पॉडकास्टिकी और बदलती मनस्थिति

अपना खुद का पॉडकास्ट करने के लिये अपनी आवाज सुनने की मनस्थिति बन रही है। अपने उच्चारण में खामियाँ नजर आने लगी हैं। मोबाइल से या माइक से मुंह की कितनी दूरी होनी चाहिये, उसकी तमीज बन रही है।


यह चित्र लैपटॉप के धुंधले से कैमरे से लिया गया है। लैपटॉप पर स्पोटीफाई का एप्प खुला है जो पॉडकास्ट सुना रहा है।

पहले ब्लॉगिंग का जुनून चढ़ा था – सन 2007 और उसके बाद के वर्षों की बात है। तब हर समय, हर परिस्थिति यूं देखी जाती थी, और उसपर विचार मन में यूं उठते थे कि इसपर ब्लॉग पर कैसे लिखा जायेगा? उसके साथ कोई चित्र पोस्ट करना जरूरी होगा या नहीं? रेलवे के काम के अलावा जिंदगी ब्लॉगमय हो जाती थी। … सोवत जागत सरन ब्लॉग की।

अब पिछले कुछ दिन से वैसा ही पॉडकास्ट के साथ हो रहा है। जिंदगी पॉडकास्टमय हो रही है। श्रवण/वाचन ग्राह्यता का एक मुख्य घटक बन रहा है!

पॉडकास्ट श्रवण बनने से मेरा डिफॉल्ट मोड – हेडफोन के साथ

अब सब कुछ सुनने के मोड में आता जा रहा है। स्पोटीफाई का प्रीमियम अकाउण्ट हो गया है। उसके गाने वाला सेगमेण्ट उपेक्षित है, पर पॉडकास्ट वाला भाग खूब प्रयोग हो रहा है। अमेजन ऑडीबल का भी सबस्क्रिप्शन चल रहा है। उसमें भी कई पुस्तकें और कई सीरियल लिये खरीदे गये हैं।

अमेजन ऑडीबल पर सेपियंस

कई पुस्तकें – भांति भांति के सोर्सेज से टैब पर भी भर ली गयी हैं। लैपटॉप भी पुस्तकों से लबालब है। कैलीबर अकाउण्ट में दो तीन हजार पुस्तकें होंगी। मोबाइल, टैब, किण्डल और लैपटॉप पुस्तकों और पठन सामग्री से परिपूर्ण हैं। उनको पढ़ने के लिये कई कई पुनर्जन्म लेने पड़ेंगे। 😆

ऑडीबल पर सेपियंस सुना जा रहा है। साथसाथ किण्डल पर वही पढ़ा और हाइलाइट किया जा रहा है।

पुस्तकें अद्योपांत नहीं पढ़ी जा सकतीं तो Blinkist (ब्लिंकिस्ट) का पुस्तक संक्षेप का अकाउण्ट भी है। वह साल भर में तीन हजार का किराया लेता है और उसमें पुस्तक संक्षेप पढ़ा भी जा सकता है और सुना भी जा सकता है।

Blinkist पर पुस्तक सार संक्षेप। उसे पढ़ा, सुना और किण्डल पर स्थानांतरित किया जा सकता है।

डिजिटल रूप से उपलब्ध सभी पुस्तकों या पुस्तक सार को पढ़ा भी जा सकता है और सुना भी जा सकता है। मैं दोनो क्रियायें एक साथ करता हूं। मसलन मैं युवाल नोवा हरारी की “सेपियंस” पढ़ रहा हूं – अंग्रेजी में नहीं, हिंदी में। मैंने अमेजन ऑडीबल पर उसका ऑडियो खरीदा है। वह मोबाइल पर सुनता रहता हूं। किण्डल पर किण्डल अनलिमिटेड (जिसका सबस्क्रिप्शन मैंने लिया हुआ है) पर “सेपियंस” उपलब्ध है। सो वह डाउनलोड कर रखी है। एक ओर सेपियंस का ऑडियो कान में लगा रहता है, दूसरी तरफ किण्डल पर सेपियंस के पन्ने सुने अनुसार देखता, हाईलाइट करता और पलटता रहता हूं। इससे पठन जल्दी भी हो जाता है और ग्रहण भी ज्यादा ही होता है। पढ़ने की यह तकनीक शायद लम्बी चलेगी!

अपना खुद का पॉडकास्ट करने के लिये अपनी आवाज सुनने की मनस्थिति बन रही है। अपने उच्चारण में खामियाँ नजर आने लगी हैं। मोबाइल से या माइक से मुंह की कितनी दूरी होनी चाहिये, उसकी तमीज बन रही है। जो शब्द गुड़गुड़ा कर, अस्पष्ट कहने की आदत है, उसपर अंकुश लग रहा है। जैसा प्रवीण पाण्डेय जी ने कहा – अपना बोला सुनना, अपना लिखा पढ़ना, अपना समझाया हुआ स्वयम समझना … इससे जो सुधार के सूत्र-संकेत मिलते हैं, उससे वर्तनी, लेखनी और तर्क; तीनों समृद्ध होते हैं।

मैं उसमें यह भी जोड़ूगा कि यह करने के साथ साथ आप बेहतर व्यक्ति भी बनते हैं!

सो श्रवण, पठन और पॉडकास्टन से बेहतरी की ओर कदम रखने की कोशिश की जा रही है! 😆


धीरेंद्र और मेरा “बैठकी” का मानसिक हलचल पर पोस्ट किया पिछला पॉडकास्ट जो मरण चर्चा और पुनर्जन्म सिद्धांत पर है; नीचे दिया गया है –


सामग्री (Content) तो राजा कतई नहीं है!

