प्री-वेडिंग शूट! तेजी से बदल रहा है समाज

प्री-वेडिंग शूट हमारे लिये बिल्कुल नयी बात थी। लड़का लड़की बिल्कुल फिल्म शूटिंग के अंदाज में विभिन्न सीन में भिन्न भिन्न पोज और पोशाकों में स्क्रीन पर आ रहे थे।


प्रयागराज गया था। भोलाराम जी की बिटिया की शादी समारोह में शामिल होने। उन्होने बहुत आदर से हमारा (रीता पाण्डेय और मेरा) स्वागत किया और जयमाल वाले स्टेज के सामने आगे वाले सोफा पर बिठया। चाय, सूप, स्नेक्स सर्व करने वाले आगे पीछे चक्कर लगाने लगे। गांव में ‘प्रीति-भोज’ में टूट पड़ने वाली भीड़ से बिल्कुल अलग अनुभव। शहरी वातावरण कितनी जल्दी अलग अलग सा लगने लगा है।

मंच पर दुल्हा-दुल्हन के बैठने के लिये सुंदर सोफे लगे थे। मंच के दोनो ओर एलसीडी स्क्रीन लगी थीं। बड़े साइज वाली। उनके बगल में कई सफेद छतरियां लगी थीं जो शायद फोटो लेने में फ्लैश को व्यवस्थित करने में सहायता करती हों। मंच फिलहाल खाली था। आजकल बारातें देर से ही आती हैं। हम लोग तो नियम से आठ-साढ़े आठ तक पंहुच गये थे।

दोनो स्क्रीन पर प्री-वेडिंग शूट के स्लाइड शो दिखाये जा रहे थे। यह प्री-वेडिंग शूट हमारे जैसे गांव के जीवों के लिये बिल्कुल नयी बात थी। लड़का लड़की बिल्कुल फिल्म शूटिंग के अंदाज में विभिन्न सीन में भिन्न भिन्न पोज और पोशाकों में स्क्रीन पर आ रहे थे। झूला झूलते, झील के किनारे भिन्न भिन्न कोण से, एक गोल मेज के पास बैठे/खड़े कोई रोमांटिक पुस्तक को पढ़ते और पढ़ने का भाव चेहरे पर लाते … अनेकानेक दृष्य सामने आते जाते जा रहे थे। हर सीन में अलग ड्रेस। अलग मेक-अप, अलग सिचयुयेशन, अलग सेटिंग। फिल्मी दुनियां बॉलीवुड से निकल कर प्रयागराज की स्टेनली रोड के इस मैरिज हॉल में आ गयी थी। आखिर, घण्टा ड़ेढ़ घण्टा बाद इस स्लाइड शो के नायक-नायिका स्टेज पर आने ही वाले थे।

प्री-वेडिंग-शूट के स्लाइड शो के कुछ स्क्रीन शॉट

हम लगभग टकटकी बांध वह शो देख रहे थे। बहुत तेज संगीत; नहीं म्यूजिक; बज रहा था। आपस में बातचीत करना कठिन था। इसलिये स्लाइड शो पर आपस में विचार आदान प्रदान भी नहीं हो रहा था।

मन्नू प्रकाश दुबे

उसी समय मन्नू प्रकाश दुबे आये। मन्नू उत्तर मध्य रेलवे में मेरे सहकर्मी थे। जब मैं यहां मुख्य माल यातायात प्रबंधक था; वे इलाहाबाद मण्डल में मण्डल परिचालन प्रबंधक थे। कालांतर में वे वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबंधक बने और आजकल उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय में उप महाप्रबंधक हैं। वे मेरे पास बैठे और जिस प्री-वेडिंग शूट पर हमारे तरह तरह के सवाल या जिज्ञासायें थीं; उनका लगभग समाधान किया उन्होने।

“सर, आजकल यह सामान्य व्यवहार होता जा रहा है। और यह बहुत तेजी से बदलाव आया है। बहुत कुछ कोविड-19 संक्रमण काल की देन है। जब कोरोना के कारण मुम्बई के बी-ग्रेड के आर्टिस्ट काम छोड़ छोड़ कर अपने इलाके को लौटे तो उन्होने मध्य और (तथाकथित) धनी वर्ग की फिल्मी स्वप्निल इच्छाओं को हवा दी। उन्होने प्री-वेडिंग शूट का नया कॉन्सेप्ट परोसा। शादी के अवसर पर लाख-दो लाख फिल्मी अंदाज में खर्च करना बुरा नहीं लगा लोगों को। वैसे भी पहले फोटो खिंचाना, एलबम बनाना आदि चल ही रहा था। उसे एक पायदान आगे बढ़ाया फिल्मी दुनियां के इन दोयम दर्जे के कलाकारों ने।

