देश में अमन है, चिठ्ठों में अराजकता


एक चिठ्ठा निकाल दिया गया नारद की फीड से. उसकी भाषा देख कर तो लगा कि उचित ही किया. व्यक्ति लिखने को स्वतंत्र है तो फीड-एग्रीगेटर समेटने में. मुझे उस बारे में चौपटस्वामी/प्रियंकर की तरह बीच बचाव करने/पंच बनने का कोई मोह नहीं है. मेरे विचार से जब तर्क और सम्वेदना में द्वन्द्व हो – तो तर्क की चलनी चाहिये. प्रशासन में मेरे सामने जब अथॉरिटी और कम्पैशन में द्वन्द्व होता है तब मैं अथॉरिटी को ऊपर रखता हूं. उसमें फिर चाहे कर्मचारी निलम्बित हो या नौकरी से जाये; मोह आड़े नहीं आता. फीड-एग्रीगेटर के पास ऐसी अथॉरिटी है कि उसके प्युनिटिव एक्शन से इतना सेंटीमेण्टल रिप्रजेंटेशन इतने सारे ब्लॉगों/टिप्पणियों मे दिखे – यह मुझे अजीब लगता है. नारद वालों की अथॉरिटी से ईर्ष्या भी होती है. काश मेरे पास भी ऐसा फीड-एग्रीगेटर होता!

मेरे तीन ऑब्जर्वेशन हैं –

  1. देश में अमन चैन है – कमोबेश. तो चिठ्ठों में यह अराजकता और जूतमपैजार क्यों है? हर आदमी चौधरी (जीतेन्द्र से माफी!) क्यों बन रहा है? असगर वजाहत की कथा – टीज़ करने को त्रिशूल का प्रतीक – क्यों फंसाया जा रहा है बीच में? असगर जी शरीफ और नॉन-कंट्रोवर्शियल इंसान होंगे; पर उनकी कहानी का (कुटिलता से) दुरुपयोग क्यों हो रहा है? भाईचारे का भी वृहत साहित्य है – उसकी ज्ञान गंगा क्यों नहीं बहाई जा सकती? इतिहास देखें तो कौन सा धर्म है जिसमें किसी न किसी मोड़ पर बर्बरता न हो. फिर हिन्दू और मुस्लिम बर्बरता को अलग-अलग खेमों में अलग-अलग तराजुओं मे डण्डी मार कर क्यों तोला जा रहा है? कोई आदमी केवल ब्लॉग पढ़े तो लगेगा कि देश इस समय घोर साम्प्रदायिक हिंसा से ग्रस्त है. और उसमें भी गुजरात तो भस्म-प्राय है. है इसका उलट – देश मजे में है. रिकार्ड तोड़ जीडीपी ग्रोथ हो रही है और गुजरात उसमें अग्रणी है!
  2. समाज में आवाजें कैसे उठती हैं; उनका मेरा यह 3-4 महीने का अनुभव है. कोई अच्छा अनुभव नहीं है. आपस में नोक-झोंक चलती है. कभी-कभार पारा बढ़ सकता है. उसके अलावा अगर कोई ज्यादा ही छिटकता है तो उसपर या तो राजदण्ड या विद्वत-मत या फिर आत्मानुशासन काम करना चाहिये. पर इतने सारे लोग एक साथ अगर कुकरहाव करने लगें तो उसे एनार्की ही कहा जायेगा. हिन्दी ब्लॉगरी में वही दिख रहा है. अचानक चिठ्ठों का प्रॉलीफरेशन और नयी-नयी बोलने की स्वछन्दता लोगों के सिर चढ़ गयी है. उतरने में समय लगेगा.
  3. सेकुलरहे पता नहीं किस स्ट्रेटेजी से काम करते हैं मोदी को गरियाने में? असल में पूरे देश में अगर राम-राज्य होता तो मोदीजी को परेशानी हो सकती थी. पर अन्य प्रांतों की बजाय गुजरात बेहतर है. ऐसे में मोदी को गरियाना वैसा ही है जैसे लोग अमेरिका/रिलायंस/टाटा/वाल-मार्ट/इन्द्रा नूई को गरियायें. समर्थ को ही गरियाया जाता है. पर उससे मोदी को कोई फरक नहीं पड़ता; उल्टे मोदी को लाइमलाइट मिलती है. वे जितना मोदी बैशिंग करते हैं; मोदी के चांसेज उतने ब्राइट होते जाते हैं!

भाइयों, जरा चीनी का प्रयोग बढ़ाइये!


बड़ा झमेला है. चीनी के शेयर ऐसे लमलेट हैं कि बैठने का नाम नहीं ले रहे. उठ खड़े होने की कौन कहे. शरद पवार को पहले चिदम्बरम ने बीमार कर दिया जब चीनी एक्सपोर्ट पर बैन लम्बा खिसका दिया. बैन उठा भी तब जब दुनिया में चीनी की बम्पर क्रॉप सामने थी. पेट्रोल के दाम भी बढ़ नहीं रहे हैं कि उसके विकल्प के लिये विलाप तेज हो. एथेनॉल का फण्डा जोर पकड़ ही नही रहा. चीनी कम्पनियां डोलड्रम में हैं. साथ ही हम जैसे भी डोलड्रम में है, जिनके पास चीनी के थोड़े शेयर हैं.

दफ्तर में चाय-पान का मेरा थोड़ा कोटा है. उसमें मैं महीने भर के लिये ईक्वल लो कैलोरी स्वीटनर भी आता है. अब मैं सोचता हूं वजन बढ़ने के भय की ऐसी-तैसी. चीनी का प्रयोग प्रारम्भ किया जाये. कुछ तो फर्क पड़े चीने के शेयरो की कीमत में. पोर्टफोलियो सुधारना वजन कम रखने से ज्यादा जरूरी है.

