मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ रचने की गुहार

शिव कुमार मिश्र ने एसएमएस कर नये पर सशक्त शब्द – मुद्राभिषेक से परिचय कराया है. रुद्राष्टाध्यायी के आधार पर रुद्राभिषेक किया जाता है. भगवान शिव का शुक्लयजुर्वेदीय पूजन है यह. पर मुद्राभिषेक क्या है?

उन्होने लिखा है कि अमुक सज्जन थे. हर वर्ष रुद्राभिषेक कराते थे श्रावण मास में. एक बार यह अनुष्ठान करने के पहले ही उनके यहां कर चोरी के कारण छापा पड़ गया. अनुष्ठान टाल दिया गया. अलग प्रकार के पुरोहितों का इंतजाम कर मुद्राभिषेक का विशेष अनुष्ठान – महामुद्राभिषेक कराया गया. ग्रह शांति हुई. कृपा की वर्षा हुई. मुद्राभिषेक फलदायी हुआ.

रुद्राष्टाध्यायी लिखित ग्रंथ है. शुक्लयजुर्वेद में आठ अध्यायों में रुद्र पर 200 सूत्र हैं. गीताप्रेस की दुकान से 10-20 रुपये में इसे आप विधि-विधान/अनुवाद सहित खरीद सकते हैं. पुरोहित का इंतजाम न हो तो आप स्वयम पढ़ कर शिवोपासना कर सकते हैं. मुद्राभिषेक के विषय में यही समस्या है कि इसके लिये ग्रंथ लिखित नहीं है. हर देश-काल-विभाग में इसके सूत्र भिन्न-भिन्न हैं. लिहाजा पुरोहित भी भिन्न-भिन्न हैं. पर जैसे आपके पास श्रद्धा हो तो आप रुद्राभिषेक कर सकते हैं, उसी प्रकार आपके पास मुद्रा हो तो आप मुद्राभिषेक कर सकते हैं. बाकी सब इंतजाम होता चला जाता है!

एक अंतर है – रुद्राभिषेक और मुद्राभिषेक में. रुद्राभिषेक सामुहिक कृत्य है. वह आप पुण्य-लाभ के लिये बड़े से बड़े शिव मन्दिर में बहुत से लोगों को निमंत्रण दे कराते हैं. मुद्राभिषेक एकांत में किया जाने वाला अनुष्ठान है. उसमें आप अपने को एकाग्र कर चुप-चाप यज्ञ/पूजन (!) करते हैं और भीड़ का सामुहिक वातावरण उस साधना में बाधक होता है. इसपर अगर और प्रकाश डालना हो तो शिव कुमार मिश्र अपनी रोमन हिन्दी की टिप्पणी में डाल सकते हैं.

मेरे विचार से इतना शब्द-परिचय पर्याप्त है. विश्वास है कि नये शब्द को लोग हाथों हाथ लेंगे. सटायरिस्ट अगर पहले ही इसपर कलम चला चुके हों तो ठीक, वर्ना लिखने को एक उर्वर विषय मिल जायेगा. श्रावण मास आने को है. उसके पहले या उस मास में शायद इस वर्ष कोई सज्जन मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ की रचना कर ही लें. उसपर अगर प्राचीन(या प्राचीन सम्मत) होने का ठप्पा लगवाना हो तो स्वामी निर्मलानन्द सरस्वती (श्री अभय तिवारी) से लगवाया जा सकता है! वे आजकल ऋगयजुर्सामअथर्ववेद की ऋचाओं के ऊपर ही शोध कर भयानक-भयानक निष्कर्ष निकाल रहे हैं. 🙂

ओर्कुट-चिर्कुट पुराण के प्रणेता पण्डित आलोक पुराणिक, या अन्य कोई धर्म मर्मज्ञ पाठक महोदय; आप सुन रहे हैं कि नहीं? दोनो हाथ धन उलीचते नवयुग के कांवरियों की सेवा में मुद्राष्टाध्यायी ग्रंथ रचने का पुण्य लाभ करें.


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

14 thoughts on “मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ रचने की गुहार

  1. shree maan ji , maine aap ke blog ko jyada to nahi pada lekin ek freeware dena chahata hun ki…kripaya apani maryadao ka khayal rakhate huye…dhar-darshan ke vishay me tika-tippani kare ya usame se koi vyang nikale…vaise bhi aap yatha naam tatha gun charitra ke lag rahe ho.

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  2. भैया … शायद आप गुहारें लगा कर हमें ही पुकार रहे थे।मैं अभी शुरु हुआ .. अभी-हाल ले-योविष्य सुन्दर है …मैं जल्द ही हाज़िर हुआ

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  3. अरे पंडीजी देर मत करिये. जल्दी रचिये. आप के ई दरवाजे पर कई जजमान लाईन लगाए खडे हैं. उन्ही में एक हमहूँ हूँ.

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  4. हा हा, सही मसला लाये हैं. अब देखिये आलोक भाई और शुकुल जी इसे अपने अपने तरीके से कितना दुहते हैं. बात से बात निकलेगी अब तो. :०

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