राम मूर्ति तिवारी


चील्ह से गोपीगंज जाती सड़क के किनारे ही उनका घर है। वैसा ही गांव जैसे और गांव हैं पूर्वांचल के। वैसा ही घर जैसे और घर हैं पूर्वांचल के। पर और सब से हट कर भी कुछ उनके पास है। उसने मुझे आकर्षित किया। उनकी शेल्फ पर उनके युग की किताबें एक के ऊपर एक रखी हुई हैं। लगभग पूरी दो शेल्फें भरी हैं।

गांवदेहात में कोई पढ़ता नहीं किताबें होना ही आकर्षित करता है। और इतनी मात्रा में किताबें और भी! किताबें पुरानी हैं। पीली पड़ चुकी हैं। मैं और रुकता तो उन्हें उलट पलट कर देखता। अभी, उनसे केवल उन किताबों के बारे में पूछा।

“यह तो थोड़ी सी रखी हैं। और बहुत हैं। रखने को जगह नहीं है तो संदूक में रखी हैं। उपन्यास नहीं हैं। ज्यादातर धार्मिक पुस्तकें हैं या फिर कानून की। मेरी रुचि उनमें ही रही है।” – राम मूर्ति जी ने बताया।

उनकी उम्र के बारे में वे पूछने पर वे उलटा मुझसे सवाल करते हैं। “आप ही अंदाज लगायें?”

जैसा उन्होने कहा; वे अस्वस्थ हैं। सिर पर टोपी लगाये स्वेटर पहने हैं। सर्दी का असर उनपर ज्यादा लगता है। मुझे लगा कि उनकी उम्र अस्सी के आसपास तो होगी ही। उनके छोटे भाई स्वर्गीय कृष्ण मूर्ति तिवारी जी की तेरहवीं में मैं वहां गया था। छोटे भाई पचहत्तर-छिहत्तर साल के थे। उस हिसाब से मैने अंदाज लगाया – “आप अस्सी-बयासी के होंगे।”

“बयानबे। वो (छोटे भाई) मुझसे काफी छोटे थे।” – उन्होने अपनी उम्र और अपने छोटे भाई के बारे में बताया।

नब्बे के ऊपर के व्यक्ति को देख कर उनकी दीर्घजीविता और उनकी दिनचर्या के बारे में प्रश्न करना लाजमी है। मैने वही किया।

“अभी तो अस्वस्थता है। इस कमरे और साथ सटे शौचालय से अलग ज्यादा चलना नहीं होता। घुटनो में दर्द है। वर्ना पहले चार बजे उठ कर पैदल गंगा किनारे तक हो आता था। जितना नियमित और सक्रिय मेरा जीवन था, उतना आप नहीं कर पायेंगे।” – उनकी आवाज में उनकी जीवन-चर्या के बारे में एक सेन्स ऑफ प्राइड था। वह आत्मविश्वास, वह सेन्स ऑफ प्राइड कहां से आया? शायद वे अपने समय के अपने आसपास के उत्कृष्टतम व्यक्तियों में से रहे हों। वे उत्तरप्रदेश की प्रांतीय सिविल सेवा के अधिकारी रहे हैं।

अनेक प्रांतीय अधिकारियों की बात उन्हें की। कुछ के नाम मैने सुने हैं। ज्यादा नहीं जानता उनके बारे में। मेरी रुचि उनके बारे में जानने सुनने की नहीं थी। मैं उनसे धर्म और कानून (जिनकी पुस्तकें उनके पास हैं) के बारे में भी जानने की इच्छा नहीं रखता था। मैं तो उनके अनुभवों, उनकी पिछले सत्तर अस्सी साल में सामाजिक-आर्थिक परिवेश के बदलाव के बारे में उनकी सोच जानना चाहता था।

राम मूर्ति जी मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं। शारीरिक रूप से लगभग स्वस्थ हैं। नब्बे पार की उम्र वाला व्यक्ति और कितना स्वस्थ हो सकता है? उनकी वाणी भी स्पष्ट और धाराप्रवाह है। स्वतंत्रता के बाद आये इस अंचल के बदलाव को वे अच्छे से बता सकते हैं। और सिविल सेवा में रहने के कारण एक अलग कोण से भी होगा उनके बताने में। उनके पास बैठे बैठे मेरे मन में यह विचार बारबार आता रहा।

एक पुरनिया आदमी, जिसका पुस्तकों से साथ रहा हो; जो शब्दों को ओढ़ता बिछाता रहा हो वह अपने अनुभवों की अहमियत अच्छे से जान और उन्हे व्यक्त कर सकता है। बयानबे साल की उम्र के समग्र अनुभव कोई कम नहीं होते!

