बंधुआ मजदूरी का आधुनिक रूप 


रैट रेस में अपने को पेरते लोग — क्या बंधुआ मजदूर हैं? मैं साइकिल ले कर ईंट भट्ठा वाले मजदूरों को देखता हूं और स्लिंग बैग लिये बम्बई की सबर्बन ट्रेन में बैठे मोबाइल पर फेसबुक स्क्रॉल करते या ट्रेन के गेट पर रील बनाते नौजवान की कल्पना करता हूं।

कौन बंधुआ मजदूर है और कौन नहीं? शायद दोनो हैं।

ईंट भट्ठा का मजदूर जानता है कि वह बंधुआ है। उसने कर्जा ले रखा है। अहसान के तले दबा है। जब तक वह कर्जा भरेगा नहीं, बंधुआ चंगुल से छूटेगा नहीं। और छूटना आसान भी नहीं है। पठानी ब्याज से वह कर्जा बढ़ता ही जाता है।

आज का बहुत “सभ्य”, “डिजिटल” और “स्वैच्छिक दिखने वाला” आदमी भी किसी न किसी रूप में बंधुआ ही है। फर्क बस इतना है कि आज आदमी को रस्सी और जंजीर से नहीं, ऐप, ईएमआई, रेटिंग और डेटा से बाँधा जाता है। मजे की बात यह है कि इस डिजिटल बंधुआ को पता ही नहीं कि वह बंधुआ है।

उबर/स्विगी/जोमेटो वाला नौजवान कितना स्वतंत्र दिखता है। पर एप्प उसकी रस्सी थामे है। वही तय करता है कि कितना काम मिलेगा, कहां तक दौड़ लगानी है, देर होने पर रेटिंग कितनी गिरेगी। रेटिंग गिरी तो कमाई रुकी। तब बाइक और फोन की ईएमआई भरने के लाले पड़ जायेंगे।

फिर वह किसी एप्प से लोन लेगा। फिर नई ईएमआई! यह बंधुआ मजदूरी से कितना अलग है? … वह नौजवान डिजिटल बॉन्डेड लेबर ही है।

हालांकि यह भी सच है कि बहुतों के लिये यही ऐप पहली बार गांव, जाति और सीमित अवसरों की दुनिया से बाहर निकलने का रास्ता भी बने हैं। वे पूरी तरह खलनायक नहीं हैं। पर सवाल यह है कि आदमी आजादी पा रहा है या सिर्फ बंधन का नया और चमकीला संस्करण?

पहले आदमी खेत में हरवाही करता था, अब वह सबस्क्रिप्शन की, ईएमआई की हरवाही कर रहा है — घर, कार, मोबाइल, सॉफ्टवेयर सबस्क्रिप्शन, क्लाउड स्टोरेज, हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम — सब किसी न किसी साहूकार का महीन जाल है।

क्रेडिट रेटिंग का नया निपुरचरखा है। अब सोशल रेटिंग भी है। आपने गाड़ी ठीक से पार्क नहीं की, आपकी रेटिंग डाउन। आपने किश्त नहीं भरी, आपकी साख कमजोर। अदालत भले ही आपको मुजरिम न माने; एप्प आपको हल्के से ओवरलुक कर देगा।

और सबसे खतरनाक बंधुआ शायद हमारी इंफ्ल्युएंसर–कंटेंट क्रीयेटर जमात है। एक्स, फेसबुक, इंस्टा और यू-ट्यूब पर आदमी अपना समय, अपनी भावनायें, अपना सही और छद्म रूप फैलाता है। बदले में वह डोपामाइन पाता है। इस इलाके में खेत की हरवाही नहीं है, “दिमाग की मजदूरी” है। आदमी खुद ही अपना शोषण कर रहा है और उसे पता भी नहीं।

वह बीमार पड़ता है तब भी मोबाइल नहीं छोड़ता। अस्पताल और नर्स–डॉक्टर का रील बनाने लगता है। एमआरआई के लिये ले जाया जाता है, पर बीच में एक झलक देख लेता है — फॉलोवर बढ़े या नहीं? लाइक्स आये या नहीं?

