गांव के इन नौजवानों ने मेरा नजरिया बदलना शुरू कर दिया है

इन नौजवानों के चरित्र/व्यक्तित्व में बहुत सशक्त परिवर्तन हो रहे हैं। …
वे मानवता के देवदूत बन कर उभर रहे हैं!


गांव के लोगों को मैंने “बड़बोले, अकर्मण्य और निठल्ले” कहा। वह शायद शिवाला परिसर में कोरोनापलायन के पथिकों को भोजन कराने वाले इन नौजवानों को अच्छा नहीं लगा। कौन अपने गांव, मुहल्ले को खराब कहना अच्छा मानेगा? पर जब गांव की अधिकांश आबादी हाथ पर हाथ धरे बैठी हो और हैरान परेशान पथिकों को असंवेदना या हिकारत से निहारती हो, तब यह कहना ठीक ही है।

इन नौजवानों को लीक से हट कर काम करते और परोपकार की भावना से लबालब देखना अधिकांश गांव वालों को सुहा नहीं रहा – ऐसा मुझे बताया गया।

“इन लोगों का कुछ स्वार्थ होगा”, “जरूर पैसा बचा लेते होंगे”, “जब कोरोना पकड़ेगा, तब चेतेंगे ये”, “मूर्ख हैं” जैसे कथन इनके बारे में कह रहे हैं आमतौर पर गांव वाले।

पर कोरोनापलायन पथिकों को भोजन कराने, उनकी अन्य प्रकार से सहायता करने और उनके प्रति दयालुता का भाव रखने/दर्शाने से इन नौजवानों के चरित्र/व्यक्तित्व में बहुत सशक्त परिवर्तन हो रहे हैं। हम जैसे लोगों से जो थोड़ा बहुत प्रशंसा और उत्साहवर्धन मिलता है, वह इनके लिये टॉनिक का काम कर रहा है।

वे मानवता के देवदूत बन कर उभर रहे हैं!

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अक्षयपात्र और शिवाला में पथिकों को मिलता है भोजन और विश्राम

इस समय सारा वातावरण परस्पर करुणा, स्नेह और भाईचारे का है। धार्मिक भेदभाव भी गायब है। अन्यथा शिवाला और मोहम्मद जहीरुद्दीन – mutually exclusive नाम हैं!


गांव में सात लोगों का समूह बना हमारा, जो नगरों से घरों की ओर पलायन करते हारे, थके, विपन्न और विदग्ध श्रमिकों को भोजन कराने की सोच रखते हैं। नेशनल हाईवे 19 पर बने शिवाला परिसर में हम लोगों का अड्डा जमता है।

यह भगौना अक्षयपात्र है। पांच सौ लोगों की तहरी बनती है इसमें, एक बार में।

एक बड़े से भगौने में तहरी बनती है। उसी में सब तरह की सब्जियां डाल कर पौष्टिकता का स्तर बढ़ाया जाता है। राहुल मुझे बताते हैं कि एक बार भगौने में इतना तहरी तैयार हो जाती है कि पांच सौ लोग खाना खा लें। वह भगौना मुझे अक्षय पात्र सा प्रतीत होता है। मैं गांव के इस समूह को नाम भी देता हूं – अक्षयपात्र

अक्षयपात्र और शिवाला – एक सशक्त युग्म है जो कोरोना-भय-ग्रस्त व्युत्क्रमित पलायन करते लोगों सुकून प्रदान करता है।

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