विदर्भ: मैं विक्तोर फ्रेंकल पर लौटना चाहूंगा



आठ महीने से अधिक हुये मैने विक्तोर फ्रेंकल के बारे में पोस्ट लिखी थी:

अब जब विदर्भ की आत्महत्याओं नें मन व्यथित किया है, तब इस पोस्ट की पुन: याद आ रही है। विदर्भ की समस्या वैसी ही जटिल है जसे नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प की हालत। यहां सरकार की उदासीनता या कपास का खरीद मूल्य ठीक स्तर पर न रखने का मामला है। किसान की (शायद) अधिक की अपेक्षा है, बाजार की ठगी है, किसान की मेहनत का वाजिब मूल्य न मिलना है, मौसम की रुक्षता है – और न जाने क्या क्या है। पर उस सब का नैराश्य नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प से ज्यादा नहीं होगा।

इसलिये मैं विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद उस पुरानी पोस्ट के माध्यम से पुन: व्यक्त करना चाहता हूं। आप वह पोस्ट पढ़ें:


जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग”* उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने
मात्र 9 दिनों में लिखी थी.


पुस्तक में एक प्रसंग है. नात्सी यातना शिविर में 2500 कैदी एक दिन का भोजन छोड़ने को तैयार हैं क्योंकि वे भूख के कारण स्टोर से कुछ आलू चुराने वाले कैदी को चिन्हित कर मृत्युदण्ड नहीं दिलाना चाहते. दिन भर के भूखे कैदियों में ठण्ड की गलन, कुपोषण, चिड़चिड़ाहट, निराशा और हताशा व्याप्त है. बहुत से आत्महत्या के कगार पर हैं. बिजली भी चली गयी है. ऐसे में एक सीनियर विक्तोर को कैदियों को सम्बोधित कर आशा का संचार करने को कहता है. विक्तोर छोटा सा पर सशक्त सम्बोधन देते हैं और उससे कैदियों पर आशातीत प्रभाव पड़ता है. मैं इस अंश को बार-बार पढ़ता हूं. उससे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है. उस ढ़ाई पृष्ठों का अनुवाद मैं फिर कभी करने का यत्न करूंगा. (सॉरी, यह मैं अब तक नहीं कर पाया। – 29 मार्च 2008)

अभी मैं पुस्तक के कुछ उद्धरणों का अनुवाद प्रस्तुत करता हूं, जो यह स्पष्ट करे कि विक्तोर फ्रेंकल की सोच किस प्रकार की थी. विभिन्न विषयों पर फ्रेंकल इस प्रकार कहते हैं:

अपने नजरिये को चुनने की स्वतंत्रता पर:
मानव से सब कुछ छीना जा सकता है. सिवाय मानव की मूलभूत स्वतंत्रता के. यह स्वतंत्रता है
– किसी भी स्थिति में अपना रास्ता चुनने हेतु अपने नजरिये का निर्धारण करने की.

वह, जो मुझे मारता नहीं, मुझे और दृढ़ता प्रदान करता है. – नीत्से.

जीवन मूल्यों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होने पर:
मानव को तनाव रहित अवस्था नहीं चाहिये. उसे चाहिये एक उपयुक्त लक्ष्य की दिशा में सतत आगे बढ़ती और जद्दोजहद करती अवस्था.

तनावों को किसी भी कीमत पर ढ़ीला करना जरूरी नहीं है, जरूरी है अपने अन्दर के सोये अर्थ को उद्धाटित करने को उत्प्रेरित होना.

जीवन के अर्थ की खोज पर:
हमें अपने अस्तित्व के अर्थ की संरचना नहीं करनी है, वरन उस अर्थ को खोजना है.

और हम यह खोज तीन प्रकार से कर सकते हैं – (1) काम कर के, (2) जीवन मूल्य पर प्रयोग कर के और (3) विपत्तियां झेल कर.

अपने कार्य को पूरा करने पर:
एक व्यक्ति जो जानता है कि उसकी किसी व्यक्ति के प्रति कुछ जिम्मेदारी है जो उसके लिये प्रेम भाव से इंतजार कर रहा होगा; अथवा उस अधूरे काम के प्रति जो उसे पूरा करना है, तो वह कभी अपने जीवन को यूंही फैंक नहीं देगा. अगर उसे जीवन के
“क्यों” की जानकारी है तो वह “कैसी” भी परिस्थिति को झेल जायेगा.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम जिन्दगी से क्या चाहते हैं, वरन यह है जिंदगी हमसे क्या चाहती है. हम जीवन के अर्थ के बारे में प्रश्न करना छोड़; प्रति दिन, प्रति घण्टे अपने आप को यह समझने का यत्न करें कि जिन्दगी हमसे प्रश्न कर रही है. हमारा उत्तर ध्यान और वार्ता में नहीं वरन सही काम और सही आचरण में होना चाहिये. जिन्दगी का अर्थ उसकी समस्याओं के सही उत्तर पाने तथा वह जिन कार्यों की अपेक्षा मानव से करती है, उनके पूर्ण सम्पादन की जिम्मेदारी मानने में है.