वह चाहे तो एक दिन में यह सब छोड़ सकता है। उसके पैरों में असली बेड़ियां नहीं हैं। फिर भी वह भागता नहीं।

बंधुआ मजदूरी - पुराना और नया रूप
बंधुआ मजदूरी – पुराना और नया रूप

उन्नीसवीं सदी में हेनेरी डेविड थरू नाम का एक आदमी अमेरिका में वाल्डन नाम के तालाब के किनारे जा कर अकेला रहने लगा था। उसने लिखा कि आदमी जितनी चीजों का मालिक बनता जाता है, उतना ही उनका नौकर होता जाता है। आज का आदमी थरू से कहीं ज्यादा पढ़ा-लिखा, जुड़ा हुआ और “स्मार्ट” है; पर शायद उतना स्वतंत्र नहीं।

पुरानी बेड़ियां लोहे की थीं। नई बेड़ियां असीमित आकांक्षा, तुलना और घनघोर असुरक्षा की भावनाओं की हैं।

गंगा स्नान को आये चौबे जी बता रहे थे उनके गांव के रसूखदार ने एक परिवार को लड़की की शादी के मौके पर दहेज के लिये कर्जा दिया है। वह रसूखदार की दो-तीन साल बंधुआ मजूरी करेगा — ऐसा सुनने में आया है।

पर वह यूट्यूबर या इंस्टा पर रील बनाने वाला कब तक खटेगा स्वैच्छिक बंधुआगिरी में? 

कौन सी बंधुआ मजदूरी ज्यादा खतरनाक है — ईंट भट्ठा वाली या डिजिटल संसार में आजकल वाली?

ψψψ

कंकही का भविष्य


महान पुरातत्वविद डा. बी. बी. लाल की पुस्तकें पढ़ता हूं तो अपने समय की अनेक वस्तुएं चार–पांच हजार साल पहले से जुड़ी नजर आती हैं। मोहनजोदड़ो काल की महिला की मांग का सिंदूर, बच्चों के खिलौने, दर्पण में निहारती स्त्री, गंधार काल की सुंदरी का केश-विन्यास और कंकही — सब तब भी थे और आज भी हैं।

आज हैं, पर आगे भी रहेंगे?

कंकही आज दिखती है। हाथीदांत या लकड़ी की नहीं, प्लास्टिक की ही सही, पर है तो। पर क्या आज से तीस साल बाद भी वह घरों में दिखेगी?

बदलती तकनीक ने गांवदेहात में ही बहुत कुछ लोप कर दिया है। अब कहीं बैलों से खेती होती दिखती है तो तुरंत जेब पर हाथ जाता है — मोबाइल निकाल कर चित्र ले लिया जाये! क्या पता आगे हल-बैल केवल संग्रहालयों या कैलेंडरों में बचें।

यहां खेतों में ढेरों कुएं हैं जो कभी धान की खेती में पुरवट चलाने के काम आते थे। अब पुरवट लोगों की स्मृति में बचा है। और जिनकी स्मृति में है, वे भी एक-एक कर जा रहे हैं।

आज से तीस साल पहले गया कोई किसान यदि अचानक जीवित हो उठे तो आज की खेती को पहचान ही न पाये। जबकि तीन हजार साल पहले का किसान तीस साल पहले की खेती में अपने को शायद सहज महसूस करता। समय पहले भी बदलता था; पर अब वह दौड़ रहा है।

खैर, कंकही पर लौटा जाये।

कंकही के बहाने भविष्य की चर्चा
कंकही के बहाने भविष्य की चर्चा

मुझे लगता है कि आने वाले समय में वह घरों से धीरे-धीरे गायब हो सकती है। बालों की देखरेख के तरीके बदल रहे हैं। मेडिकेटेड शैम्पू का प्रयोग बढ़ा है। जुएं भले पूरी तरह समाप्त न हों, पर उनका प्रकोप कम होता जायेगा। और जूं से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह सामाजिक संसार, जिसमें कंकही का उपयोग होता था।

परिवार छोटे हो रहे हैं। खाली समय कम है। जो समय बचता है, वह नेटफ्लिक्स और मोबाइल की स्क्रीन ले लेती है। महिलाओं और लड़कियों के बाल छोटे हो रहे हैं। स्कूल अधिक स्वच्छ हो रहे हैं। शैम्पू के छोटे शेशे अब गरीब से गरीब की पहुंच में हैं।

धीरे-धीरे जूं निकालना घरेलू सामाजिक क्रिया से बदल कर बाजार आधारित सेवा बन सकता है। समस्या बड़ी हुई तो शायद ब्यूटी पार्लर में “एंटी-लाइस ट्रीटमेंट पैकेज” मिलने लगे।

