खुक-खुक हंसती लड़की…..


एक बेवजहखुक-खुक हंसती लड़की…एक समय से पहले ब्याहीनवयौवना कम, लड़की ज्यादाऔर जले मांस की सड़ान्ध केबीच में होता हैकेवल एक कनस्तर घासलेटऔर “दो घोड़े” ब्राण्ड दियासलाई कीएक तीली भर का अंतर—–अलसाये निरीह लगते समाज मेंउग आते हैंतेज दांतउसकी आंखें हो जाती हैं सुर्ख लालभयानक और वीभत्स!मैं सोते में भी डरता हूंनींद में भी टटोल लेताContinue reading “खुक-खुक हंसती लड़की…..”

आदमी


दफ्तरों में समय मारते आदमीचाय उदर में सतत डालते आदमी अच्छे और बुरे को झेलते आदमीबेवजह जिन्दगी खेलते आदमी गांव में आदमी शहर में आदमीइधर भी आदमी, उधर भी आदमी निरीह, भावुक, मगन जा रहे आदमीमन में आशा लगन ला रहे आदमी खीझ, गुस्सा, कुढ़न हर कदम आदमीअड़ रहे आदमी, बढ़ रहे आदमी हों रतीContinue reading “आदमी”