* – पुस्तक पर विकी लिंक यहां है.
और विक्तोर फ्रेन्कल के एक इण्टरव्यू का वीडियो यहां है:


विदर्भ की आत्महत्याओं का तोड़ (वाकई?)



मुझे झेंप आती है कि मेरे पास विदर्भ की समस्या का कोई, बेकार सा ही सही, समाधान नहीं है। वैसे बहुत विद्वता पूर्ण कहने-लिखने वालों के पास भी नहीं है। सरकार के पास तो नहियंई है। वह तो मात्र कर्ज माफी का पेड़ लगा कर वोट के फल तोड़ना चाहती है।

श्रीमोहन

हमारे साथी अधिकारी श्रीयुत श्रीमोहन ने एक पते की बात बताई है। उनका गांव बलिया जिला में है। गरीबी का मूल स्थान है बलिया। और आज भी गरीबी की भीषणता के दर्शन करने हों तो वहां जाया जा सकता है।

करनराम, गांव दामोदरपुर, पास का रेल स्टेशन फेफना, जिला बलिया के निवासी थे। वे 96 साल की जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। उनके अपने पास एक इंच जमीन नहीं थी। गांव में एक बाग में संत की समाधि की देखभाल करते थे करनराम जी। आसपास की लगभग एक बीघा की जमीन में अरहर, पटसन, चना – जो भी हो सकता था बो लेते थे। कुछ और कमाई के लिये पाजामा-कुरता-नेकर आदि देसी पहनावे के वस्त्र सिल लेते थे। उनकी पत्नी उनकी मृत्यु से तीन साल पहले मरी थीं। अर्थात दोनो पूरी जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। एक लड़का था जिसे चतुर्थ श्रेणी में एफ सी आई में नौकरी मिली थी और जो अपने बूते पर अफसर बन गया था; पर करन राम जी ऐसे स्वाभिमानी थे कि लड़के से एक रत्ती भी सहायता कभी नहीं ली।

ढोलक – By adil113 – dholak, CC BY 2.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=54270530

करनराम जी के पास खाने को कुछ हुआ तो ठीक वरना पटसन के फूलों की तरकारी बना कर भी काम चलाते थे। सदा मस्त रहने वाले जीव। किसी भी मेले में उनकी उपस्थिति अनिवार्य बनती थी। चाहे बलिया का ददरी मेला हो या गड़वार के जंगली बाबा के मन्दिर पर लगने वाला मेला हो। बड़े अच्छे गायक थे और ढ़ोल बजाते थे। अभाव में भी रस लेने का इंतजाम उनकी प्रकृति का अंग बना हुआ था। उन्हे अवसाद तो कभी हुआ न होगा। भले ही भूखे पेट रहे हों दिनो दिन।

करनराम जी एब्जेक्ट पावर्टी में भी पूरी जिन्दगी मस्त मलंग की तरह काट गये। और पूर्वांचल में करनराम अकेले नहीं हैं। यहां भूख के कारण मौत हो सकती है। पर विदर्भ की तरह के किसानों के सपने टूटने के अवसाद की आत्महत्या वाली मौतें नहीं होतीं। लोगों ने अपनी कृषि से कैश क्रॉप के अरिथमैटिक/कैश-फ्लो वाली अपेक्षायें अपने पर लाद नहीं रखी हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बेचे स्वप्न बिना वास्तविकता का डिस्काउण्ट लगाये उन लोगों ने स्वीकार नहीं कर लिये हैं। उन सपनों के आधार पर हैसियत से ऊपर के कर्ज नहीं ले रखे हैं। मितव्ययता/फ्रूगालिटी उनके गुणसूत्र में है। गंगा की बाढ़ ने सहस्त्राब्दियों से अभावों को सहजता से लेना उन्हे सिखाया है। आप एक आध चारवाकवादी को उद्धृत भले कर दें यहां के; पर सामान्य जनसंख्या करनराम जी की तरह की है।

करनराम जी का उदाहरण शायद विदर्भ का एण्टीडोट हो। न भी हो तो भी उसपर विचार करने से क्या जाता है। अपनी अपेक्षायें कम करने और थोड़े में प्रसन्नता ढ़ूंढ़ना ही तो समाधान है। और कोई समाधान भी तो नहीं है। है भी तो लफ्फाजी की चाशनी में लिपटा यूटोपिया है!