शरद पवार जी को तो बी.सी.सी.आई. के मामलों से फुर्सत नहीं है. कोच ढ़ूंढना ही मुश्किल काम लग रहा है. एक के बाद एक, जिनको बीसीसीआई ऑफर दे रहा है, वे अपनी अनिच्छा की घोषणा मीडिया में पहले कर रहे हैं, उन्हें बाद में बता रहे हैं. चीनी की कड़वाहट दूर करने के लिये समय ही नहीं निकल पा रहा है शायद? अब आप चिठेरे लोग ही हैल्प करें, साहबान!
जरा चीनी का प्रयोग बढ़ायें! कृपया, एक-दो रसगुल्ले ही गपकने लगें रोज! और कहीं मुफ्त में मिलें तो चार से कम न खायें.

लेखक और ब्लॉगर में फर्क जाना जाये


पता नहीं स्कूल के दिनों में कैसे मुझे गलतफहमी थी कि हिन्दी मुझे बहुत अच्छी आती है बस, मेरे मन में फितूर आ गया था लेखक बनने का. जिसे मेरे पिता ने कस के धोया. उनके अनुसार अगर प्रोफेशनल डिग्री हासिल कर ली तो कम से कम रोटी-पानी का जुगाड़ हो जायेगा.

मैने भी वही किया और मैं अपने को बेहतर अवस्था में पाता हूं. वर्ना हरिवंशराय बच्चन जैसी सोशल नेटवर्किंग तो कर नहीं पाता. निराला जैसा बनने की क्षमता न होती और बनता तो भी फटेहाल रहता. हिन्दी में बीए/एमए कर कई साल सिविल सेवा परीक्षा में बैठता और अंतत: किराने की दुकान या क्लर्की करता.

इस लिये जब सत्येन्द प्रसाद श्रीवास्तव जी ने ब्लॉगर को लेखक कहा तो मैं अपने को बागी महसूस करने लगा.

लेखक और ब्लॉगर में मूल भूत अंतर स्पष्ट करने को हम मान सकते हैं कि लेखक मूर्तिकार की तरह है. वह एक अच्छी क्वालिटी का पत्थर चुनता है. अच्छे औजार लेता है और फिर परफेक्शन की सीमा तक मूर्ति बनाने का यत्न करता है. ब्लॉगर तलाशता है कोई भी पत्थर – सैण्ड स्टोन/चाक भी चलेगा. न मिले तो पेड़ की सूखी जड़/पत्ती/कबाड़/या इनके कॉम्बीनेशन जिसे वह फैवीकोल से जोड़ ले – वह भी चलेंगे. इन सब से वह प्रेजेण्ट करने योग्य वस्तु बना कर ब्लॉग पर टांग देगा. वह भी न हो पाये तो वह किसी पत्थर को पटक कर अपना सौभाग्य तलाशेगा कि पटकने से कोई शेप आ जाये और आज की ब्लॉग पोस्ट बन जाये. यह व्यक्ति लेखक की तुलना में कम क्रियेटिव नहीं है और किसी भी लेखक की अभिजात्यता को ठेंगे पर रखता है.

ब्लॉगर के दृष्टांत देता हूं. सवेरे मॉर्निंग वाक करते मैने नीलगाय की फोटो मोबाइल के कैमरे से उतारी थी और 25 मिनट फ्लैट में ब्लूटूथ से फोटो कम्प्यूटर में डाउनलोड कर, पोस्ट लिख कर और वह फोटो चिपका कर पोस्ट कर चुका था इंटरनेट पर. उसके बाद वह पोस्ट भले ही एडिट की थी दिन में, पर ब्लॉगरी का रैपीडेक्स काम तो कर ही दिया था. कौन लेखक इस तरह का काम करेगा? चाहे जितना बोल्ड या डेयरिंग हो; पच्चीस मिनट तक तो वह मूड बनाता रहेगा कि कुछ लिखना है! फिर फोटो खींचना, डाउनलोड करना, चिपकाना – यह सब तो 4-इन-1 काम हो गया !!

इसी तरह मैने अपनी पिछली ओधान कलेन पर लिखी पोस्ट आनन फानन में चिपकाई थी. बस उस बन्दे का काम पसन्द आ गया था और मन था कि बाकी जनता देखे.

मिर्ची सेठ की देखो भैया पैसा ऐसे बनता है और हवा से चलती गाड़ी मुझे बहुत पसन्द आईं. इनमें कौन सा लेखकत्व है – जरा देखें. पिद्दी-पिद्दी से साइज़ वाले लेखन की, फोटो लगी पोस्टें है ये.

कई लोग ब्लॉगरी में इसी तरह लठ्ठ मार काम कर रहे हैं. यह बड़ा इम्पल्सिव होता है. कई बार थूक कर चाटने की अवस्था भी आ सकती है. पर जब आप मंज जायें तो वैसा सामान्यत: नही होता. और आप उत्तरोत्तर कॉंफीडेंस गेन करते जाते हैं.

श्रीवास्तव जी, आपको मेरे कहने में कुछ सब्स्टेंस लग रहा है या नहीं? अगर आप लेखक हैं तो शायद यह कूड़ा लगेगा – वैसे भी काकेश का कहना है (?) कि यहां चिठेरी में 75% कूड़ा है!

(इसी कूड़े के बाजू में कृष्ण जी को बिठा दिया है!)

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