सवेरे का सपना था, इसलिये याद रह गया।


सवेरे का सपना था। इसलिये याद रह गया। वह सड़क किनारे बैठा था। बगल में बरसात का पानी भरा एक छोटा गड्ढा था। कीचड़ था। रात में पानी बरसा होगा। उसे उठने की जल्दी नहीं थी। मैंने नोटबुक निकाली। पता नहीं सपने में नोटबुक कहाँ से आ गई। पूछा – “जमीन पर क्यों बैठे हो?”Continue reading “सवेरे का सपना था, इसलिये याद रह गया।”

मेरी चाय की दुकान की सोच


अदरक, कालीमिर्च, चायमसाला और चायपत्ती प्रति कप कितनी मिलानी है और दूध का प्रयोग किस प्रकार करना है कि दूध फटे नहीं — यह सब इतना कर लिया है कि एक थीसिस लिख सकता हूं। और बात केवल चाय बना सकने की नहीं है। चाय प्रेम भी प्रकृति प्रेम से कम नहीं है।

सपने में सिर काटई कोई


ऐसा नहीं कि चोरी-उचक्कई-जहरखुरानी आदि होती नहीं हैं। पर उनके प्रति मुझमें सेंसिटिविटी का अभाव जरूर था। मुझे याद है कि रेलवे में हो रही जहरखुरानी पर मीटिंगों में चर्चा के दौरान जब बाकी सभी अधिकारी तत्मयता से उसमें भाग लेते थे; मैं उबासी लिया करता था।

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