आसपास में ऐसा नहीं कि राममूर्ति जी ही अकेले व्यक्ति मुझे मिले हों। पर वे लोग जिनके पास अनुभव हो और उसे व्यक्त करने के लिये शब्द भी हों, कम ही मिले हैं। उनसे सम्पर्क महत्वपूर्ण होगा!

भविष्य में उनसे मिलना हुआ और ट्यूनिंग बनी तो बारम्बार मिलूंगा। इस इलाके के पिछले सत्तर साल में आये बदलाव जानने का बहुत मन है। राममूर्ति जी मेरी उस साध को साधने में शायद सहायक हों। मैं चाहूंगा कि वे दीर्घायु हों। शतायु। उनका गठिया और पैरों की सूजन उन्हें ज्यादा परेशान न करे। और उनसे मेरा सम्पर्क बना रहे।


लघुभ्रमणिका


प्रेमसागर की नित्य की पच्चीस तीस किलोमीटर की यात्राओं को दिनों दिन ट्रैक करना और उसपर लिखना मुझे बहुत भाया था। अब वह फेज नहीं रहा। प्रेमसागर अपने गांव-देश लौट गये हैं। मैं अपने परिवेश में सिमट गया हूं।

एक दिन मन में विचार आया कि नित्य 20-25किमी साइकिल तो मैं चला ही सकता हूं। क्यूं न साइकिल पर निकला जाये। बीस किमी के आगे कहीं भी रुका जाये और अगले दिन वहां से आगे। एक महीने में एक हजार किमी चला जा सकेगा। अभी भी तो तीन सौ किमी चल ही रहा हूं साइकिल से। नियमबद्ध चलूंगा तो चित्र भी खींचूंगा, लोगों से मिलूंगा और ट्रेवलॉग लिखूंगा। रोज के एक हजार शब्द। सब कुछ बहुत मोहक लगा। एक ट्रायल के लिये मैंने योजना बनाई – घर से बनारस के लिये निकलूंगा। दो रात्रि विश्राम बीच में। पहला तुलापुर में लल्लू मामा जी के घर। दूसरा सुरेश पटेल जी के घर। तीसरे दिन बनारस।

सब कुछ अच्छा लग रहा था। मैंने अमेजन पर साइकिल पर टांगने के लिये बैग भी तलाशे। वे खरीदे नहीं, विश-लिस्ट में डाल लिये। साथ में ले जाने वाले सामान की एक सूची मन में बनाई। सब मैनेजेबल लग रहा था। पर कमोड पर सूई अटक गयी। गठिया की समस्या के कारण दीर्घ-शंका के लिये मुझे कमोड की जरूरत पड़ती है। उसके बिना काम नहीं चलता। पिछले डेढ़ दशक से कमोड का ही प्रयोग कर रहा हूं। वैसे किसी स्थान की कल्पना भी नहीं कर सकता जहां पेट में दबाव महसूस हो रहा हो और कमोड की उपलब्धता न हो। पर क्या साइकिल की यायावरी में वह सुनिश्चित हो पायेगा? भारत में, गांवदेहात में तो वह मुश्किल है।

पीकू फिल्म, अमिताभ बच्चन, कार और कमोड!

मैने अमेजन पर फोल्डिंग कमोड तलाशा। उसका आकार और वजन देखा। वजन तो ज्यादा नहीं था, पर उसे ले कर चलने में जरूर नुमाईश हो जायेगी। मुझे अमिताभ बच्चन की वह फिल्म (पीकू) याद हो आई जिसमें वे कलकत्ता की कार यात्रा में कार की छत पर कमोडनुमा कुर्सी ले कर यात्रा करते हैं। … कमोड साथ में गठियाये चलने पर यायावरी का आनंद एक तरफ, एक नमूना लगूंगा मैं! पर, अगर यूं निकलना है तो और कोई चारा भी तो नहीं!