आप भी सोचें!


मुझे पक्का यकीन है कि बुद्धिवादी मेरी इस पोस्ट को खारिज करने का पूरा मन बनायेंगे। देश के आर्थिक विकास की बजाय मैं फ्रूगालिटी की बात कर रहा हूं। और असली बात – किसान की आत्महत्या का इतना बढ़िया मुद्दा मिला है सरकार पर कोड़े बरसाने का, उसे छोड़ मैं पटसन के फूलों की तरकारी की वकालत कर रहा हूं।

“सरकारी मुलाजिम हूं न! सो सरकार के पक्ष के लिये मामला डाइवर्ट कर रहा हूं!”


मणियवा खूब मार खाया



मणियवा का बाप उसे मन्नो की दुकान पर लगा कर पेशगी 200 रुपया पा गया। सात-आठ साल के मणियवा (सही सही कहें तो मणि) का काम है चाय की दुकान पर चाय देना, बर्तन साफ करना, और जो भी फुटकर काम कहा जाये, करना। उसके बाप का तो मणियवा को बन्धक रखवाने पर होली की पन्नी (कच्ची शराब) का इंतजाम हो गया। शांती कह रही थी कि वह तो टुन्न हो कर सड़क पर लोट लोट कर बिरहा गा रहा था। और मणियवा मन्नो की दुकान पर छोटी से गलती के कारण मार खाया तो फुर्र हो गया। उसकी अम्मा उसे ढ़ूंढ़ती भटक रही थी। छोटा बच्चा। होली का दिन। मिठाई-गुझिया की कौन कहे, खाना भी नहीँ खाया होगा। भाग कर जायेगा कहां?

शाम के समय नजर आया। गंगा किनारे घूम रहा था। लोग नारियल चढ़ाते-फैंकते हैं गंगा में। वही निकाल निकाल कर उसका गूदा खा रहा था। पेट शायद भर गया हो। पर घर पंहुचा तो बाप ने, नशे की हालत में होते हुये भी, फिर बेहिसाब मारा। बाप की मार शायद मन्नो की मार से ज्यादा स्वीकार्य लगी हो। रात में मणियवा घर की मड़ई में ही सोया।

कब तक मणियवा घर पर सोयेगा? सब तरफ उपेक्षा, गरीबी, भूख देख कर कभी न कभी वह सड़क पर गुम होने चला आयेगा। और सड़क बहुत निर्मम है। कहने को तो अनेकों स्ट्रीट अर्चिंस को आसरा देती है। पर उनसे सब कुछ चूस लेती है। जो उनमें बचता है या जैसा उनका रूपांतरण होता है – वह भयावह है। सुकुमार बच्चे वहां सबसे बुरे प्रकार के नशेड़ी, यौन शोषित, अपराधी और हत्यारे तक में मॉर्फ होते पाये गये हैं।

जी हां। हम सब जानते हैं कि मणियवा खूब मराया गया (मार खाया) है। एक दो साल और मरायेगा। फिर मणियवा गायब हो जायेगा?! कौन कब तक मार खा सकता है? हां, जिन्दगी से मार तो हमेशा मिलेगी!


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अब देखिये, चाहता था हैरीपॉटरीय तिलस्म। अनूप शुक्ल ने बताया हामिद का चिमटा। और छूटते ही लिख बैठा मणियवा की अभाव-शोषण ग्रस्त दास्तान। पता नहीं, गंगा किनारे मणियवा को यूं ही टहलते हैरीपॉटरीय तिलस्म दिखता होगा उसको अपने अभाव के रिक्ल्यूज़ के रूप में। हर घोंघे-सीपी में नया संसार नजर आता होगा।

बचपन में हमने भी उस संसार की कल्पना की है, पर अब वैसा नहीं हो पाता!


इस पोस्ट के लिये चाय की केतली और ग्लास रखने के उपकरण का चित्र चाहिये था। मेरे दफ्तर की केण्टीन वाला ले कर आया। केतली खूब मांज कर लाया था। उसे मेरा चपरासी यह आश्वासन दे कर लाया था कि कोई परेशानी की बात नहीं है – तुम्हारी फोटो छपेगी; उसके लिये बुलाया है।

आप केण्टीन वाले का भी फोटो देखें। वह तो शानदार बालों वाला नौजवान है। पर उसके पास तीन चार छोटे बच्चे हैं काम करने वाले – मणि की तरह के।

और हां मणियवा भी काल्पनिक चरित्र नहीं है – पर जान बूझ कर मैं उसका चित्र नहीं दे रहा हूं।


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