मानसिक हलचल एक ब्राउन साहबी आत्मा का प्रलाप है। जिसे आधारभूत वास्तविकतायें ज्ञात नहीं। जिसकी इच्छायें बटन दबाते पूर्ण होती हैं। जिसे अगले दिन, महीने, साल, दशक या शेष जीवन की फिक्र करने की जरूरत नहीं।
इस आकलन पर मैं आहत होता हूं। क्या ऐसा है?
और क्या दमदार टिप्पणियां हैं पिछली पोस्ट पर। ऐसी परस्पर विरोधी, विचारों को खड़बड़ाने वाली टिप्पणियां पा कर तो कोई भी ब्लॉगर गार्डन गार्डन हो जाये! निशाचर जी तो अन्ततक लगे रहे नीलगायवादियों को खदेड़ने में! सारी डिबेट क्या क्या मारोगे और क्या क्या खाना छोड़ोगे की है! असल में समधान उस स्तर पर निकलना नहीं, जिस स्तर ने समस्या पैदा की है!
मेरे समधीजी कहते हैं – भईया, गांव जाया करो। जमीन से जुड़ाव महसूस होगा और गांव वाला भी आपको अपना समझेगा। जाने की जरूरत न हो, तब भी जाया करो – यूंही। छ महीने के अन्तराल पर साल में दो बार तो समधीजी से मिलता ही हूं। और हर बार यह बात कहते हैं – “भईया, अपने क्षेत्र में और गांव में तो मैं लोगों के साथ जमीन पर बैठने में शर्म नहीं महसूस करता। जो जमीन पर बैठे वो जम्मींदार और जो चौकी पर (कुर्सी पर) बैठे वो चौकीदार”! मैं हर बार उनसे कहता हूं कि गांव से जुड़ूंगा। पर हर बार वह एक खोखले संकल्प सा बन कर रह जाता है। मेरा दफ्तरी काम मुझे घसीटे रहता है।
और मैं जम्मींदार बनने की बजाय चौकीदार बने रहने को अभिशप्त हूं?! गांव जाने लगूं तो क्या नीलगाय मारक में तब्दील हो जाऊंगा? शायद नहीं। पर तब समस्या बेहतर समझ कर समाधान की सोच सकूंगा।
संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में केण्डीडेट सीधे या ऑब्ट्यूस सन्दर्भ में देशभक्ति ठेलने का यत्न करता है – ईमानदारी और देश सेवा के आदर्श री-इटरेट करता है। पता नहीं, साक्षात्कार लेने वाले कितना मनोरंजन पाते होते होंगे – “यही पठ्ठा जो आदर्श बूंक रहा है, साहब बनने पर (हमारी तरह) सुविधायें तलाशने लगेगा”! चयनित होने पर लड़की के माई-बाप दहेज ले कर दौड़ते हैं और उसके खुद के माई बाप अपने को राजा दरभंगा समझने लगते हैं। पर तीस साल नौकरी में गुजारने के बाद (असलियत में) मुझे लगता है कि जीवन सतत समझौतों का नाम है। कोई पैसा पीट रहा है तो अपने जमीर से समझौते कर रहा है पर जो नहीं भी कर रहा वह भी तरह तरह के समझौते ही कर रहा है। और नहीं तो मुनीश जी जैसे लोग हैं जो लैम्पूनिंग करते, आदमी को उसकी बिरादरी के आधार पर टैग चिपकाने को आतुर रहते हैं।
नहीं, यह आस्था चैनल नहीं है। और यह कोई डिफेंसिव स्टेटमेण्ट भी नहीं है। मेरी संवेदनायें किसान के साथ भी हैं और निरीह पशु के साथ भी। और कोई साहबी प्रिटेंशन्स भी नहीं हैं। हां, यह प्रलाप अवश्य है – चूंकि मेरे पास कई मुद्दों के समाधान नहीं हैं। पर कितने लोगों के पास समाधान हैं? अधिकांश प्रलाप ही तो कर रहे हैं। और मेरा प्रलाप उनके प्रलाप से घटिया थोड़े ही है!


