पद्मजा के नये प्रयोग

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


पद्मजा का स्कूल बंद है और खुलने की सम्भावना इस स्कूल सत्र में तो है ही नहीं। उसे घर में पढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है। उस विषय में मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा था।

उसके पास समय बहुत है। समय भी है और ऊर्जा भी अपार है। स्कूल के मित्र नहीं हैं। आसपास दलित-पासवान-बिंद बस्तियां हैं। उनके बच्चे कभी कभी घर में आ कर खेलते हैं। पद्मजा की साइकिल और घर में लगा झूला उनके लिये बड़ा आकर्षण है। यदा कदा पद्मजा को उन्हें टॉफियां देने को भी कहा जाता है।

उनके साथ पद्मजा खेलती है, पर वे स्कूल के मित्रों जैसे अंतरंग नहीं हो पाये हैं। उनके साथ थोड़ी सजगता रखनी पड़ती है। कुछ बच्चे छोटे हैं, पर उनकी भाषा में अपशब्द बहुत सहज भाव से हैं – वे उनका अर्थ नहीं जानते पर सीखे उन्होने अपने परिवेश से हैं। पद्मजा को अंततोगत्वा उनका भी परिचय पाना है; पर शायद यह वह उम्र नहीं है।

पौधा उगाने का प्रयोग करने को तैयार पद्मजा

मैजिक क्रेट में पौधा उगाने का एक एपरेटस आया है। कल पद्मजा ने उसे सेट किया। ऊपर के बर्तन में क्रेट में दी गयी मिट्टी की टिकिया रखी गयी है। नीचे के बर्तन में पानी है। पानी कैपिलरी-एक्शन से एक रस्सी के सहारे मिट्टी को गीला रखेगा। मिट्टी में सरसों के बीज डाले गये हैं। उपकरण को ऐसी जगह पर रख दिया गया है जहां दिन भर पर्याप्त सूरज की रोशनी मिले।

आज उस एपरेटस का निरीक्षण किया। नीचे के बर्तन में पानी कम हो गया है। ऊपर के बर्तन में मिट्टी और गीली हो गयी है और फूल भी गयी है। पानी रस्सी से केपिलरी-एक्शन से ऊपर के बर्तन में पंहुचा है; यह स्पष्ट हुआ है पद्मजा को। एक बर्तन में तो पूरा पानी केपिलरी एक्शन से मिट्टी में चला गया। दूसरी में, जिसमें शुरुआत में मिट्टी ज्यादा गीली थी, आधा पानी ऊपर पंहुचा।

बर्तन में केपिलरी-एक्शन का प्रयोग

पद्मजा को यह भी बताया गया कि रस्सी की तरह पौधों की जड़ें भी पानी को पौधे में ऊपर की ओर ले जाती हैं।

पद्मजा की विज्ञान की किताब में सूरज की छाया के बारे में लिखा है। सवेरे और शाम को छाया बड़ी और अलग अलग दिशा में होती है। दिन में छाया छोटी होती है। यह समझाने के लिये एक धूप घड़ी बनाने का प्रयोग किया। पद्मजा को छोटी-बड़ी छाया और उससे दिन का समय जोड़ने का कॉन्सेप्ट समझ आया। यह सब उसे कमरे में चित्र बना कर भी बताया जा सकता था। उसमें समय कम लगता पर शायद वह उसके दिमाग में ज्यादा देर नहीं टिकता। अब, धूप-घड़ी शायद वह बड़ी होने पर भी याद रखे!

धूप घड़ी का प्रयोग

धूप घड़ी वाले स्थान पर उसे एक बड़ा गोजर (शप्त-पद, सेण्टीपीड) भी दिखा। उस सेण्टीपीड के माध्यम से मैंने कीडो‌ं का भी ज्ञान देने का प्रयास किया।

कुछ भी नया बताने पर बहुत से सप्लीमेण्ट्री प्रश्नों के लिये तैयार रहना होता है। और कई बार प्रश्न नितांत अलग विषय के होते हैं। बहुधा मैं कोई किताब पढ़ रहा होता हूं या आराम कर रहा होता हूं, तब भी वह चली आती है अपनी जिज्ञासा का पिटारा ले कर।

उसकी नयी साइकिल आयी है। जन्म-दिन की भेंट यद्यपि जन्मदिन के रोज नहीं, कुछ सप्ताह बाद आयी। उस साइकिल को ले कर भी भांति भांति की कल्पनायें हो रही हैं। साइकिल का नाम उसने रखा है – पंख। पक्षी पंख से उड़ते हैं, पद्मजा साइकिल से उड़ना सीख रही है। इसी साइकिल से वह भारत घूमना चाहती है।

