मेरा वोटर कार्ड घर में आलमारी में बन्द था और चाभी पत्नीजी ले कर बोकारो गई थीं। लिहाजा मैने (अपने आलस्य को तार्किक रूप देते हुये) तय किया कि वोट डालने नहीं जाना है। यह तेईस अप्रेल की बात है।
पर शाम को सवा चार बजे अचानक मन बना वोट डालने का। मैं दफ्तर का आइडेण्टिटी कार्ड जेब में डाल कर मतदान केन्द्र पर पंहुचा और बूथ-लोकेटर से पूछा कि हमें किस बूथ पर जाना है? वोटर कार्ड न होने की दशा में लोकेटर महोदय को हमारा नाम लिस्ट में तलाशना था। उन्होंने मुझसे कहा कि बाहर बहुत से पार्टी वाले हैं, उनसे पर्ची बनवा लाइये। मैने अपनी बात रखी कि मैं किसी दल वाले के पास क्यों जाऊं? मेरे पास आइडेण्टिटी कार्ड है और इण्डिपेण्डेण्ट विचार रखता हूँ। अत: आप ही लोकेट करें।
लोकेटर महोदय ने ११ बूथ की लिस्टों में मेरा नाम छांटने का असफल काम किया। फिर उनसे लिस्टें ले कर मैने अपना नाम छांटा। तब तक पांच बजने में कुछ ही मिनट रह गये थे। लोकेटर जी ने मुझे झट से बूथ पर जाने को कहा। बूथ में घुसने वाला मैं अन्तिम आदमी था। उसके बाद पांच बजे के अनुसार दरवाजा बन्द कर दिया गया था।
असली ड्रामा बूथ में हुआ। कर्मचारी ने मुझसे पर्ची मांगी। मैने कहा – “लोकेटर जी ने मेरा कोई नम्बर लिख कर तो दिया नहीं। यह जरूर है कि इसी बूथ पर है मेरा नाम। अब आप मुझे वोट डालने दें।”
“हम कहां छांटेंगे आपका नाम। आप वापस जा कर पता कर आयें।”
“वापस तो नहीं जाऊंगा। तब आप कहेंगे कि पांच बजे के बाद आया हूं और वोट देने नहीं देंगे। आप तो अपने पास की लिस्ट में देखें और मुझे वोट देने दें।”
उन कर्मियों ने मुझ नौकरशाह पर सरकारी टरकाऊलॉजी चलाने की पूरी कोशिश की। पर मैने तो कहा कि समय सीमा में वोट डालने आया हूं। खुद ही पता किया है अपना बूथ। लिहाजा वोट डाल कर ही जाऊंगा। बूथ पर एल्फाबेटिकल लिस्ट नहीं थी। ढेरों पन्नों में मेरे नाम की खुजाई शुरू हुई। बाकी कर्मी सामान सील कर जाने की जल्दी में थे। एक ने सुझाव दिया कि किसी वोट न डालने वाले के नाम से इनको वोट देने दो। मैने मना कर दिया – वोट तो अपना ही देना है – फर्जी नहीं। इस बीच एक कॉस्टेबल हडकाने आया मुझे। उसे मैने कहा कि तुम अलग रहो, यह कायदे की बात है और तुम्हारे टांग अड़ाने का काम नहीं है।
खैर, जब मैं नाम ढूंढने के बाद (यहां भी नाम अन्तत: मैने तलाशा) वोट डाल कर निकला तो पांच बज कर इकत्तीस मिनट हो रहे थे। हड़बड़ी में मेरी उंगली पर स्याही का निशान लगाना भी भूल गये थे बूथ कर्मी। पर यह संतोषप्रद था कि उन्होंने मेरा वोटर-अधिकार ट्रेम्पल (trample – पददलित) नहीं किया।
मेरे ऑब्जर्वेशन:

१. पार्टियों के एजेण्ट अगर पर्चियां न बना कर दें तो चुनाव बन्दोबस्त लोगों का नाम ढूंढ कर बूथ पर भेजने के लिये अपर्याप्त है। मेरे जैसे आठ-दस कस्टमर भी पूरी प्रक्रिया में देरी करा सकते हैं।
२. बूथ-लोकेटर का फंक्शन कम्प्यूटराइज होना चाहिये।
३. एक अल्फाबेटिकल लिस्ट, जो लोकेटर के पास उपलब्ध है, वह बूथ पर भी होनी चाहिये।
४. सम्भव हो तो यह सब नेट पर उपलब्ध होना चाहिये। लोग खुद ही अपना बूथ ऑनलाइन तलाश सकें और पार्टी एजेण्टों का रोल समाप्त हो सके।

हम कहेंगे…जागरूक वोटर… !
