बाबूभाई कटारा की तरफदारी (?) में एक पोस्ट


मुझे भाजपा और कटारा पर तरस आ रहा है. जब मैं रतलाम में था तो झाबुआ-पंचमहल-दाहोद कांग्रेस के गढ़ हुआ करते थे. मैं आदिवासियों से पूछ्ता था कि देश का प्रधानमंत्री कौन है? तब या तो वे सवाल समझ नहीं पाते थे, या वेस्ता पटेल, कंतिलाल भूरिया अथवा सोमाजी डामोर जैसे स्थानीय कांग्रेसी का नाम लेते थे. उन गरीबों के लिये दुनियां में सबसे बड़े वही थे.

फिर आर.एस.एस.वालों ने वनवासी विकास संघ जैसे प्लेटफार्म से आदिवासियों में पैठ बनाई. मिशनरियों का वर्चस्व कुछ सिमटा. उस क्षेत्र से भाजपा जीतने लगी चाहे मध्यप्रदेश हो या गुजरात.

और अब कटारा ने लोढ़ दिया है! बेचारे आर.एस.एस. के कमिटेड वर्कर मुंह पिटा रहे होंगे. कटारा परमजीत कौर को ले जा रहे थे; सो तो ठीक; शिलाजीत(? – देसी वियाग्रा) काहे को ले जा रहे थे जब पत्नी साथ नहीं जा रही थी? पैसे के लिये भ्रष्ट आचरण तो खास बात नहीं है वह तो चलता है! पकड़े गये, वही गड़बड़ हो गया. पर खांटी दैहिक वासना का भ्रष्टाचार यह अति हो गयी.

मुझमें यह वक्र सोच क्यों है, यह मैं नहीं जानता. जनता कबूतरबाजी-कबूतरबाजी की रट लगाये है और मुझे खोट देसी वियाग्रा में नजर आ रहा है.

एक बाबू रिश्वत ले कर मकान बना लेता है, बच्चों को डाक्टरी/इंजीनियरी पढ़ा देता है. लड़की की ठीक से शादी कर देता है, सुबह शाम मन्दिर हो आता है, सुन्दर काण्ड का पाठ और भागवत श्रवण कर लेता है. यह मानक व्यवहार में फिट हो जाता है.

पर अगर वह पैसा पीटता है, दारू-मुर्गा उड़ाता है, रेड़ लाइट एरिया के चक्कर लगाता है, इधर-उधर मुंह मारता है; तब गड़बड़ है. कटारा देसी वियाग्रा के कारण दूसरे ब्रैकेट में लग रहे हैं. आगे क्या निकलेगा, भगवान जाने.

कैश और क्वैरी या कबूतरबाजी छोटा गुनाह है. उसपर तो सांसद निकाल बाहर किये गये. बड़ा गुनाह है माफियागिरी, औरत को मार कर जला देना, आई.एस.आई. से सांठ-गांठ, मधुमिता शुक्ला जैसे मर्डर, पोलिटिकल दबंगई के बल पर देह/असलाह/नशा आदि के व्यापार चलाना. ऐसे गुनाह करने वाले ज्यादातर छुट्टा घूम रहे हैं. उनकी नेतागिरी बरकरार है या चमक रही है.

ब्लॉगर भाई तलवारें तान सकते हैं. कह सकते हैं कि सरकारी नौकर है, रिश्वत को जस्टीफाई (?) कर रहा है. जरूर चक्कर है. पर ब्लॉगरी का मायने ही यह है कि (मर्यादा में रहते हुये) जो जंचे, लिखा जाये.