नेट पर हमारी उपस्थिति तो बनी। ब्लॉग के क्लिक्स बढ़ते गये। रोज आंकड़े देख कर हम प्रमुदित होते थे, पर उससे पैसा कमाने का मॉडल गूगल का बन रहा था!


एक त्वरित इण्टरनेट खंगाल (सर्च) में निम्न जानकारी मिलती है –

  • सभी प्लेटफार्म (वर्डप्रेस, टम्बलर, ब्लॉगर, विक्स, स्क्वायरस्पेस आदि) का आंकड़ा जोड़ लिया जाये तो 57 करोड़ ब्लॉग हैं।
  • करीब 370 लाख यूट्यूब चैनल हैं। और इस विधा में बहुत लोग जुड़ रहे हैं। सालाना वृद्धि दर 23 प्रतिशत है।
  • करीब 850 हजार पॉडकास्ट चैनल हैं और तीन करोड़ पॉडकास्ट ठेले गये हैं!
  • अमेजन किण्डल का आंकड़ा नहीं है, पर उसपर दस लाख किताबें हर साल जुड़ती हैं। तीस लाख फ्री ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं।
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उक्त सामग्री ठेलन के अलावा न्यूज चैनल, टीवी, पत्रिकायें, डिजिटल अखबार और पत्रिकायें सामग्री (content) का विस्फोट कर रहे हैं। इतनी सामग्री जब लैपटॉप या मोबाइल ऑन करने पर आपके पास चली आती है तो इसके उत्पादक किस दशा में होंगे? आज हर आदमी लेखक, फिल्म निर्माता, एक्टर, उद्घोषक, पत्रकार – सब कुछ अपने स्मार्टफोन के माध्यम से हो जा सकता है; और हो भी रहा है।

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इतना कण्टेण्ट कभी नहीं रहा। इतनी वैराइटी और इतनी च्वाइस की कल्पना भी नहीं हो सकती थी! पर सामग्री उत्पादक लोगों का क्या हाल है? क्या वे अपने लिखे, कहे, वीडियो बनाये के आधार पर मालामाल हो गये हैं? कितने लोग हैं जो इसे अपना प्रमुख (या गौण भी) व्यवसाय बना कर संतुष्ट हैं?

मैंने जब हिंदी ब्लॉगिंग प्रारम्भ की थी, तब ब्लॉगर द्वारा उपलब्ध कराये प्लेटफार्म से चमत्कृत थे। गूगल के प्रति धन्यवाद का भाव था। यह नहीं जानते थे कि हम – जो भिन्न भिन्न विषयों के (धाकड़) जानकार थे – और मजे-मौज के लिये रोजाना जो लिख रहे थे, उससे गूगल समृद्ध हो रहा था। हमें तो आजतक एक चवन्नी भी नहीं मिली, पर हमारे लिखे को सर्च करने पर हजारों, लाखों पेज खुल रहे थे। नेट पर हमारी उपस्थिति तो बनी। ब्लॉग के क्लिक्स बढ़ते गये। रोज आंकड़े देख कर हम प्रमुदित होते थे, पर उससे पैसा कमाने का मॉडल गूगल का बन रहा था!

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हममें से कुछ पुस्तक लेखन की ओर गये। उनकी पुस्तकें, मुझे नहीं लगता कि उन्हें ‘पर्याप्त’ दे रही होंगी। हर एक पुस्तक लेखक के मन में कालजयी होने का भाव था। पर उस सब में पैसा एक आध ने ही कमाया होगा। और उसके लिये पुस्तक का कण्टेण्ट कम, उनकी नेटवर्किंग ज्यादा कारगर रही होगी। उस सब की अगर कीमत लगायी जाये तो कोई फायदे का सौदा (अगर पुस्तक लेखन व्यवसाय मानने का भाव है, तो) नहीं साबित होगा।

कुछ लोग किण्डल के डायरेक्ट पब्लिशिंग का प्रयोग भी कर रहे हैं। उसमें कितना अमेजन देता है, मुझे नहीं मालुम; पर अगर आप अपनी पुस्तक का कवर किसी प्रोफेशनल से डिजाइन करवाते हैं और उसकी रीच बढ़ाने के लिये कुछ विज्ञापन पर खर्च करते हैं तो आपको पुस्तक लेखन, डिजाइन के अलावा इन सब का कॉस्ट-बेनिफिट-एनालिसिस भी करना होगा। तब शायद यह भी बहुत फायदे का सौदा न लगे।

ब्लॉगर, व्लॉगर, पॉडकास्टर या पुस्तक लेखकों की बेशुमार भीड़ या पत्रकारिता में जुड़े लोग, सभी डिजिटल माध्यम में अगर कमाने की सोच रहे हैं तो हैरान परेशान भर हैं। कमाई तो गूगल, फेसबुक, अमेजन आदि कर रहे हैं। उनके सामने तो जूठन फैंक दी जा रही है। उसी जूठन में कई प्रमुदित हैं तो कई यह नहीं समझ पा रहे कि क्या किया जाये।

उनकी दशा उस छोटी जोत के किसान सरीखी है जिसके पास अपना सरप्लस बेचने के लिये कोई बार्गेनिंग पावर ही नहीं है। वह छोटा किसान भी आतंकित है कि कहीं उसकी मेहनत का मजा गूगल फेसबुक अमेजन की तरह कॉर्पोरेट्स न हड़प जायें!

इसलिये, कण्टेण्ट क्रीयेटर (सामग्री निर्माता) अपनी रचनाधर्मिता मेंं आत्ममुग्धता का भाव भले ही रखे; पर उसका नार्सीसिज्म (narcissism) आर्थिक धरातल पर कहीं नहीं ले जाता। Content is the King Content is NOT the King. Google, Facebook, Amazon is!