कैसे लाऊं जिप्सियाना स्वभाव


छब्बीस दिसम्बर को मेरा दफ्तर इलाहाबाद में सिविल लाइन्स से बदल कर सुबेदारगंज चला गया। महाप्रबंधक कार्यालय का उद्घाटन तो पिछले महीने ही हो गया था। मेरे दफ्तर का शिफ्टिंग अब हुआ। बड़ी आलीशान इमारत है नये दफ्तर की। खुला वातावरण। पर मैं अवसादग्रस्त हो गया हूं। नयी जगह पर अटपटा लग रहा है। ट्यूब लाइट नहीं लगी हैं सभी। चपरासी के लिये घण्टी नहीं है। चाय बनाने का इन्तजाम नहीं हो पाया है। बाहर से लायी चाय ’पेशल’ है पर अदरक कस के पड़ी है उसमें। इण्टरकॉम और इण्टरनेट काम नहीं कर रहे। कमरे में कर्टेन नहीं लगे हैं। स्टॉफ अपने दफ्तर और कण्ट्रोल सेण्टर की जगह के लिये लड़ रहा है।

उत्तर मध्य रेलवे के नये मुख्यालय उद्घाटन के कुछ चित्र

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Gyan(228) 

शाम होते ही फेटीग और मच्छर घेर लेते हैं। मैं घर के लिये निकल लेता हूं। पर घर का रास्ता भी नयी जगह से पंद्रह मिनट और लम्बा हो गया है। अंधेरा हो गया है। ट्रैफिक ज्यादा है। यह ड्राइवर तेज क्यों चल रहा है? अवसाद ही अवसाद!

मैं गाड़ुलिया लुहारों और जिप्सियों की कल्पना करता हूं। ये घुमन्तू लोग तो आज यहां कल वहां। उन्हे तनाव नहीं होता क्या? दक्षिणी-पूर्वी योरोप के गड़रिये – जो अपनी भेड़ों के साथ चारे और पानी की तलाश में घूमते हैं, क्या वे नयी जगह में असहज होते हैं?

यायावरी और फक्कड़ी जीवन में कैसे लाई जाये? अधेड़ उम्र में जीवन की निश्चितता को कैसे अनलर्न किया जाये? ये प्रश्न हॉण्ट कर रहे हैं और बड़ी तीव्रता से कर रहे हैं।

पता नहीं, अज़दक चीन हो आये। मुझे कोई चुनार जाने को कह दे – जो मेरे अपने कार्यक्षेत्र का अंग है और जिसके कर्मचारी मेरे कहने पर सभी सम्भव कम्फर्ट मुहैया करा देंगे – तो भी मैं वहां न जाऊं। जाने के लिये ठेला जाऊं तो बात अलग है!  

जरा सा परिवर्तन, जरा सा डिसकम्फर्ट सहा नहीं जाता। कैसे बदला जाये अपने स्वभाव को?Thinking

कोई सुझाव हैं आपके पास?  


लगता है इस जिप्सियाना प्रश्नों के चलते मेरी ब्लॉगिंग अनियमित रहेगी।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

22 thoughts on “कैसे लाऊं जिप्सियाना स्वभाव

  1. ज्ञान जी मुझे आप का तो पता नहीं पर मैं सब ब्लोगरों की आत्मियता देख भाव विभोर हो रही हूँ। पूरे भारत से निंमत्रण है, वाह्। जहां तक मुझे याद आता है आप तो हर समस्या का निदान गीता और रामायण में ढूढते हैं राम भी घर से इतनी दूर गये थे जगंल में भी एक जगह नहीं बैठे, कुछ तो लिखा होगा इसके बारे में कैसे निपटते थे इस अवसाद से, पढ़ें तो हमें भी बताइएगा, अपुन तो ऐसी किताबे कभी पढ़ते नहीं।वैसे बम्बई आने का नीरज जी का प्रस्ताव अच्छा है, हम मानते है कि अब आराम करने से ज्यादा अच्छा काम अब कोई नहीं, प्रकति की गोद में चाय सुड़किये, घर की बनी थर्मस में ले जाइए। आप ने तो कहा था कि आप के सब पेपरस फ़ैक्स से घर आ जाते हैं तो द्फ़्तर काहे जाते हैं…।…।:)

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  2. “पर घर का रास्ता भी नयी जगह से पंद्रह मिनट और लम्बा हो गया है।””कोई सुझाव हैं आपके पास? “जी हां सुझाव हैं. सबसे पहले तो यह सोचना शुरू कर दीजिये कि अधिक यात्रा करने के कारण कल के चिट्ठे के बारे में सोचने के लिये हर दिन 15 मिनिट अधिक मिलने लगेंगे !!