कंकही का लोप केवल एक उपकरण का लोप नहीं होगा। उसके साथ वह धीमा समय भी जायेगा जिसमें कोई मां, बहन, बेटी या दादी दूसरे के बालों में बैठ कर कंकही चलाती थी, बतकही करती थी, कहानी सुनती-सुनाती थी।

क्या पता शहरों में यह सब शुरू भी हो चुका हो। आखिर मेरी जानकारी समय के साथ उतनी तेजी से अपडेट तो नहीं ही हो रही।

ψψψ

गांव भर का हाल


कुल बीस मिनट लगते हैं उसे मेरे जोड़ों की मालिश करने में। इस दौरान मैं सामान्यत: टैब पर कोई लेख या अख़बार का सम्पादकीय सुनता रहता हूं। आज टैब पास नहीं था और वह आ गया।

मेरे पास समय था और उसके हाथ, यद्यपि व्यस्त थे, पर बात-चीत तो वह कर ही सकता था। मैंने पूछना शुरू किया। शुरुआत रेलवे स्टेशन से की। 

स्टेशन मास्टर बदल गये हैं। कोई बिहारी नौजवान आया है। शायद ज्यादा दिन न रुके। आजकल लोग स्टेशन की कॉलोनी में रहने की बजाय शहर रह कर मोटर साइकिल से रोज़ आना-जाना बेहतर समझते हैं। सड़कों और हाईवे ने दूरी छोटी कर दी है। स्टेशन के पुराने मकानों में अब शायद आदमी कम, कीड़े-मकोड़े और सांप ज्यादा रहते होंगे।

“नया मास्साब गांव के बड़े लोगों से मिलने-जुलने जाता है?” — मैंने पूछा।

वह हल्का हंसा। “वह जमाना चला गया। तब रेलवे वाले गांव पर निर्भर रहते थे। अब गांव वाले रेलवे पर निर्भर हैं।”

सच ही तो है। प्लेटफार्म गांव का बैकयार्ड बन गया है। कोई वहां सोता है, कोई बच्चों को खेलने छोड़ देता है, कोई शाम की सैर करता है। गांव रेलवे का उपयोग भी करता है, अतिक्रमण भी। और मेरे भीतर का पुराना रेलवे अफसर अब भी कभी-कभी फुंफकार उठता है।

मैंने गांव के लोगों का हाल पूछना शुरू किया — “फलाने कैसे हैं? सुना था खटिया पकड़ लिये थे।”

गांव का हाल
गांव का हाल

“नाहीं, अब ठीक नहीं होंगे। जब से खेत बेचे हैं, तबियत गिरती गई। आदमी खेत बेच दे तो भीतर भीतर टूट जाता है। वैसा ही हुआ है उनके साथ।”

फिर वह गांव के बूढ़ों का ब्यौरा देने लगा। “जेकर देखअ, गोड़-घुटना पकड़ लिहे बा। कोई एक लाठी लेके चलता है, कोई दुनो हाथ में।” किसी की टांग सूज गई है, किसी की कमर झुक गई है। वह हाथों से सूजन का आकार भी बता देता है।

“भगत जी कथा कहते हैं अभी?”

“रोजन्ना। तीस-पैंतीस गदेला इकट्ठा हो जाते हैं।”

“सुनने?”

“नाहीं, प्रसाद खातिर। रोज लाची-दाना बंटता है। अब कह रहे हैं पेड़ा बांटिये।”

उसने आसपास के लगभग तीन दर्जन बच्चों के नाम भी गिना दिये जो कथा से ज्यादा प्रसाद के लालच में नियमित श्रोता हैं। बच्चों के अलावा उम्रदराज — जिनको जरूरत है कथा श्रवण की — वे कन्नी काटते हैं। 

अच्छा ही है। लाची-दाना या पेड़े की आशा में बच्चों को ही सही, कुछ रामायण-पुराण कान में पड़ जाता होगा।

उसका काम खत्म हो गया था। मेरे पास सप्लीमेंट्री प्रश्न अभी बहुत थे। पर अब उसे गमलों में पानी डालना था, आंधी से टूटी डालियां भी शायद छांटनी थीं। काम इंतजार नहीं कर सकता; मेरे प्रश्न कर सकते हैं।

ψψψ

Design a site like this with WordPress.com
Get started