सामग्री (Content) तो राजा कतई नहीं है!

नेट पर हमारी उपस्थिति तो बनी। ब्लॉग के क्लिक्स बढ़ते गये। रोज आंकड़े देख कर हम प्रमुदित होते थे, पर उससे पैसा कमाने का मॉडल गूगल का बन रहा था!


एक त्वरित इण्टरनेट खंगाल (सर्च) में निम्न जानकारी मिलती है –

  • सभी प्लेटफार्म (वर्डप्रेस, टम्बलर, ब्लॉगर, विक्स, स्क्वायरस्पेस आदि) का आंकड़ा जोड़ लिया जाये तो 57 करोड़ ब्लॉग हैं।
  • करीब 370 लाख यूट्यूब चैनल हैं। और इस विधा में बहुत लोग जुड़ रहे हैं। सालाना वृद्धि दर 23 प्रतिशत है।
  • करीब 850 हजार पॉडकास्ट चैनल हैं और तीन करोड़ पॉडकास्ट ठेले गये हैं!
  • अमेजन किण्डल का आंकड़ा नहीं है, पर उसपर दस लाख किताबें हर साल जुड़ती हैं। तीस लाख फ्री ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं।
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उक्त सामग्री ठेलन के अलावा न्यूज चैनल, टीवी, पत्रिकायें, डिजिटल अखबार और पत्रिकायें सामग्री (content) का विस्फोट कर रहे हैं। इतनी सामग्री जब लैपटॉप या मोबाइल ऑन करने पर आपके पास चली आती है तो इसके उत्पादक किस दशा में होंगे? आज हर आदमी लेखक, फिल्म निर्माता, एक्टर, उद्घोषक, पत्रकार – सब कुछ अपने स्मार्टफोन के माध्यम से हो जा सकता है; और हो भी रहा है।

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इतना कण्टेण्ट कभी नहीं रहा। इतनी वैराइटी और इतनी च्वाइस की कल्पना भी नहीं हो सकती थी! पर सामग्री उत्पादक लोगों का क्या हाल है? क्या वे अपने लिखे, कहे, वीडियो बनाये के आधार पर मालामाल हो गये हैं? कितने लोग हैं जो इसे अपना प्रमुख (या गौण भी) व्यवसाय बना कर संतुष्ट हैं?

मैंने जब हिंदी ब्लॉगिंग प्रारम्भ की थी, तब ब्लॉगर द्वारा उपलब्ध कराये प्लेटफार्म से चमत्कृत थे। गूगल के प्रति धन्यवाद का भाव था। यह नहीं जानते थे कि हम – जो भिन्न भिन्न विषयों के (धाकड़) जानकार थे – और मजे-मौज के लिये रोजाना जो लिख रहे थे, उससे गूगल समृद्ध हो रहा था। हमें तो आजतक एक चवन्नी भी नहीं मिली, पर हमारे लिखे को सर्च करने पर हजारों, लाखों पेज खुल रहे थे। नेट पर हमारी उपस्थिति तो बनी। ब्लॉग के क्लिक्स बढ़ते गये। रोज आंकड़े देख कर हम प्रमुदित होते थे, पर उससे पैसा कमाने का मॉडल गूगल का बन रहा था!

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हममें से कुछ पुस्तक लेखन की ओर गये। उनकी पुस्तकें, मुझे नहीं लगता कि उन्हें ‘पर्याप्त’ दे रही होंगी। हर एक पुस्तक लेखक के मन में कालजयी होने का भाव था। पर उस सब में पैसा एक आध ने ही कमाया होगा। और उसके लिये पुस्तक का कण्टेण्ट कम, उनकी नेटवर्किंग ज्यादा कारगर रही होगी। उस सब की अगर कीमत लगायी जाये तो कोई फायदे का सौदा (अगर पुस्तक लेखन व्यवसाय मानने का भाव है, तो) नहीं साबित होगा।