अपने “पंख” पर सवारी करती पद्मजा

आज बता रही थी कि वह जब साइकिल से मदुराई (मदुरै – तामिलनाडु) जायेगी तो वहां लड़कियों द्वारा बनाया जाने वाला कोलम देखेगी। उसे कोलम (स्त्रियों द्वारा बनाया जाने वाला अल्पना या रंगोली) के बारे में किसने बताया? शायद टेलीविजन ने। पर मुझे खुद भी यह नहीं मालुम था कि मदुरै की लड़कियां कोलम बनाती हैं। 😆

तमिळ महिलाओं द्वारा बनाया कोलम (चित्र सोर्स – https://bit.ly/3fnX2Sb )

गांव में बहुत बड़ा परिसर है पद्मजा के लिये। घर, पेड़, फूलों के पौधे, सब्जियां, परिसर में ही खेत और तरह तरह के जीव और पक्षी। बहुत कुछ है सीखने के लिये। और जो नहीं है वह ऑनलाइन तथा इण्टरनेट पर उपलब्ध वीडियो, पुस्तकों और कुरियर द्वारा आने वाले पैकजों के माध्यम से मिल रहा है। कुल मिला कर उसे एक शहरी बच्चे से कम संतृप्त सीखने को नहीं मिल रहा होगा।

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है।


सात महीने हो गये। स्कूल बंद हैं। पहली से दूसरी में बिना परीक्षा लिये पंहुच गयी है पद्मजा (मेरी पोती)। कुछ समय ह्वाट्सएप्प पर स्कूल वालों ने होमवर्क देने और नोटबुक पर किये कार्य के उसी चैट में भेजे चित्र को जांचने का यत्न किया। पर वह सब ठीक से चल नहीं पाया। गांव में माता पिता बच्चों को पढ़ाने के लिये स्कूल का पर्याय नहीं बन पाये। उनके पास समय और काबलियत दोनो की कमी रही। अत: स्कूल बंद ही माने जा सकते हैं – उचित टेक्नॉलॉजी और संसाधनों के अभाव में।

पद्मजा के स्कूल की तुलना में सरकारी स्कूल तो और भी दयनीय दशा में हैं। गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे, तो छुट्टा घूम ही रहे हैं। आपस में आसपड़ोस के बच्चों में हेलमेल तो हो ही रहा है। वे अभी भी कोई कोरोना अनुशासन का पालन नहीं कर रहे और स्कूल अगर खुले तो भी स्थिति वैसी ही रहेगी।

मेरी पत्नीजी और मेरी पोती पद्मजा। लगता है किसी चिड़िया या किसी गिलहरी/गिरगिट का अवलोकन हो रहा है।

मैंने पद्मजा के स्कूल के मालिक कैलाश जी से बात की। उन्होने बताया कि इस महीने के अंत तक वे पीटीए मीटिंग बुला कर अभिभावकों से सलाह करने के बाद ही स्कूल खोलने के बारे में कुछ तय कर पायेंगे। वे अपनी ओर से तो पूरा प्रबंधन कर सकते हैं। सेनीटाइजर, मास्क, हैण्डवाश आदि की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं। पर बच्चे तो बच्चे ही हैं। आपस में मिलेंगे ही। एक दूसरे का पानी पी जाते हैं। एक दूसरे का भोजन भी शेयर करते हैं। वह सब कैसे देखा जा सकता है?

महीने भर में; बड़ी कक्षाओं के स्कूल खुलने और अन्य गतिविधियों पर पंद्रह अक्तूबर से ढील दिये जाने के कारण संक्रमण कैसा चलता है और अभिभावक कितना आश्वस्त महसूस करते हैं; उसी आधार पर छोटे बच्चों का स्कूल खोलने का निर्णय हो पायेगा।

मुझे यह पक्के तौर पर लग रहा है की पद्मजा का इस स्कूल सत्र का मामला खटाई में पड़ गया है। अत: मैंने तय किया कि इस साल की सभी विषयों की पूरी पढ़ाई घर पर ही कराई जाये। अभी साल/सत्र के छ महीने बचे हैं। उसको इस साल का पूरा सेलेबस घर पर पढ़ाया-पूरा किया जा सकता है।