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मैं आपके ऑब्जर्वेशन व सुझावों से पूर्णतया सहमत हूँ और इस बात से व्यथित भी कि कल ही आयरलैण्ड की संसद ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग से पेपर वोटिंग में पुनः लौटने का निर्णय लिया है ।क्या सुधार हुआ है१. ई वी एम से कागज की महान बचत हुयी है और यह पर्यावरण के लिये वरदान है२. ई वी एम से बूथ कब्जिया कर आधे घंटे में ही सारे वोट डालने की घटनायें बन्द हो गयीं हैं क्योंकि ई वी एम में दो वोटों के बीच एक समयान्तराल की व्यवस्था है ३. ई वी एम से परिणाम तुरन्त ही निकल आते हैं और अनावश्यक विवाद नहीं होता है४. ई वी एम से मत बेकार नहीं होते हैं क्योंकि एक बटन दबाना ठप्पे लगाने से अधिक सरल है क्या और सुधार हो सकता है१. वोटर पंजीकरण और भी अधिक आसान होना चाहिये । सारे माध्यम उपलब्ध रहने चाहिये ।२. वोटर सूची का कम्प्यूटरीकरण व इण्टरनेटीकरण होना चाहिये और गलतियों को ठीक करने की प्रक्रिया सतत होनी चाहिये३. चुनाव सर्वर में वोटिंग के दिन लाईव फीड होनी चाहिये । बूथ अधिकारियों को पीडीए में वोटर का नाम खोजने व वोट डालने के पश्चात चेक आउट करने की व्यवस्था होनी चाहिये । जीपीआरएस के माध्यम से यह डाटा चुनाव सर्वर तक तुरन्त ही पहुँच जायेगा ४. पहचान सुनिश्चित करने के पश्चात इण्टरनेट के माध्यम से भी अपने क्षेत्र के लिये मतदान की सुविधा तब दी जा सकती है५. ’इनमे से कोई नहीं’ का विकल्प भी वोटरों के पास रहने से राजनैतिक पार्टियों पर और अच्छे उम्मीदवार खड़े करने का दबाब रहेगा
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शुक्र है आपने वोट न देने का अपना निर्णय बदल ही लिया परेशानियाँ तो गौण हैं असली चीज है निश्चय
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हा हा हा हा हा हा हा हा ! खूब मजा आया ! रेल परिहालन का माहिर कैसा झेल गया -लोकतंत्र के अश्वमेध यग्य में ! अह्लिये बधाई हो ! आप शुक्र मनाईये वहां लोकेटर मिल गया ! नहीं तो आप बूथ ही खोजते रह जाते !
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वोटर पॉवर जिंदाबाद . वैसे आप सरकारी अधिकारी हो आम वोटर नहीं इसलिए वोट पड़ गया और अगर कोई आम आदमी इतनी बहादुरी दिखाता तो उसे इतनी पड़ती कि हर पुरवाई पर शरीर दुखता .
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मैं तो सोच रहा हूँ उन कर्मियों के मन में क्या चल रहा होगा – अरे यार टिंकू की मम्मीया को बोला था मतदान खत्म होते ही घर आ जाउंगा तब मिलकर फिलिम देखने चलेंगे पर असली फिलिम तो यहीं शुरू है एक वोटडालू आदमी की वजह से जैसे ये वोट नहीं डालेंगे तो सरकार नहीं बनेगी।दूसरा सोचेगा – अरे यार मेरी तो आज सढुआईन आ रही है और ये आदमी है कि मुझे नाहक देर करवा रहा है। पूछो उससे कि क्या उसकी कोई सढुआईन है कि नहीं :)तीसरा कहेगा – यार जाने दो थोडा देर ही सही। आज घर जल्दी जाउंगा तो पत्नी कहेगी – आ गये सरकार बनवा के। जाओ पहले सब्जी साफ करो, जूठे बर्तन है थोडे मांज दो आज मेरे सिर में बहुत दर्द है कम्बख्त उसको क्या पता कि मैं ही हूँ जिसके वजह से वोट पडता है और प्रधानमंत्री को बर्तन नहीं धोना पडता :)
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are gurudev achha hua jo vote karne gaye anyatha itnee kamiyon kaa pata nahin chaltaa. waise badhiyaa claas lee aapne ee tarkaulogee ke staaf kee….
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बहादुर वोटर।
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बड़े भाई, आप तो मतदान कर्मियों के लिए वाकई मुसीबत बन गए थे। वैसे ही जब सारे अनुष्ठान के बाद आरती करने के लिए बत्ती बनाने को रुई न मिले। जरूर पूरा मतदानदल अनेक दिनों तक आप को गालियाँ दे दे कर याद करेगा। पूरा मतदान करा देने पर एक खड़ूस आदमी आखिर में आ कर फँस गया। हमारे घऱ पार्टी वाले लोग खुद पर्चियाँ दे जाते हैं। हम उस में से अपना नंबर याद कर के जाते हैं और हमेशा मत दे आते हैं। पर इस बार हमारा भी मन नहीं कर रहा है। पर मत देनें जाएंगे चाहे नो वोट ही क्यों न कर के आएँ।
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टरकालाजी शब्द ने मुझे किया अभिभूत।वोट डालना हो अगर हो जाएं मजबूत।। सादर श्यामल सुमन 09955373288 मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं। कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।। http://www.manoramsuman.blogspot.comshyamalsuman@gmail.com
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