विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 2.



अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैने पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसके पहले भाग का अनुवाद कल प्रस्तुत किया था।

(आप कड़ी के लिये मेरी पिछली पोस्ट देखें)

यह है दूसरा और अंतिम भाग:


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पर मैने (अपने सम्बोधन में) केवल भविष्य और उसपर पसरे आवरण की ही चर्चा नहीं की। मैने भूतकाल की भी बात की। यह भी याद दिलाया कि भूतकाल की खुशियां अभी भी आज के अन्धेरे में हमें रोशनी दिखाती हैं। मैने एक कवि को भी उधृत किया – “आपने जो भी जिया है, धरती की कोई ताकत आपसे वह छीन नहीं सकती”। न केवल हमारे अनुभव; पर हमने जो कुछ भी किया है; जो भी उच्च विचार हमारे मन में आये हैं; वे समाप्त नहीं हो सकते। वह भले ही हमारे अतीत का हिस्सा हों; पर वह सब हमने इस विश्व में सृजित किया है और वह हमारी ठोस उपलब्धि है।

जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग” उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

तब मैने यह चर्चा की कि जीवन के बारे में सार्थक अर्थों में सोचने से कितनी सम्भावनायें खुल जाती हैं। मैने साथियों को (जो चुपचाप सुन रहे थे, यद्यपि बीच में कोई आह या खांसी की आवाज सुनने में आती थी) बताया कि मानव जीवन, किसी भी दशा में, कभी निरर्थक नहीं हो जाता। और जीवन में अनंत अर्थ हैं। उन अर्थों में झेलना, भूख, अभाव और मृत्यु भी हैं। मैने उन निरीह लोगों से, जो मुझे अन्धेरे में पूरी तन्मयता से सुन रहे थे, अपनी स्थिति से गम्भीरता से रूबरू होने को कहा। वे आशा कदापि न छोड़ें। अपने साहस को निश्चयात्मक रूप से साथ मे रखें। इस जद्दोजहद की लम्बी और थकाऊ यात्रा में जीवन अपने अभिप्राय और अपनी गरिमा न खो दें। मैने उनसे कहा कि कठिन समय में कहीं कोई न कोई है – एक मित्र, एक पत्नी, कोई जिन्दा या मृत, या ईश्वर – जो हमारे बारे में सोच रहा है। और वह नहीं चाहेगा कि हम उसे निराश करें। वह पूरी आशा करेगा कि हम अपनी पीड़ा में भी गर्व से – दीनता से नहीं – जानें कि जिया और मरा कैसे जाता है।

और अंत में मैने हमारे सामुहिक त्याग की बात की। वह त्याग जो हममें से हर एक के लिये महत्वपूर्ण था।1 यह त्याग इस प्रकार का था जो सामान्य दशा में सामान्य लोगों के लिये कोई मायने नहीं रखता। पर हमारी हालत में हमारे त्याग का बहुत महत्व था। जो किसी धर्म में विश्वास रखते हैं, वे इसे सरलता से समझ सकते हैं। मैने अपने एक साथी के बारे में बताया। वे कैम्प में आने के बाद ईश्वर से एक समझौते (पेक्ट) के आधार पर चल रहे हैं। उस समझौते के अनुसार वे जो वेदना/पीड़ा और मौत यहां झेलेंगे, वह उस व्यक्ति को, जिससे वे प्यार करते हैं, वेदना और दुखद अंत से बचायेगी। इस साथी के लिये पीड़ा और मृत्यु का एक प्रयोजन था – एक मतलब। वह उनके लिये उत्कृष्टतम त्याग का प्रतिमान बन गयी थी। वे निरर्थक रूप से नहीं मरना चाहते थे। हममें से कोई नहीं चाहता।

मेरे शब्दों का आशय यह था कि हमें अपने जीवन का अभिप्राय, वहां, उसी कैम्प की झोंपड़ी की बदहाल अवस्था में, समझना और आत्मसात करना था। मैने देखा कि मेरा यत्न सार्थक रहा। मेरे बुझे-बुझे से मित्र धीरे-धीरे मेरी ओर आये और अश्रुपूरित नयनों से मुझे धन्यवाद देने लगे।

लेकिन मैं यह स्वीकारोक्ति करना चाहूंगा। वह एक विरल क्षण था, जब मैं आंतरिक शक्ति जुटा पाया। मैं अपने साथियों को चरम वेदना की दशा में सम्बोधित कर पाया। यह करना मैं पहले कई बार चूक गया था।


