ब्लॉग सेग्रीगेटर – पेरेटो सिद्धांत लागू करने का जंतर चाहिये



पेरेटो 80/20 का सिद्धांत सांख्यिकीय सत्य है. हमारे 20% यत्न हमारे 80% सफलता के जन्मदाता हैं. वह 20% ही है जो महत्वपूर्ण है. उसपर ध्यान दिया जाना चाहिये. उसी प्रकार इस सिद्धांत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समग्र ब्लॉग-पोस्ट्स में से हमारे काम की सामग्री 20% पोस्टों में है. यह सामग्री अलग-अलग व्यक्ति के लिये अलग-अलग हो सकती है. पर इस सामग्री को किस प्रकार से कम से कम प्रयत्न से ढूंढ़ा जा सकता है? इस का जंतर चाहिये.

ब्लॉग लेखन में क्या लिखना चाहिये कि उसे अधिकाधिक लोग पढ़ें – यह आत्म विश्लेषण और टिप्पणियों/स्टैटकाउण्टर के आंकड़ों के ऊपर ध्यान देने से ज्ञात हो सकता है. उसके आधार पर हम अपने लेखन को अपने टार्गेट(या अधिकाधिक) पाठकों के 20% महत्वपूर्ण पठनीय अंश योग्य बनाने का सांचा दे सकते हैं. पर पूरे ब्लॉग लेखन में अपने काम का 20% छांटना कैसे सम्भव हो, यह अभी तक सुपुष्ट स्ट्रेटेजीबद्ध नहीं हो पाया है. समीर लाल जी की तरह समग्र हिन्दी ब्लॉगस्फीयर को पढ़ पाना सम्भव नहीं. वे भी अगर समग्र पढ़ते हैं तो किसी नीति के तहद ही करते हैं. उनका हिन्दी ब्लॉग जगत में लगाव एक प्रकार का अनूठा है. उनकी अभीप्सा का सफल अनुकरण करना कठिन है.

गूगल रीडर के प्रयोग से समस्या का आंशिक समाधान हो जाता है. पर रोज 4-5 नये ब्लॉग/फीड – हिन्दी या अंग्रेजी में और जुड़ते हैं; जिनमें काम की सामग्री मिलती है. असल में लेखन का विस्फोट इतना है कि समेटना कठिन लगता है. जरूरत एक इण्टेलिजेण्ट ब्लॉग सेग्रीगेटर की है – ब्लॉग एग्रीगेटर की उतनी नहीं. चिठ्ठाचर्चा इस फंक्शन को नहीं कर पाती. उसमें एक व्यक्ति, अपनी च्वाइस के अनुसार, बहुधा हबड़-धबड़ में, बहुत से नाम घुसेड़ने के चक्कर में कई बार न चाहते हुये भी गुड़ कम गोबर ज्यादा कर देता है. चिठ्ठाचर्चा अपने वर्तमान स्वरूप में 20% सामग्री के चयन का तरीका नहीं बन सकती. दूसरे वह दिन में एक बार होती है – तब तक तो बहुत पठनीय सामग्री की बौछार हो चुकी होती है.

ब्लॉग सेग्रीगेटर तो एक टीमवर्क होगा. मेरे विचार से उसमें ब्लॉग एग्रीगेटर की तकनीक और ब्लॉग सेग्रीगेटर्स की टीम अगर सिनर्जी से काम करे तो बड़ी अद्भुत चीज बन सकती है. उससे जो ब्लॉग सामग्री की झांकी का प्रस्तुतिकरण होगा वह प्रत्येक पाठक को उसकी रुचि का 20% महत्वपूर्ण तत्व चुनने में सहायक होगा. खैर, मैं तो क्लीन स्लेट से सोच रहा हूं. जिन लोगों को तकनीक और लेखन दोनों की पर्याप्त जानकारी है; उन्हें आगे आकर त्वरित सोच और कार्रवाई करनी चाहिये.

मैं हिन्दी ब्लॉग जगत के टीम-वर्क की ताकत और वर्तमान की लिमिटेशन भी देख रहा हूं. ब्लॉगवाणी अगर एक जवान का क्रियेशन है – तो वह जुनून अनुकरणीय है. टीम छोटी, डेडीकेटेड और कमिटेड होनी ही चाहिये.

हिन्दी ब्लॉग जगत में लोगों ने भूत काल में बड़े और महत्वपूर्ण कार्य किये हैं – क्या उन्हे मेरे कहे में कुछ सारतत्व लगता है? या फिर वह अनर्गल प्रलाप लगता है?


बिल गेट का 640KB वाला कोटेशन



कल मुझे इण्टरनेट सर्फ करते फिर कहीं पर बिल गेट का 640KB वाला कोटेशन दिखा:

“640KB किसी के लिये भी पर्याप्त होना चाहिये.”

—(तथाकथित रूप से बिल गेट्स, 1981)

बिल गेट्स ने स्वयम कहा है कि यह उन्होने नहीं कहा और शब्द उनके मुह में डाले जा रहे हैं. (यद्यपि दाल में कुछ काला लगता है!)