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  3. ज्ञान जी, नए दफ़्तर की ज़्यादातर समस्याएँ दो-चार दिनों में दूर हो जाने लायक हैं. जैसे-ट्यूबलाइट, चपरासी की घंटी, इंटरनेट-इंटरकॉम, चाय बनाने की व्यवस्था आदि. हाँ, मच्छरों की समस्या थोड़ी बड़ी है कम-से-कम जाड़े भर के लिए. शाम को घर पहुँचने में 15 मिनट ज़्यादा लगना भी कुछ दिनों तक ज़रूर ही खलेगा. लेकिन महीने भर में सब कुछ नॉर्मल लगने लगेगा. दिल्ली में पढ़ाई और नौकरी के दौरान मैं भी कुल तीन अलग-अलग जगहों पर रहा था. तब तो गाँव से 1100 किलोमीटर दूर की दिल्ली ही मेरे लिए विदेश जैसी थी, लेकिन उस विदेश में भी एक जगह से उखड़ना खलता था. दरअसल स्थान परिवर्तन के दौरान आप अपने कमरे की दीवरों-खिड़कियों, गलियों-सड़कों-नालों, आवारा कुत्तों, भटकती गायों, मुहल्ले के सब्ज़ी बेचने वाले कुँजरों, अख़बार के हॉकर, मुहल्ले की परचून की दुकान और ढाबे जैसी न जाने कितनी ही चीज़ों को एक झटके में ही पीछे छोड़ देते हैं जो कि काफ़ी दिनों से आपकी पारिस्थितिकी का, आपके इकोसिस्टम का अभिन्न हिस्सा थीं.लेकिन विश्वास करें, पखवाड़े से महीने भर में दोबारा सब कुछ सामान्य हो जाता है, एक नई पारिस्थितिकी निर्मित हो जाती है आपके इर्दगिर्द. आपको हमारी शुभकामनाएँ!

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  4. भईया हमारे साथ तो बिल्कुल उल्टा हुआ.देहली के पाँच सितारा टाइप के ऑफिस से जब खोपोली आए तो ऑफिस और रहने के नाम पर जो था वो किसी तबेले को शर्मिंदा करने के लिए काफ़ी था. लेकिन हम ने उनका भी भरपूर आनंद किया. आज सब कुछ बदल गया है. वैसे आप का सोच भी समय के साथ बदल जाएगा. देख रहा हूँ लोग आप को बुला बुला के नए नए प्रलोभन दे रहे हैं उनको छोडिये. हम कब से कहे जा रहे हैं आप यहाँ आयीईये और कुछ भी काम मत कीजिये सिवाय प्रकर्ति को निहारने, टाँगे पसारने और चाय सुड़कने के अलावा. जीवन में आनंद लेने से अधिक ज़रूरी और काम है ही नहीं.नीरज

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  5. अपनी तो सलाह है कुछ दिन के लिए चंबल के इलाके में आ जाईये बीहड़ घूम लेंगे तो दुनियां में किसी भी नयी जगह एडजस्‍ट होने में परेशानी नहीं आयेगी.

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  6. पंकज अवधिया जी ने रायपु्र आने का निमंत्रण दे ही दिया है आपको, मै भी समर्थन करता हूं! बहुमत हो गया रायपुर के लिए!!वैसे रेलवे अपने ऐसे मुख्यालयों को इतना शानदार खर्च करके बनवाता है कि सरकारी लगते ही नही, बिलासपुर में देखा, रायपुर में भी देखा!! कहीं से सरकारी दिखता ही नही सिर्फ़ कामकाज से मालूम चलता है कि सरकारी है ;)

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  7. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। आप आज काफी हाउस हो आये, लौटते मे चने ले लीजियेगा फिर रविवार को कुछ देर गंगा तट पर बिताइयेगा। हो सके तो उस किसान से भी मिल लीजियेगा जिसके बारे मे आपने पहले लिखा था। फिर भी मन उचटे तो दीपक जी के साथ रायपुर आ जाये। उस वैद्य के पास चलेंगे।

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  8. आप तो बहुत छोटे से बदलाव से परेशान हो गए । हम तो इतने घर, जगहें, प्रदेश बदल चुके हैं कि मजाल है जो सपने में कभी अपना घर दिखे, सदा एक नए घर में ही रह रही होती हूँ ।जहाँ तक मेरा अनुमान है आप भी बहुत जगह की बदलियाँ झेल चुके होंगे ।वैसे मनुष्य एक ऐसा जीव है कि हर परिवर्तन को बहुत जल्दी झेलना सीख लेता है व उसके अनुसार ही स्वयं को ढाल लेता है ।घुघूती बासूती

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  9. ई का पांडे जी, आप जैसा व्यक्ति भी अवसादों से घिर जाएगा तो दूसरों का का होगा?सारा अवसाद इधर ब्लॉग पर ठेला जाए, भले ही दिनो की चार पोस्ट होएं, हम लोग तो है ही, पढने और कमेंटियाने के लिए। और हाँ, चुनार भी एक बार हो ही आइए, कम से कम एक और एचीवमेंट हो जाएगा कि देखा जो नामुमकिन दिख रहा था कर दिखाया। तो फिर जल्दी से यात्रा की तैयारियां कीजिए, थोड़ा मन भी बहल जाएगा, और कुछ नयी पोस्ट का मसाला भी मिल जाएगा।

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  10. नए और जोरदार दफ्तर मे जाने की बधाई ।और रहा सवाल स्वभाव बदलने का और नए दफ्तर मे adjustment का तो वो दो-चार दिन मे ठीक हो ही जाता है।अरे आप प्रकृति के मजे लीजिये। :) (परदे नही लगें है न )

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