1. उस दिन सभी 2500 कुपोषित कैदियों को भोजन नहीं मिला था। एक भूख से व्याकुल कैदी द्वारा आलू चुराने के मामले में उस कैदी को अधिकारियों के हवाले करने की बजाय सबने यह सामुहिक दण्ड स्वीकार किया था। अन्यथा उस कैदी को सेंधमारी के अपराध में फांसी दे दी जाती।

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यह प्रकरण विदर्भ के किसानों की घोर निराशा और उससे उपजी आत्महत्याओं पर सोच से प्रारम्भ हुआ और यहां इस पोस्ट के साथ समाप्त हुआ। विदर्भ के किसानों की समस्या में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भौगोलिक पहलू होंगे। कई घटक होंगे उसके। पर यह पोस्टें तो मैने अपनी मानसिक हलचल के तहद बनाई हैं। विदर्भ समस्या पर कोई पाण्डित्य प्रदर्शन का ध्येय नहीं है।


विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 1.



अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैं पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसका अनुवाद दो दिन में आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

(आप कड़ी के लिये मेरी पिछली पोस्ट देखें)

यह है पहला भाग:


वह एक बुरा दिन था। परेड में यह घोषणा हुई थी कि अबसे हम कैदियों के कई काम विध्वंसक कार्रवाई माने जायेंगे। और विध्वंसक माने जाने के कारण उनके लिये तुरंत फांसी की सजा मिला करेगी। इन आपराधिक कामों में अपने कम्बल से छोटे छोटे टुकड़े काट लेना (जो हम अपने घुटनों के सपोर्ट के लिये करते थे) जैसे छोटे कृत्य भी शामिल थे। बहुत हल्की चोरियां भी इन विध्वंसक कामों की सीमा में ले आयी गयी थीं।

कुछ दिन पहले एक भूख से व्याकुल कैदी ने स्टोर से कुछ पाउण्ड आलू चुराये थे। इसे पता चलने पर बड़ी गम्भीरता से लिया जा रहा था। चुराने वाले को सेंधमार की संज्ञा दी जा रही थी। अधिकारियों ने हम कैदियों को आदेश दिया था कि हम उस “सेंधमार” को उनके हवाले कर दें, अन्यथा हम सभी 2500 कैदियों को एक दिन का भोजन नहीं मिलेगा। और हम सभी 2500 ने एक दिन का उपवास करना बेहतर समझा था।

जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग” उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

इस दिन शाम को हम सभी भूखे अपनी झोंपड़ियों में लेटे थे। निश्चय ही हम बड़ी मायूसी में थे। बहुत कम बातें हो रही थीं। हर आदमी चिड़चिड़ा हो रहा था। ऐसे में बिजली भी चली गयी। हम लोगों की चिड़चिड़ाहट और बढ़ गयी। पर हमारे सीनियर ब्लॉक के वार्डन बुद्धिमान आदमी थे। उन्होने एक छोटी सी टॉक में उन बातों को बताया जो हम सब के मन में चल रही थीं। उन्होने पिछले दिनों बीमारी या भूख से मरे साथियों की चर्चा भी की। लेकिन वे यह बताना नहीं भूले कि मौतों का असली कारण क्या था – वह था – जीने की आशा छोड़ बैठना। सीनियर ब्लॉक वार्डन ने कहा कि कोई न कोई तरीका होना चाहिये जिससे साथी लोग इस चरम अवस्था तक न पंहुंच जायें। और उन्होने इस बारे में मुझे कुछ सलाह देने का आग्रह किया।

भगवान जानता है कि मैं अपने साथियों को उनके आत्मिक स्वास्थ्य के लिए किसी मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण या उपदेश युक्त सलाह देने हेतु कतई मूड में नहीं था। मैं सर्दी और भूख से परेशान था। मुझमें थकान और चिड़चिड़ाहट थी। पर मुझे अपने को इस अभूतपूर्व स्थिति के लिये तैयार करना ही था। आज उत्साह संचार की जितनी आवश्यकता थी, उतनी शायद पहले कभी नहीं थी।

अत: मैने छोटी छोटी सुविधाओं की चर्चा से अपनी बात प्रारम्भ की। मैने बताया कि योरोप की द्वितीय विश्वयुद्ध की छठी सर्दियों में भी हमारी दशा उतनी खराब नहीं थी, जितनी हम कल्पना कर सकते हैं। मैने कहा कि हम सब सोचने का यत्न करें कि अब तक हमें कौन कौन सी क्षति हुई है, जिसे भविष्य में रिकवर न किया जा सके। मैने यह अटकल लगाई कि बहुत से लोगों के मामले में यह बहुत कम होगी। हममें से जो भी जिन्दा थे, उनके पास आशा के बहुत से कारण थे। स्वास्थ्य, परिवार, खुशियां, व्यवसायिक योग्यता, सौभाग्य, समाज में स्थान – ये सब या तो अभी भी पाये जा सकते हैं या रिस्टोर किये जा सकते हैं। आखिर अभी हमारी हड्डियां सलामत हैं। और हम जो झेल चुके हैं, वह किसी न किसी रूप में हमारे लिये भविष्य में सम्पदा (एसेट) बन सकता है। फिर मैने नीत्शे को उधृत किया – “वह जो मुझे मार नहीं डालता, मुझे सक्षमतर बनाता है”।