इस निर्णय के साथ मैं, एक रिटायर्ड व्यक्ति से एक बच्चे का पूर्णकालिक अध्यापक बन गया। जब मैं, चार दशक पहले, बिट्स, पिलानी में छात्र था, तो मुझे विभागाध्यक्ष महोदय ने मेरी अभिरुचि और योग्यता को ध्यान में रखते हुये मुझे लेक्चररशिप का ऑफर दिया था। तब दिमाग भी उर्वर था और कुछ ही समय में मैं परा-स्नातक और और पीएचडी कर लेता। पर उस समय पारिवारिक दबाव और खुद की चाहत से लगा कि सरकारी अफसरी कहीं बेहतर रहेगी। अगर मैं अपने विभागाध्यक्ष जी का ऑफर स्वीकार कर लेता तो मेरी व्यवसायिक दिशा कुछ और ही होती।

अब परिस्थितियाँ मुझे पहली/दूसरी कक्षा का अध्यापक बना रही हैं। 😆

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है। अपनी पत्नीजी को मैंने अपनी आशंकायें बतायीं, पर मेरी सुनी नहीं गयी। मैं “द कर्स ऑफ नॉलेज” से अभिशप्त था। मुझे पद्मजा के स्तर पर उतर कर सोचने और समझाने की क्षमता विकसित करनी थी।

डिज्नी-बायजू पैकेज

बाजयू की अर्ली लर्न पेकेज वाली कक्षा में पद्मजा

यह मेरा सौभाग्य था कि कुछ महीने पहले डिज्नी-बायजू का अर्ली लर्नर्स का पैकेज पद्मजा के लिये ले लिया था। अभी वह बायजू के टैब से, अपने हिसाब से जो मन आ रहा था, वह कर रही थी। बायजू का यह पैकेज लेने के बाद मुझे लग रहा था कि यह भारतीय (और मेरे संदर्भ में गंवई) परिवेश के लिये फिट नहीं बैठता था। इस कारण से मैंने उसके प्रयोग पर बहुत ध्यान नहीं दिया था।

पर अब मैंने पाया कि भाषा कीं समस्या के बावजूद पद्मजा मेरी अपेक्षा उन डिज्नी चरित्रों से बेहतर तालमेल से पढ़ाये गये विषय समझ रही थी। उसके वीडियो और गेम्स में आने वाले चरित्र – डीटी, जेन और जेक्सन उसे कहीं आसानी से गणित और अंग्रेजी सिखा रहे थे। मैंने उसी पैकेज से अपना टीचिंग प्रारम्भ करने की सोची।

बायजू की फेसिलिटेटर महोदया से बातचीत कर यह तय किया कि पद्मजा का अब तक का पढ़ा प्लान व्यवस्थित तरीके से एक बार पुन: रिवाइज कर लिया जाये और जो कुछ उसने नहीं पढ़ा; उसे पूरा कराया जाये। लगभग एक महीने में मैंने छ महीने के लर्निंग प्लान का बैकलॉग निपटा कर व्यवस्थित कर लिया। इस प्रक्रिया में पद्मजा को कुल चौबीस बैजेज में से बीस प्राप्त हो गये। उसकी विभिन्न स्किल्स में भी अति उत्तम (Excellent) कोटि प्राप्त हो गयी, जो पहले सामान्य स्तर की थी।

महीने भर बाद बायजू की पद्मजा के लिये नियत अधीक्षिका स्वाति प्रिया जी से चर्चा हुई तो उन्होने न केवल पद्मजा की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया वरन यह भी कहा कि प्रगति अभूतपूर्व है।

डिज्नी/बायजू का यह टैबलेट सहित आने वाला अर्ली लर्निंग पैकेज अच्छा है; पर फिर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि यह इण्डिया के लिये है, भारत के लिये नहीं। आवश्यकता है कि यह हिंदी या हिंगलिश में डब किया जाये और उसमें भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ भी लिये जायें। और मुझे यह यकीन है कि बायजू की टीम में पर्याप्त इनहाउस टैलेण्ट होगी।

इस पढ़ाने की प्रक्रिया में बायजू/डिज्नी पैकेज के अलावा मैंने भी अपने इनपुट्स दिये। पद्मजा को यह अहसास कराया कि क्लास में किस प्रकार से अपनी बात को समझाया, बताया जाता है। किस प्रकार से अपने परिवेश को देखा जाता है। किस शब्द का कैसे उच्चारण किया जाता है। कैसे दुनिया को समझा जाता है। मैंने उसके लिये एक ग्लोब मंगाया और उसे विश्व के अनेक स्थानों और भूत काल में की गयी प्रमुख यात्राओं के बारे में भी जानकारी दी। पद्मजा को अब कोलम्बस, वास्कोडिगामा और झेंग हे (Zheng He) जैसे नाविकों के बारे में पता है। यह भी ज्ञात है कि उन्होने कहां से कहां तक यात्रायें की थीं।