“यही नहीं प्री-वेडिंग-शूट को लोगों ने यू‌ट्यूब पर लाइव करना शुरू कर दिया है। उसमेंं उनके जानपहचान के लोग जो लाइक करते हैं, देखते हैं; उसके आधार पर आमदनी की भी सम्भावना बनने लगी हैं। और यह क्रम शादी के दौरान – उसकी रस्म रिवाजों में तथा बाद भी जारी रहता है। हनीमून तथा उसके बाद की जिंदगी यू-ट्यूब पर शेयर करने में भी दिखाने और लाइक बटोरने/मनीटाइज करने का चस्का लग गया है नयी पीढ़ी को। आपकी पीढ़ी तो बहुत पीछे छूट गयी है। मेरी भी अब पुरानी पड़ गयी है।”

इस परिवर्तन पर मैंने रीता पाण्डेय की राय ली। पूछा – अपनी शादी के पहले हम ऐसा शूट करवाते तो क्या होता?

“होता क्या! बब्बा (उनके दादा जी, इलाके के बड़े रसूखदार जमींदार) सीधे धाँय से गोली मार देते। मामला खतम हो जाता!” 😆

हमारे पास एक वृद्ध दम्पति बैठे थे

हमारे पास एक वृद्ध दम्पति बैठे थे। वृद्ध बड़े गौर से स्लाइड शो देख रहे थे। उनकी पत्नीजी कुछ सिकुड़ कर बैठी थीं। उनको शायद असहज लग रहा था। मैंने जब उन लोगों के चित्र लिये तो उन्होने अपने पास बिठा लिया मुझे। वृद्ध महोदय ने बताया कि उन्हे अटपटा नहीं लग रहा। “यह तो ‘विकास’ है।” वे शायद और भी शब्द कहते अपनी भावना को दर्शाने में; पर बार बार उनके मुंह से ‘विकास’ ही निकला।

विकास शायद परिवर्तन या change का पर्याय है। और जो भी अच्छा या स्वीकार्य परिवर्तन है; उसे विकास कहा जाता है।

वे वृद्ध चलने के लिये एक बढ़िया मूठ वाली छड़ी लिये थे। सूट पहने थे

वे वृद्ध चलने के लिये एक बढ़िया मूठ वाली छड़ी लिये थे। सूट पहने थे और स्मार्ट फोन सर्फ कर रहे थे। उम्र पचहत्तर पार होगी। शायद गांव से उठ कर शहरी बने हों। गांव की विषमता से प्री-वेडिंग-शूट तक का उन दम्पति का सफर निश्चय ही बहुत रोचक होगा। पता नहीं, उनसे फिर कभी मुलाकात होती है, या नहीं!

वे स्मार्ट फोन सर्फ कर रहे थे।

हम लोग सवा घण्टा बैठे। बारात आने में लगता था बहुत देर होने की सम्भावना थी। भोलाराम जी ने हमसे जाने के पहले भोजन करने का आग्रह किया। भोजन वास्तव में हमारी रुचि अनुसार था। वह करने के बाद हमने भोलाराम जी से विदा ली। मन्नू प्रकाश दुबे जी ने हमें सी-ऑफ किया। उन्होने बताया कि वे भी उसके बाद घर लौट जायेंगे।

एक नया अनुभव ले कर हम घर लौटे। यह मलाल जरूर है कि बिल्कुल नयी पीढ़ी – नयी और प्री वेडिंग शूट की इच्छा या स्वप्न रखने वाली पीढ़ी से मुलाकात और विचारों का आदान प्रदान नहीं हो पाया। भविष्य में शायद हो। पर पता नहीं वह पीढ़ी हम को कितना स्वीकार्य और कितना सठियाया हुआ समझे! 🙂


पोस्ट पर अमित गुप्ता जी की ट्वीट –