आगे मैने भविष्य की बात की। मैने यह कहा कि निरपेक्ष रूप से देखें तो भविष्य निराशापूर्ण ही लगता है। हममें से हर एक अपने बच निकलने की न्यून सम्भावना का अन्दाज लगा सकता है। मेरे अनुसार, यद्यपि हमारे कैम्प में क्षय रोग की महामारी नहीं फैली थी, मैं अपने बच निकलने की सम्भावना बीस में से एक की मानता हूं। पर इसके बावजूद मैं आशा छोड़ कर हाथ खड़े कर देने की नहीं सोचता। क्योंकि कोई आदमी नहीं जानता कि भविष्य उसके लिये क्या लेकर आयेगा। वह यह भी नहीं जानता कि अगले घण्टे में क्या होगा। भले ही हम अगले महीनों में किसी सनसनीखेज सामरिक घटना की उम्मीद नहीं करते, पर (कैम्प के पुराने अनुभव के आधार पर) हमसे बेहतर कौन जानता है कि व्यक्ति (इण्डीवीजुअल) के स्तर पर बड़ी सम्भावनायें अचानक प्रकटित हो जाती हैं। उदाहरण के लिये हममें से कोई किसी अच्छे ग्रुप के साथ अचानक जोड़ दिया जा सकता है, जहां काम की स्थितियां कहीं बेहतर हों। और किसी कैदी के लिये तो यह सौभाग्य ही है।…..

(शेष भाग 2 में, कल)


आलू और कोल्डस्टोरेज



तेलियरगंज, इलाहाबाद में एक कोल्ड स्टोरेज है। उसके बाहर लम्बी कतारें लग रही हैं आलू से लदे ट्रकों-ट्रैक्टरों की। धूप मे‍ जाने कितनी देर वे इन्तजार करते होंगे। कभी कभी मुझे लगता है कि घण्टो‍ नहीं, दिनों तक प्रतीक्षा करते हैं। आलू की क्वालिटी तो प्रतीक्षा करते करते ही स्टोरेज से पहले डाउन हो जाती होगी।

पढ़ने में आ रहा है कि बम्पर फसल हुई है आलू की। उत्तरप्रदेश के पश्चिमी हिस्सों – आगरा, मथुरा, फिरोज़ाबाद, हाथरस आदि में तो ट्रकों-ट्रैक्टरों के कारण ट्रैफिक जाम लग गया है। मारपीट के मामले हो रहे हैं। आस पास के राज्यों के कोल्डस्टोरेज प्लॉण्ट्स को साउण्ड किया जा रहा है।

भारत में ५००० से अधिक कोल्डस्टोरेज हैं और उत्तरप्रदेश में १३०० हैं जो ९० लाख टन स्टोर कर सकते हैं। मालगाड़ी की भाषा में कहें तो करीब ३६०० मालगाड़ियां! लगता है कि कोल्डस्टोरेज आवश्यकता से बहुत कम हैं। उनकी गुणवत्ता भी स्तरीय है, यह भी ज्ञात नहीं। स्तरीय गुणवत्ता में तो आलू ८-९ महीने आसानी से रखा जा सकता है। पर हमें सर्दियों में नया आलू मिलने के पहले जो आलू मिलता है उसमें कई बार तो २५-३०% हिस्सा काला-काला सड़ा हुआ होता है।

उत्तर-मध्य रेलवे में हमने इस महीने आलू का लदान कर तीन ट्रेनें न्यू-गौहाटी और हासन के लिये रवाना की है। मुझे नहीं मालुम कि कोल्डस्टोरेज और ट्रेन से बाहर भेजने का क्या अर्थशास्त्र है। पर एक कैरियर के रूप में तो मैं चाहूंगा कि आगरा-अलीगढ़ बेल्ट से ३-४ और रेक रवाना हों! और अभी तो मालगाड़ी के रेक तो मांगते ही मिलने की अवस्था है – कोई वेटिंग टाइम नहीं!

घर पर आलू विषयक अपना काम मेरी अम्मा ने पूरा कर लिया है। आलू के चिप्स-पापड़ पर्याप्त बना लिये हैं। आपके यहां कैसी तैयारी रही?


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