पर यह कोटेशन सही न भी हो, बहुतेरे ऐसे कोटेशन हैं जो बड़े-बड़े विषेशज्ञों की भविष्य के प्रति सोच को बड़े सपाट तरीके से गलत साबित करने और उनके वैचारिक मायोपिया को समझने में सहायक होते हैं. ऐसे ही कुछ कोटेशन जोएल अर्थर बार्कर ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक “द फ्यूचर एज़ (1992)” में दिये हैं.@

जरा महान लोगों के भविष्य दर्शन को देखें (ये विचारवानों के सोच में छिपे मायोपिया को उजागर करते हैं):


“यह एक अव्यवहारिक (भले ही असंभव न हो) और बेमतलब की सोच है कि हवा से भारी मशीनें उड़ सकेंगी.”

—सिमोन न्यूकॉम्ब, खगोल वैज्ञानिक, 1902

“यह एक गपोड़ी सोच है कि लम्बी दूरी के यात्रियों को लाने ले जाने में मोटर गाड़ियां (ऑटोमोबाइल) रेलवे का स्थान ले सकेंगी.”

—अमेरिकन रोड कांग्रेस, 1913

“कोई सम्भावना नहीं है कि मानव परमाणु की ऊर्जा को प्रयोग में ला सकेगा.”

—रॉबर्ट मिलिकन, भौतिकी के नोबल पुरस्कार विजेता, 1920

“कौन बेवकूफ एक्टर को बोलते हुये देखना चाहता है?”

—हैरी वार्नर, वार्नर ब्रदर्स पिक्चर्स, 1927

“कोई जरूरत ही नहीं है कि हर आदमी के पास अपने घर में कम्प्यूटर हो.”

—केन ओल्सन, अध्यक्ष, डिजिटल इक्विपमेण्ट कॉर्पोरेशन, 1977


@ – Quoted in “Leading Consciously”, Debashish Chatterjee, Butterworth-Heinemann, 1998-99.


जॉर्ज फर्नाण्डिस के लिये ट्रेन में साइड बर्थ



संजय तिवारी ने अपने ब्लॉग विस्फोट में जॉर्ज फर्नाण्डिस के किसी करीबी के हवाले से लिखा है कि वे टीवी न्यूज चैनल नहीं देखते. इसपर मुझे पुरानी याद हो आयी.

रतलाम में मेरे चेलों ने एक बार फंसा दिया था. मेरे जिम्मे रतलाम रेल मण्डल का वाणिज्य प्रबन्धन था. उसमें वीवीआईपी मूवमेण्ट भी शामिल होता है. जॉर्ज फर्नाण्डिस उस समय रक्षा मंत्री थे और मामा बालेश्वरदयाल के बीमार होने के कारण उनसे मिलने बामनिया (रतलाम और दाहोद के बीच मध्यप्रदेश सीमा पर आदिवासी बहुल कस्बा) आये थे.

मामा बालेश्वर दयाल की आदिवासियों में बड़ी पहुंच थी. उनके बीच रहते थे और उनके कल्याण के लिये बहुत कार्य किया था. समाजवादी थे सो जॉर्ज फर्नाण्डिस उनके घनिष्ठ थे. कालांतर में मामा बालेश्वर दयाल का निधन हो गया.

वापसी में जॉर्ज को दिल्ली जाना था. ट्रेन सर्विस में. कोई ताम-झाम नहीं था. सामान्य सा मैसेज. इस प्रकार के मैसेज पर ट्रेन में बम्बई से जगह आती थी. वीवीआईपी चले जाते थे. पर कहीं चूक हो गयी. जिस कोच में जॉर्ज को जाना था वह कोच उस दिन ट्रेन में था ही नहीं. अत: जॉर्ज फर्नाण्डिस के लिये गाड़ी में जगह आई ही नहीं. ऐन मौके पर मची अफरातफरी. गाड़ी में भीड़ भी बहुत थी. कुल मिला कर जॉर्ज के लिये एसी शयनयान में साइड की बर्थ मिल पाई. पर जॉर्ज इतने सज्जन थे कि आये और चुपचाप साइड की अपनी बर्थ पर चले गये. स्थिति देखकर मैने अपना वीवीआईपी-सम्भालू इंस्पेक्टर गाड़ी में भेजा था. बाद में उनके लिये अन्दर की बे का इंतजाम हो गया पर उन्होने कहा कि वे वहीं ठीक हैं. रास्ते में बच्चों को ऑटोग्राफ देते और उनसे बतियाते वे चले गये.

ट्रेन में अपने लिये मन मफिक जगह के लिये रक्षा मंत्री तो क्या; सांसद-विधायक बहुत उछल कूद मचाते हैं; पर जॉर्ज फर्नाण्डिस ने सज्जनता का परिचय दे कर हमारा दिल जीत लिया.

बाद में उनके एक अंतरंग सज्जन ने बताया कि जॉर्ज अपने कपड़े खुद धोते हैं. चार कुर्ते-पजामे का वार्डरोब है उनका (शायद बतौर रक्षामंत्री कुछ और कुर्ते-पजामे सिलाये हों). उनमें से दो सेट पहनते हैं और दो रिजर्व में रखते हैं. कंघी करने की उनको जरूरत नहीं पड़ती.

राजनीति में जो दन्द-फन्द चलते हों और उनमें जॉर्ज की जो भूमिका हो; वह छोड़ दें. बतौर व्यक्ति तो सरलता की छाप उन्होने हमपर डाल ही दी.


बायीं ओर जॉर्ज फर्नाण्डिस का चित्र और दायीं ओर मामा बालेश्वर दयाल की प्रतिमा.

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