचक जीव रहते हैं। क्या ख्याल है आपका!


जब मैं रेलवे का मण्डल स्तर पर पब्लिक इण्टरफेस देखता था तो किसी बड़े समारोह पर इतने रिप्रजेण्टेशन मिलते थे कि बोरे में भी न समायें! उनमें से अनेक १०-२० पेज के होते थे। बहुत बुरी तरह ड्राफ्टेड। शुरू से अन्त तक पढ़ जायें पर पता न चले कि शूरवीर कहना क्या चाहते हैं, और रेलवे से क्या चाहते हैं!

उसकी प्रति प्रधानमन्त्री जी से ले कर तहसीलदार तक को एड्रेस होती थी! साथ में अखबार की ढ़ेरों कटिंग जुड़ी रहती थीं। एक सज्जन की तो मुझे याद है – वे अपने रिप्रजेण्टेशन में इत्र लगा कर भेजते थे। अगला पढ़े चाहे न पढ़े, इत्र जरूर सूंघता था! इत्र लगाते थे तो रिप्रजेण्टेशन में दर्जनों कवितायें ठेलते थे, जो "कमलेश" बैरागी की कविताओं की टक्कर की होती थीं।

एक बार मंच से श्रीमन्त माधवराव सिन्धिया जी ने मुझे कह दिया कि फलाने की दरख्वास्त पर जरा ध्यान दे दिया जाये। उसके बाद फलाने ने दरख्वास्त में तो जाने क्या लिखा था, पर वे मुझसे साल भर तक चिपके रहे कि मैं उनको रेलवे की नौकरी दिलवा दूं। अब उनको क्या बताता कि हमारी नौकरी ही बड़ी मुश्किल से लगी थी – कितना रट्टा लगाया था हमने सिविल सेवा परीक्षा पार करने को!

अजित वड़नेरकर बार बार मुझसे कहते हैं कि उनके ब्लॉग के लिये बकलम खुद सामग्री दूं। अब कैसे बताऊं कि एक मुश्त उनको लिख कर दे दूंगा तो यहां फुटकर फुटनोट में ठेलने को क्या बचेगा!Ha Ha


हाथ-घड़ी की क्या जरूरत है?



wristwatch वर्षा का मौसम आ गया। उमस और पसीने से त्वचा में इन्फ्लेमेशन (inflammation – सूजन, प्रदाह) होने लगा है। मेरी हाथ में घड़ी बांधने की जगह पर तेज ललाई, खुजली और सूजन हो गयी। घड़ी उतार कर मैने जेब में रख ली। दफ्तर के कमरे में समय देखने के लिये दीवाल घड़ी है। पर कोई कागज पर हस्ताक्षर करने हों तो नीचे दिनांक ड़ालने के लिये हाथ घड़ी पर नजर जाती है।

मैने विकल्प के रूप में देखा तो पाया कि मोबाइल फोन सदैव जेब में रहता है। वह जितने समय साथ रहता है; वह अब रिस्टवाच के साथ रखने से ज्यादा ही है। समय और दिनांक वह उतनी सरलता से बताता है, जितनी सरलता से हाथ घड़ी। तब हम रिस्टवाच का अतिरिक्त १०० ग्राम वजन ले कर क्यों चलते हैं?wrist

मैने घड़ी लगाना छोड़ दिया। ऐसा किये एक सप्ताह होने को आया। काम चल ही जा रहा है। आदत बदल रही है।

जाने कितनी रिडण्डेण्ट चीजों का हम संग्रह करते हैं। कभी सोचते नहीं कि उनके बिना भी काम मजे में चल सकता है।

कह नहीं सकता कि यह फ्र्यूगॉलिटी (मितव्ययता) की सोच है या मात्र खुराफात! देखता हूं बिना हाथघड़ी के सतत चलता है काम या फिर कुछ दिनों का फैड है!

पर नये समय में हाथघड़ी क्या वास्तव में चाहिये? दस साल बाद टाइटन/सोनाटा घड़ियों का भविष्य है? आपके पास किसी हाथघड़ी की कम्पनी के शेयर हैं क्या? कैसा रहेगा उनका भाव?


एक एलर्जी:

ANT मुझे विचित्र एलर्जी है। रतलाम में लाल रंग की छोटी चींटी अगर काट लेती थी और ध्यान न रहे तो लगभग दस मिनट में मेरी श्वसन नली चोक होने लगती थी। पहली बार जब मुझे आपातस्थिति में अस्पताल ले जाया गया तो मैं बमुश्किल सांस ले पा रहा था और डाक्टर साहब को समझ नहीं आ रहा था कि क्या है? इशारे से मैने कागज कलम मांगा और लिखा – ant bite. तब तुरन्त इलाज हुआ। उसके बाद तो मैं रेलवे सर्किल में इस एलर्जी के लिये जाना जाने लगा। यह एलर्जी कभी काली चींटी या अन्य कीड़े के काटने पर नहीं हुई। लाल चींटी गुसैल और कटखनी भी ज्यादा थी। मुझे बच कर रहना होता था। घर में फ्रिज में उसका एण्टीडोट इन्जेक्शन भी रखा गया था – आपात दशा में प्रयोग के लिये। पर जब भी वह काटती, मैं बिना समय बर्बाद किये अस्पताल ही चला जाता था।

अब न रतलामी चीटियां हैं, न वह एलर्जी। पर बारिश में इस तरह त्वचा का इन्फ्लेमेशन तो हो ही जाता है। लगता है कि कपड़े सूती पहने जायें और शरीर पर कसे न हों।

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कितनी बार आपका फॉयरफॉक्स ३.० क्रैश हुआ जी? मेरा तो तीन दिन में ५-६ बार।

एक बार तो पांच लाइन की एक ब्लॉग पोस्ट पर की जा रही अनपब्लिश्ड टिप्पणी भी ले गिरा! खैर, मैं इसे छोड़ नहीं रहा हूं। निराशा को इतनी जल्दी सरेण्डर नहीं करूंगा। वह सॉफ्टवेयर ही क्या जो क्रैश न हो! और वो दान की बछिया ही क्या जिसके दांत गिने जायें। Good luck


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