मैंने उसे विज्ञान और हिंदी पढ़ाने की रूपरेखा भी बनाई।  

ज्वाइण्ट डायरी

मैंने एक ज्वाइण्ट डायरी बनाई, जिसमें मैंने अपने विचार लिखे और उसमें पद्मजा को भी लिखने, या चित्र बना कर बताने को कहा। मैंने लिखा कि किस तरह पद्मजा ने एक अच्छे सम्प्रेषक की तरह अपना प्रेजेण्टेशन दिया था। वह रात में सभी लाइट बुझा कर बोर्ड पर टॉर्च से फोकस कर एक डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म की तरह समझा रही थी। सात साल की बच्ची के लिये यह कर पाना अभूतपूर्व था! कुल मिला कर “द कर्स ऑफ नॉलेज” से मैंने पार पाने की विधा तलाश ली थी और पद्मजा जो शुरुआत में मुझसे डरी सहमी रहती थी, अब मित्र बन चुकी थी। ज्वाइण्ट डायरी में उसने लिखा तो बहुत नहीं, पर उससे उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन बहुत हुआ।

पद्मजा अपने ह्वाइट बोर्ड पर तरह तरह के कार्टून बनाती और मुझे उनपर व्याख्यान देती है!

घर का बना स्कूल

मैंने पद्मजा की स्टडी टेबल को नाम दिया बीडीबी (बाबा-दादी-बबिता) स्कूल। यह नाम उसके स्कूल – बीएलबी पब्लिक स्कूल की तर्ज पर रखा गया। अपने कमरे के बाहर यह नाम एक पन्ने पर प्रिण्ट कर बायजू के स्टिकर के साथ लगा दिया। स्कूल का समय भी नियत कर दिया। सवेरे साढ़े नौ बजे और दोपहर साढ़े तीन बजे।

प्रति दिन तीन से चार घंटे के बीच अध्ययन अध्यापन का कार्यक्रम रहता है। अभी तो पुराना बैकलॉग होने के कारण सप्ताह में सातों दिन चला स्कूल पर अब सप्ताह में एक दिन छुट्टी रहने का तय किया है हमने।

घर में मेरे बेडरूम में चलता पद्मजा का स्कूल

पद्मजा समय पर उठने लगी; समय पर क्लास के लिये उपस्थित होने लगी। अपने टैबलेट को विधिवत चार्ज करने लगी। किताबें और एक्सरसाइज बुक्स सम्भाल कर रखने लगी।

पिछले डेढ़ महीनों में घर में बहुत परिवर्तन हुये हैं। मेरा और मेरी पोती के समीकरण में व्यापक परिवर्तन हुआ है। पद्मजा में जो बदलाव है, वह तो अपनी जगह; मुझमें भी परिवर्तन हुये हैं। मुझे भी एक काम मिल गया है।

इस परिवर्तन में कीली की भूमिका डिज्नी/बायजू के अर्ली लर्नर प्रोग्राम ने निभाई है। उसने मुझे छोटे बच्चे को पढ़ाने/समझाने का एक नया नजरिया दिया है। स्वाति प्रिया जी ने भी बहुत सकारात्मक तरीके से मुझे सुना और अपने सुझाव/निर्देश दिये हैं।

फिलहाल मैं बच्चों की मानसिकता की बेहतर समझ के लिये डा. हईम सी गिनॉट (Haim C Ginott) की क्लासिक पुस्तक Between Parent and Child पढ़ रहा हूं। यही सब चलता रहा और स्वाति प्रिया जैसों के उत्साहवर्धक इनपुट्स मिले; तो शायद मेरे ब्लॉग का चरित्र बदल जाये। गंगा किनारे साइकिल पर भ्रमण करने वाले व्यक्ति की बजाय बच्चों पर सोच रखने वाले की पोस्टें आने लगें “मानसिक हलचल” पर। देखें, आगे क्या होता है!