कुछ लोग किण्डल के डायरेक्ट पब्लिशिंग का प्रयोग भी कर रहे हैं। उसमें कितना अमेजन देता है, मुझे नहीं मालुम; पर अगर आप अपनी पुस्तक का कवर किसी प्रोफेशनल से डिजाइन करवाते हैं और उसकी रीच बढ़ाने के लिये कुछ विज्ञापन पर खर्च करते हैं तो आपको पुस्तक लेखन, डिजाइन के अलावा इन सब का कॉस्ट-बेनिफिट-एनालिसिस भी करना होगा। तब शायद यह भी बहुत फायदे का सौदा न लगे।

ब्लॉगर, व्लॉगर, पॉडकास्टर या पुस्तक लेखकों की बेशुमार भीड़ या पत्रकारिता में जुड़े लोग, सभी डिजिटल माध्यम में अगर कमाने की सोच रहे हैं तो हैरान परेशान भर हैं। कमाई तो गूगल, फेसबुक, अमेजन आदि कर रहे हैं। उनके सामने तो जूठन फैंक दी जा रही है। उसी जूठन में कई प्रमुदित हैं तो कई यह नहीं समझ पा रहे कि क्या किया जाये।

उनकी दशा उस छोटी जोत के किसान सरीखी है जिसके पास अपना सरप्लस बेचने के लिये कोई बार्गेनिंग पावर ही नहीं है। वह छोटा किसान भी आतंकित है कि कहीं उसकी मेहनत का मजा गूगल फेसबुक अमेजन की तरह कॉर्पोरेट्स न हड़प जायें!

इसलिये, कण्टेण्ट क्रीयेटर (सामग्री निर्माता) अपनी रचनाधर्मिता मेंं आत्ममुग्धता का भाव भले ही रखे; पर उसका नार्सीसिज्म (narcissism) आर्थिक धरातल पर कहीं नहीं ले जाता। Content is the King Content is NOT the King. Google, Facebook, Amazon is!


कुछ (नये) लोग


सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।
सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।

कल शनिवार 14 दिसम्बर को मैं वाराणसी में था। सवेरे स्टेशन पर अपने डिब्बे के बाहर दृष्य साफ़ था। कोई कोहरा नहीं। सूरज निकल चुके थे। स्टेशन पर गतिविधियां सामान्य थीं। कबूतर दाना बीन रहे थे। अभी उनके लिये यहां बैठने घूमने का स्पेस था। दिन में ट्रेनों की आवाजाही और यात्रियों की अधिकता के बीच उनके लिये जगह ही न बची पायी मैने।

दिन में वाराणसी में जितना भी पैदल या वाहन से चला सड़कों पर; उसमें पाया कि अव्यवस्था पहले से ज्यादा है और लोग पहले से अधिक, पहले से ज्यादा बेतरतीब। बाबा विश्वनाथ की नगरी उनके त्रिशूल पर टिकी है और उन्ही के कानून कायदे से चल पा रही है। अर्बनाइजेशन के सारे सिद्धान्त यहां फ़ेल हैं। 🙂

वाराणसी जंक्शन स्टेशन।
वाराणसी जंक्शन स्टेशन।

निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।
निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।

सवेरे नाश्ते पर मेरे छोटे साले साहब – विकास दुबे ने आमन्त्रित किया था। उनकी पत्नी, निधि की रसोई में जादू है। मेरे ख्याल से मास्टर शेफ़-ओफ़ की प्रतियोगिता में वे बड़ी आसानी से मैदान मार सकती हैं। पता नहीं कि उस दिशा में उन्होने प्रयत्न किया या नहीं, पर एक कोशिश तो होनी ही चाहिये। उन्होने एक सामान्य नाश्ते के अनुष्ठान को इतनी ऊंचाई पर पंहुचा दिया मानो पांच सितारा होटेल में फाइव-कोर्स नाश्ता हो। … एक पाव-भाजी के साथ वाली सब्जी में भी बेक्ड वेजिटेबुल का अनूठा प्रयोग था। लाजवाब पोहा, गाजर का हलवा …

सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।
सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।