दो तीन दिन मन में फोल्डिंग कमोड वाला विचार चला। अपने मन को नुमाईशी-साइकिल यात्रा के लिये तैयार करता गया। फिर सारा विचार बेहूदा लगा। आईडिया ड्रॉप हो गया।

मुझे जॉन स्टीनबैक की “ट्रेवल्स विथ चार्ली” याद हो आई। मैने अपने को दिलासा दी – अभी तो इतने पैसे नहीं हैं, पर एक दशक में अगर मेरा पोर्टफोलियो ठीकठाक बढ़ा तो एक वैन खरीदूंगा। उसमें एक बिस्तर होगा। एक कुर्सी और एक फोल्डिंग कमोड। मेरे साथ चार्ली तो नहीं होगा, पर वैन का ड्राइवर होगा। हम मजे मजे में भारत भ्रमण करेंगे।

लेकिन, फिर सोचता हूं कि यात्रा का अनुभव लेने के लिये लम्बी यात्राओं की क्या जरूरत है? प्रेमसागर की यात्राओं में मैं तो घर से बाहर निकला ही नहीं पर घर बैठे मैने नर्मदा तट की यात्रा कर ली। गुवाहाटी से द्वारका और माहेश्वर से बद्री-केदार तक हो आया। यात्रा का पुण्य तो प्रेमसागर को मिला होगा पर अनुभव का एक बड़ा हिस्सा मुझे भी मिला।

फिर गंगा किनारे की कितनी लघुयात्रायें मैने कर ली हैं! शिवकुटी का कछार मात्र 2-चार वर्ग किमी का होगा। पर उसके सवेरे के पैदल भ्रमण में मैने गंगा के विविध रूप देखे हैं। वैसा अनुभव कितने लोगों ने लिया होगा?

कई दिनों-महीनों से मैं घर-परिसर में ही साइकिल चला रहा हूं। परिसर में एक चक्कर करीब 200मीटर का होता है। नित्य एक दो घण्टा साइकिल चलाता हूं। कान में हेड-फोन लगाये कोई पुस्तक को ऑडीबल पर सुनते हुये। पांच सात मोटी पुस्तकें जो मैं वैसे कवर-टू-कवर न पढ़ पाता, मैने इन कोल्हू-के-बैल वाली यात्राओं में पढ़/सुन ली हैं।


दो तीन दिन से कुछ अधिक दूर तक निकल रहा हूं साइकिल ले कर। सवेरे जब निकलता हूं, तो हल्का कोहरा पड़ रहा होता है। गांव की सड़क पर वाहन नहीं होते। लोग उठ रहे होते हैं। बगल की महिला, जिसके घर में हैण्डपम्प नहीं है, इधर उधर से पानी की बाल्टियां ढोती दीखती है।

आगे अमरनाथ की गुमटी खुल चुकी है। वहां कुछ लोग बोलते-गपियाते और कुछ कऊड़ा तापते दीखते हैं।

बिसुनाथ एक कमरे के घर में ओसारे में सोता है। एक ही कमरा है तो उसका उपयोग पतोहू-लड़का करते हैं। सवेरे वह अपने तख्ते पर सुखासन में बैठा दिखता है। आगे महुआरी में सामुहिक गतिविधि नजर आने लगती है। औरतें उपले बनाती हैं। पुआल की गांज के स्तूप बने हैं। एक आदमी सवेरे सवेरे अपनी भैंस को एक खूंटा गाड़ कर बांधता दीखता है। शायद भोर में उसने दूध दुह कर भैंस को महुआरी में बांधने ले आया है। आगे अमरनाथ की गुमटी खुल चुकी है। वहां कुछ लोग बोलते-गपियाते और कुछ कऊड़ा तापते दीखते हैं। एक दो मुझे नमस्कार भी करते हैं।

आगे भगवानपुर की ओर कोहरे की एक पट्टी नजर आती है। मानो सलेटी रंग का कोई बहुत मोटा अजगर जमीन पर लेटा और धीरे धीरे रेंग रहा हो।

आगे भगवानपुर की ओर कोहरे की एक पट्टी नजर आती है। मानो सलेटी रंग का कोई बहुत मोटा अजगर जमीन पर लेटा और धीरे धीरे रेंग रहा हो। उसके पीछे सूर्योदय हो चुका है। पर उनका ताप कोहरे के अजगर को खतम नहीं कर सका है। कोहरा आधा घण्टा और चलता है। उसमें से निकलते पैदल और साइकिल सवार यूं निकलते हैं मानो जादू से बन रहे हों।

