अक्षयपात्र और शिवाला में पथिकों को मिलता है भोजन और विश्राम

इस समय सारा वातावरण परस्पर करुणा, स्नेह और भाईचारे का है। धार्मिक भेदभाव भी गायब है। अन्यथा शिवाला और मोहम्मद जहीरुद्दीन – mutually exclusive नाम हैं!


गांव में सात लोगों का समूह बना हमारा, जो नगरों से घरों की ओर पलायन करते हारे, थके, विपन्न और विदग्ध श्रमिकों को भोजन कराने की सोच रखते हैं। नेशनल हाईवे 19 पर बने शिवाला परिसर में हम लोगों का अड्डा जमता है।

यह भगौना अक्षयपात्र है। पांच सौ लोगों की तहरी बनती है इसमें, एक बार में।

एक बड़े से भगौने में तहरी बनती है। उसी में सब तरह की सब्जियां डाल कर पौष्टिकता का स्तर बढ़ाया जाता है। राहुल मुझे बताते हैं कि एक बार भगौने में इतना तहरी तैयार हो जाती है कि पांच सौ लोग खाना खा लें। वह भगौना मुझे अक्षय पात्र सा प्रतीत होता है। मैं गांव के इस समूह को नाम भी देता हूं – अक्षयपात्र

अक्षयपात्र और शिवाला – एक सशक्त युग्म है जो कोरोना-भय-ग्रस्त व्युत्क्रमित पलायन करते लोगों सुकून प्रदान करता है।

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बनवासी (मुसहरों) का भोजन रखाव

बनवासी (मुसहरों) का भोजन
[…]उनके पास कोई अलमारी-मेज जैसी चीज तो थी नहीं। आसपास के जीव जन्तुओं और कुत्तों से बचाने के लिये लकड़ी के डण्डे जमीन में गाड़ कर उसके दूसरे सिरे पर भोजन की बटुली-बरतन लटका रखे थे उन्होने।[…]


उनके पास आवास नहीं हैं। प्रधानमन्त्री आवास योजना में उनका नम्बर नहीं लगा है। गांव में जिस जमीन के टुकड़े पर वे रहते हैं वह ग्रामसभा की है। बन्जर जमीन के रूप में दर्ज। आठ परिवार हैं। गांव उन्हें लम्बे अर्से से रहने दे रहा है, उससे स्पष्ट है कि वे जरायम पेशा वाले नहीं हैं। गांव की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान है। सस्ता श्रम उपलब्ध कराते होंगे वे।

मुसहर (बनवासी)
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