विकास के दो मित्र मिलने आये – सिद्धार्थ सिंह और बलबीर सिंह बग्गा। दोनो फेसबुक पर सक्रिय हैं। सिद्धार्थ जी तो मेरे स्टेटस और मेरी ब्लॉग पोस्टें रुचि से पढ़ते हैं, ऐसा उन्होने बताया। सही भी लगा – वे मेरे बारे में बहुत जानकारी रखते हैं – जो इण्टरनेट पर उपलब्ध है। सिद्धार्थ जी से मिल कर प्रसन्नता और आत्म संतोष की अनुभूति हुयी जो एक ब्लॉगर को आजकल की कम टिप्पणी के समय में यदा-कदा ही होती है। लगता है, ब्लॉग देखने पढ़ने वालों की संख्या और नियमित पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं है। शायद बढ़ भी रही है। यह जरूर है कि इण्टरेक्शन फेसबुक/ट्विटर के माध्यम से अधिक है। बलबीर सिंह जी भी गर्मजोशी की ऊर्जा से भरपूर लगे। कभी कभी इस प्रकार से मिलना ताजगी दे जाता है। इसके लिये विकास, निधि, सिद्धार्थ और बग्गा जी को बहुत धन्यवाद।

शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।
शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।

दोपहर में शैलेश और रूपेश जी से मुलाकात हुई। दोनो सज्जन आजकल भाजपा की आई.टी. सेल का उत्तरप्रदेश का काम संभाल रहे हैं और उनसे बात कर लगा कि पारम्परिक राजनीति करने वाले पुरनिया छाप लोगों को छकाने के लिये खूब खुराफ़ात करते रहते हैं। मुझे फिक्र है कि ओल्ड-स्टाइल जिला-कस्बा स्तर का नेता कभी इन्हे अकेले में धुन न दे! 🙂

ये कीनू ले कर आये थे जिसमें से कई खाये गये (ज्यादा मैने खाये!)। दो मेरे घर तक भी पंहुच गये। इन्होने मुझे बाटी-चोखा समारोह में आने के लिये भी कहा – जो कभी न कभी होगा जरूर – वहीं वाराणसी/काशी/अस्सी के आसपास!

ऐसी मुलाकातें कुछ कुछ अन्तराल पर होती रहें!

नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।
नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।


हम लोगों से क्यों मिलते हैं?

कभी समय होता है और हम एकांत चाहते हैं। कभी समय होता है जब हम पुस्तकों का सानिध्य तलाशते हैं। कभी समय होता है, जब हम लोगों से मिलना चाहते हैं। 

पहले का याद नहीं आता। पर अब लगता है कि मैं स्थानों को देखना चाहता हूं, या लोगों से मिलना चाहता हूं; वह मुख्यत इस कारण से है कि मैं स्थानों या लोगों के बारे में लिख या कह सकूं। मजे की बात है कि कई बार लिखने या कहने में शब्दों की इनएडेक्वेसी भी नजर आती है मुझे। और तब मैं पुस्तकों/शब्दकोष/थेसॉरस का सानिध्य लेना चाहता हूं। ऐसे में ट्रेवलॉग्स बहुत काम के लगते हैं मुझे। सो पुस्तकों में भी ट्रेवलॉग्स का पठन बढ़ता गया है उत्तरोत्तर।

मैं देखना चाहता हूं, मैं मिलना चाहता हूं, मैं वर्णन करना चाहता हूं। मैं – एक आम आदमी। जिसके पास देखने की इनेएडेक्वेसी है। जिसका अटेंशन स्पान संकुचित है। जिसके पास रिटेण्टिविटी की इनएडेक्वेसी है – जिसको सही नोट्स लेना/संजोना नहीं आता। जिसके पास शब्दों की इनएडेक्वेसी है। जो भेडियाधसान शब्द तलाशता-बनाता है। … मजे की बात है कि वह भी ब्लॉग और सोशल मीडिया के युग में मिलने-देखने और एक्स्प्रेस करने की लग्ज़री ले पा रहा है! 

यह रोचक है। बहुत ही रोचक! 

मैं निधि दूबे के लंच और शैलेश पांड़े के बाटी-चोखा की सोचने लगता हूं। मैं लोगों से मिलना चाहता हूं।

शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।
शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।