भगवानपुर तक की यात्रा पूरे आधा किमी की है। मैं पैडल की गिनती से नापता हूं। 104 पैडल की दूरी है मेरे घर से। राउण्ड-ट्रिप में एक किमी और कुल छ मिनट लगते हैं। भगवानपुर तक के दस चक्कर लगाने पर सवेरे की साइकिल सैर पूरी होती है।

भगवानपुर में पानी की टंकी बन रही है। काम करने वाले कर्मी आज सवेरे ही आये हैं छुट्टी के बाद। आते ही पहला काम कऊड़ा तापने का करते हैं। उनका दृश्य ऐसा है कि मैं अपनी साइकिल रोक कर उनसे बातचीत करने और चित्र लेने पंहुच जाता हूं। इसी बीच गांव का एक नौजवान आ कर मुझे अभिवादन करता है। वह कौशल मिश्र है। उन मजदूरों को कौशल परिचय देता है कि मैं उसका रिश्तेदार हूं। मजदूर जो अब तक मेरे आने से असहज से थे, उनका जो हल्का सा तनाव था, खत्म हो गया है। बताते हैं कि टंकी का प्लेटफार्म तैयार होने में एक महीना लगेगा। उसके बाद टंकी बनेगी।

टंकी की सीढ़ियां महुआ के पेड़ में गुंथी लगती हैं। मानो कोई पूर्वोत्तर का, मेघालय का दृश्य हो।

भगवानपुर के चक्कर लगाते हुये मन में विचार आता है कि आधे किमी के इलाके में इतनी विविधता है कि उनपर रोज 1000 शब्द लिखते पचास साठ ब्लॉग लिखे जा सकते हैं। साल भर के हर मौसम में बदलते ग्रामीण परिदृश्य का लेखाजोखा। एक लघुभ्रमणिका – माइक्रोट्रेवलॉग – लिखी जा सकती है।

अगर अनुभव करना और लिखना ही ध्येय हो तो यह आधे किमी की पट्टी भी सार्थक यात्राअनुभव दे सकती है। वह लघुयात्रा जिसमें कमोड ढोने का झंझट नहीं!

यही किया जाये जीडी! लघुभ्रमणिका लेखन किया जाये! :-)


धूल से गुजरते हुये


आठ साल पहले गांव में रहने आया था तो हवा ज्यादा साफ थी। नवम्बर के महीने में साइकिल से घूमना खूब भाता था। उसके बाद धीरे हवा में प्रदूषण बढ़ा। लोग अकर्मण्य होते गये और खेती करने की बजाय खेत की ऊपरी परत – टॉप सॉईल खोद खोद कर बेचने लगे। सभी ट्रेक्टर ट्रॉलियां खेत की मिट्टी ढो कर ईंट भट्ठा वालों के यहां ले जाने लगीं। पहले भी यह होता था पर अब यह संक्रामक हो गया।

अकर्मण्यता पेण्डेमिक होती है। और उसका कोई टीका भी नहीं।

इस मौसम में हवा में नमी कम हुई और धूल बढ़ी, साल दर साल। मेरा एक्यूआई से परिचय हुआ। गांव देहात की एक्यूआई भी 160-170 रहने लगी। कभी कभी तो दो सौ के पार भी। नरक हो गया वातावरण। साइकिल ले कर घूमने में गांव की सड़कों की बजाय हाईवे की सर्विस लेन में चलना बेहतर लगने लगा। गांव की पगडण्डियों पर चलते हुये मन होता है कि मास्क लगा कर निकला जाये। अगर चश्मे पर सांसों की भाप जमने के कारण असुविधा न हो रही होती तो वैसा ही करता।

धूलमय जीवन अब न्यू-नॉर्मल है।

नक्शे में देखने पर साफ होता है कि केवल मेरे आसपास ही नहीं पूरे उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता ऐसी ही है। पूर्वोत्तर के कुछ इलकों और इक्का-दुक्का दक्षिण के स्थानों को छोड़ कर बाकी भारत की हवा खराब ही है। उत्तराखण्ड-हिमांचल में भी हवा में बड़े कण व्याप्त हैं।