अभी तो पद्मजा विषयक कुछ ही पोस्टें ब्लॉग पर हैं।

पद्मजा पाण्डेय मेज पर बैठ कर कार्टून बनाती और उसकी कथा मुझे सुनाती हुई।

हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 4)

भारत के उज्वल भविष्य की हमारी आशायें किसी अनिश्चय या भय से कुन्द नहीं हुई थीं। हम यकीन करते थे कि आम आदमी की जिन्दगी आने वाले समय में बेहतर होने वाली है।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का चौथा और अंतिम भाग हैैै।

भाग 3 से आगे –

कॉफी हाउस नियमित जाने वाले लोग वेटरों को उनके नाम से जानते और सम्बोधित करते थे। वेटर बड़ी स्मार्ट वर्दी – झक साफ सफ़ेद पतलून, लम्बे कोट और माड़ी लगी पगड़ी – में रहते थे। हेड वेटर के कमर में लाल और सुनहरी पट्टी हुआ करती थी जबकि अन्य वेटर हरी पट्टी वाले होते थे।

वे अधिकतर केरळ और तमिलनाडु के होते थे और इसके कारण इलाहाबाद का कॉस्मोपॉलिटन चरित्र और पुख्ता होता था। अधिकांश व्यवसायी पारसी या गुजराती थे -जैसे पटेल, गुज्डर (Guzder) या गांधी।

दो चाइनीज स्टोर और एक बंगाली मिठाई की दुकान भी हुआ करती थी। देश विभाजन के बाद कुछ पंजाबी भी आये। मुझे अच्छी तरह याद है मिस्टर खन्ना की लॉ की पुस्तकों की दुकान। खन्ना जी अपने छात्र दिनों के गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर की यादों की बातें किया करते थे।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 2)

अन्तत: ब्रिटिश राज पर पर्दा गिर गया। हम सभी नेहरू की मशहूर “tryst with destiny” वाला भाषण नहीं सुन पाये, चूंकि हम सब के पास रेडियो सेट नहीं थे। हम सब खुश थे, पर उस खुशी का गर्मजोशी से इजहार नहीं कर रहे थे।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का दूसरा भाग है।

भाग 1 से आगे –

एक छोटे कस्बे से आया नौसिखिया अण्डरग्रेजुयेट बड़ी देर तक बाथरूम में लगाता था। यह 1945-46 की सर्दियों का समय था। गर्म पानी का कोई इन्तजाम नहीं था। कई विद्यार्थी कई कई दिनों तक बिना नहाये रह जाते थे। जो नहाना चाहते थे, उन्हें सवेरे जल्दी नहाना पड़ता था। यह पाया गया कि यह नौसिखिया नौजवान बाथरूम में किसी से बात किया करता है।

हम सभी जानने को उत्सुक थे। हम में से एक ने दरार से झांका। नल चल रहा था और हमारा मित्र एक कोने में अधनंगा खड़ा था। वह अपने आप से बात कर रहा था – “तुम ठण्डे पानी से डरते हो, तुम कैसे ब्रिटिश हुकूमत को देश से खदेड़ोगे, अगर ठण्डे पानी से डरते हो। तुम इण्डियन नेशनल आर्मी के जवानों की सोचो, जो बर्मा में लड़ रहे हैं…” कुछ समय बाद उसमें पर्याप्त साहस आ गया और वह “वन्दे मातरम” का नारा (मानो वह युद्ध-उद्घोष हो) लगा कर नल के बहते पानी के नीचे कूद पड़ा।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)

सन 1944 में इलाहाबाद “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। कहा जाता था कि अगर एक ढेला यहां फेंका जाये तो किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।


हेमेन्द्र सक्सेना जी अब 91 वर्ष के हैं और उनकी सम्प्रेषण की क्षमता और काबलियत किसी भी मेधावी नौजवान से अधिक ही है। वे इलाहाबाद के उस समय के गवाह रहे हैं जब वहां हर गली नुक्कड़ पर महान विभूतियां चलती फिरती दिखाई पड़ती थीं। उन्होने “Remembering Old Allahabad” शृखला में नॉर्दन इण्डिया पत्रिका में लेख लिखे हैं। मेरे मित्र श्री रमेश कुमार जी – जो उनके पारिवारिक मित्र भी हैं, ने 14 पृष्ठों की हेमेन्द्र जी की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि की फोटोकॉपी दी है। मुझे नहीं मालुम कि यह एन.आई.पी. में छप चुकी है या नहीं। गौरी सक्सेना (उनकी पुत्री और मेरी रेलवे की सहकर्मी) ने बताया कि और भी बहुत सा उनका लिखा घर पर मौजूद है पर वे उसे प्रकाशित करने के बारे में बहुत मॉडेस्ट हैं।

गौरी सक्सेना ने अपने पिताजी की सहमति उनके लिखे के अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये दी है। मैं उनका आभारी हूं। यह करीब 5 भागों में प्रस्तुत होगा।

इस परिचयात्मक नोट के अन्त में कहा जा सकता है कि यह हेमेन्द्र सक्सेना जी की अतिथि ब्लॉग पोस्ट है।


हेमेन्द्र सक्सेना जी की हस्तलिखित पांडुलिपि का स्क्रीनशॉट
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