गाँव से आप का सरोकार नहीं रहा है तो गाँव जाने का कोई अर्थ नहीं है। गाँव से सरोकार बनाना है तो वहाँ जमीन का एक टुकड़ा आप का होना चाहिए। वह नहीं तो बनाना चाहिए। नहीं तो जहाँ हम अपना जीवन जी रहे हैं वहीं कुछ सार्थक भी कर सकते हैं। मैं समझता हूँ आप करते भी होंगे। आप में मानव जीवन के प्रति जो प्रतिबद्धता है वह चुप नहीं रह सकती। गंगातीर की सफाई की बात यूँ ही पैदा नहीं होती। अगर आप अफसर हैं तो अफसर बन कर रहना भी पड़ेगा, वर्ना आप अपनी ड्यूटी नहीं कर पाएँगे। समय तो अब नौकरी में तो और कम होता जाएगा, उस के मिलने की संभावना तो सेवानिवृत्ति के पहले नहीं हो सकती। असल मुसीबत तो हम जैसे प्रोफेशनल लोगों के सामने है जिन का कोई रिटायरमेंट नहीं है। उन्हें तो इसी वक्त अपने लिए समय निकालना होता है। प्रोफेशन की अपनी चुनौतियाँ हैं। वहाँ सतत सजग रहना होता है, जरा सी चूक हुई नहीं कि पैरों तले जमीन ऐसे खिसकती है कि पता नहीं चलता है। पता चलता है जब तक आप जमींदोज हो चुके होते हैं।
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ये प्रलाप भारत से भागे हुए भारतवासी का है (नॉन रिलायबल इंडियन; कोई क्रांतिकारी कुछ बोले उससे पहले अपने जूते को अपने सर पर मार लिया जाए कोई बुराई नहीं है, कम से कम क्रांतिकारियों का एक बोझ कम हो जायेगा) तो गौर फरमाए…जम्मीदार तो बनना ही पड़ेगा, चाहे जैसे भी हालात हो चाहे प्रकृति को बचाना हो या बिगाड़ना हो ( अगर एक नया मेट्रोपोलिटन सिटी ही बसाना हो):) , अपने मन का नया काम कमसे कम भारतीय शहरों में तो नहीं ही किया जा सकता है. तो अगर सुविधा है तो जड़ो को पकड़ के रखिये. हां जड़ को फिर से ज़माने में मेहनत तो लगेगी ही. पिछली पोस्ट सचमुच मानसिक हलचल पैदा करने वाली रही, कुछ हलचल मेरी तरफ से-नीलगाय वाली समस्या का हल निशाचर जी की आखिरी टिपण्णी और आप के ब्लॉग के प्रारंभ में ही है, ये बात अलग है की बहस शहरी और ग्रामीण के नाम पर झिक झिक में बदल गयी. फ़ूड चेन के सबसे शिखर पर बैठे प्राकृतिक नियंत्रक यानी बड़े शिकारी शेर, बाघ, चीता, तेंदुआ, लोमड़ी, सियार, लकड़ बग्घा को तो "धर्मभीरु " राजा, नवाब और शिकारी साहब लोग मार के खा गए, तो नीचे की जनसँख्या का नियंत्रण कौन करेगा. इसलिए एक समझदार तरीका तो अपनाना ही होगा, नियंत्रित तरीके से पुराने पाप का असर कम करना ही होगा चाहे ये नया पाप ही हो . एक टिपण्णी और है कि नीलगायो का बंध्याकरण कर दिया जाय, सुनने में ये शायद कम क्रूर लगे, लेकिन ये एक अव्यवहारिक कदम ही होगा, नीलगाय ना तो दो चार की संख्या में है, ना तो पालतू जानवर है की उसको पकड़ा जा सके, तथा बंध्याकरण पर भी वो भोजन करना तो छोड़ेंगे नहीं, हां शायद वो ज्यादे आक्रामक हो जायेंगे ( ये तो सभी स्वीकार करेंगे की गैर पालतू जानवर का व्यवहार उसके शारीरिक परिवर्तन के बाद क्या होगा इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है). बेहतर यही होगा की प्राकृतिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संरक्षित शिकार के साथ नीलगायो की जनसँख्या को नियंत्रित किया जाए.
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देखा आपने। आपने मुनीश की टिप्पणी को लैम्पूनिंग कहा और उन्होंने अपनी बात साफ़ करते हुये तड़ से अनकंडीशनल क्षमा मांग ली। अब आप का करोगे? एक पोस्ट लिखोगे या यहीं कहोंगे कि लैम्पूनिंग से मेरा मतलब था……। बहुत कठिन है डगर ब्लागिंग की। है न!
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प्रलाप ही सही..भीतर कहीं किसी कोने से तो निकलता है प्रलाप.. वरना आज तो बाबू लोगों को प्रलाप तक के फ़ैशन की भी फुर्सत नहीं रही है
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Pls. read the missing "It" in the first line !
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"यही पठ्ठा जो आदर्श बूंक रहा है, साहब बनने पर (हमारी तरह) सुविधायें तलाशने लगेगा”! "यह हमारे देश में दी जाने वाली शिक्षा का ही परिणाम है।
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Gyaan ji is not fashionable or politically correct even for animal-rights activists to speak for poor COW (Gayy-mayya), but to speak for the rights of stray dogs , man eating leopards and crocodiles is very much in vogue . So, when you talked of saving crop -destroyer Neel Gaay ; i too got hurt . Please note Neel gaay is a big problem for farming community of Haryana and Rajasthan as well. Herds of this animal have caused many road accidents .I am one of your admirers Gyan ji and it was not my intention to hurt you , but if it so happened ,even though in a humourous vein,I apologise unconditionally.
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ओह..!!!शब्द आहत भी कर देते हैं …पर आप डिगने वालों में से नहीं…
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सूक्ति – "जीवन सतत समझौतों का नाम है ।" @ "अधिकांश प्रलाप ही तो कर रहे हैं .."मेरे नाटक का बुद्ध भी यूँ ही बड़बड़ाने वाला प्रलापी है, पर….
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समधी जी बिलकुल बजा फरमाते हैं -आप गाँव गिरावं जाया करिए -जरा जमीन जायदाद पर पर भी नजर रखिये १ आदरणीय रीता भाभी को भी ले जाया करिये ! नौकरी कब तक है -जीवन के और मायने भी तो खोजे जाने चाहिए ,है की नहीं ज्ञान जी ?
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