अगियाबीर के गड़रियान से गुजरते हुये नाले की चढ़ाई चढ़ कर सांस कुछ फूली हुई है। धूल ज्यादा होने पर भी मेहनत कुछ ज्यादा लगती है साइकिल धकेलने में। मैं रुक कर सुस्ताने लगता हूं। पौने आठ का समय है। भेड़ें और बकरियां अभी भी बाड़े में हैं। अलग अलग झुण्ड में बंधी गायों को लोग अभी दुह रहे है। मैं भेड़ों के बाड़े का एक चित्र खींचता हूं। दूर अगियाबीर का टीला है। पहले वह साफ दीखता था। अब धूल के कारण धुंध सी छायी है। यह भ्रम होता है कि मोबाइल का कैमरा खराब हो गया है। धूल आबोहवा मैं है और हम सब आईना चमकाने में लगे हैं।

फसल की कटाई की गतिविधि सब तरफ नजर आती है। एक आदमी सगड़ी (ठेले) पर जोन्हरी के लकठे का बहुत बड़ा बोझ लादे है। मेरे द्वारा चित्र खींचने पर लजा सा जाता है। अपने से ही बताता है कि सिर पर ले कर जाता तो जितना लकठा है वह ढोने में पचास चक्कर लगाने पड़ते। “अब इस सग्गड़ से आठ दस फेरे में काम पूरा हो जायेगा।”

उसका गांव, द्वारिकापुर आधा-एक किमी दूरी पर है। पचास फेरा मतलब पचास किमी चलना। कम से कम दो दिन लगते इस काम में। शारीरिक मेहनत अलग। अब सगड़ी से एक दिन भर का काम है।

सिर पर ले कर जाता तो जितना लकठा है वह ढोने में पचास चक्कर लगाने पड़ते।

जोन्हरी का लकठा बहुत लम्बा होता है। करीब तीन – चार मीटर तक होती है लम्बाई। जोन्हरी मोटा अन्न है – मिलेट। आजकल उसका ही जमाना है। पर प्रकृति थोड़ी सी जोन्हरी की बालों के लिये इतना ज्यादा डण्ठल बनाती है। उसे भी किफायती बनना चाहिये। कृषि वैज्ञानिकों को चाहिये कि जोन्हरी की कोई पिगमी पौध विकसित करें। वह जो कम लम्बाई की हो, जिसमें बालें ज्यादा लगें और डण्ठल कम बने।

डईनिया और कोलाहलपुर के बीच में सड़क किनारे सरपत फूल गया है। हल्के गुलाबी-बैंगनी रंग की आभा है सफेदी लिये सरपत के फूल में। सुंदर लगते हैं ऊंचे ऊचे सरपत। उनमें पहले बया के अनेक घोंसले होते थे। पर साल दर साल सरपत का ज्यादा से ज्यादा दोहन किया है लोगों ने। अब बया की संख्या कम होती गयी है। आज वहां से आते जाते मुझे एक भी बया नजर नहीं आई। उनका कोई घोंसला भी नहीं नजर आया।

डईनिया में बाबूलाल और उसकी पत्नी दीखते हैं। बाबूलाल बूढ़ा है। कान से सुनता भी बहुत कम है। पहले आते जाते उसे खाट पर लेटे-ऊंघते पाया करता था मैं। दूसरी खाट पर उसकी पत्नी लेटी रहती थी। मुंह पूरी तरह खोले सोती हुई। पर आज उन दोनो को आपस में बोलते बतियाते पाया। पहले मुझे लगता था कि ये दोनो ज्यादा जीने वाले नहीं हैं। पर आज उनकी चैतन्यता और एक दूसरे से चोंच में चोंच डाल बतियाते देख मुझे विश्वास हो गया कि वे चलेंगे। एक दशक भर तो चलेंगे ही। उससे ज्यादा भी।

चलने और जीने की बात से अपनी याद हो आई। अभी हाल ही मैं मैंने अढ़सठ साल पूरे किये हैं। रोज दस किमी साइकिल चलाना हो रहा है। यहां गांव में आने के बाद स्वास्थ पहले से बेहतर ही हुआ है। बावजूद इसके कि गांव की आबोहवा खराब हुई है; मन में खिन्नता जब तब घर कर लेती है; कोई बड़ा ध्येय समझ नहीं आता; तब भी लम्बा चलने का आशावाद बना हुआ है।

धूल से गुजरते हुये भी आशावाद!


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