इस्माइल फेरीवाला

अर्थव्यवस्था को ले कर नौजवान रोना रो रहे हैं। #गांवदेहात में आठ हजार की मासिक आमदनी का मॉडल तो इस्माइल जी आज दे दिये मुझे।
…मुझे किसी अंगरेजी विद्वान का कथन लिखा याद आता है – न पढ़े होते तो सौ तरीके होते खाने-कमाने के!


उससे अचानक मुलाकात हो गयी। लेवल क्रासिंग पर मैं इंतजार कर रहा था ट्रेन के निकल जाने का। इंतजार भी लम्बा करना पड़ा। उस दौरान कई साइकिल, मोटर साइकिल वाले गेट बूम के नीचे से या उसे बाईपास कर निकल गये। इस ओर मैं अकेला अपनी साइकिल लिये खड़ा था।

मैं साइकिल नीचे से या बाईपास कर निकालने का काम नहीं करता। जिंदगी भर रेल की नौकरी में लेवल क्रासिंग को मैं ट्रेन परिचालन के लिये न्यूसेंस मानता रहा। कभी कोई गेटमैन सड़क यातायात के दबाव में ट्रेन के निर्बाध आवागमन में बाधा डाल कर गेट खोलता था तो उसकी ऐसी तैसी करता कराता था। अब रेल के विपरीत खड़ा हूं, तो यह अपना कर्तव्य समझता हूं कि पुराने ‘पाप’ के प्रायश्चित स्वरूप गेट के खुलने तक इंतजार करूं। बिना खीझे या उतावली दिखाये। और मेरे पास समय की कमी तो है ही नहीं!

यह अपना कर्तव्य समझता हूं कि पुराने ‘पाप’ के प्रायश्चित स्वरूप गेट के खुलने तक इंतजार करूं। बिना खीझे या उतावली दिखाये।

लेवल क्रासिंग के दूसरी ओर एक ट्रेक्टर और एक साइकिल वाला खड़े थे। साइकिल वाला पीछे करीयर पर और आगे हैण्डिल में सामान के थैले लादे था। इस लिये वह झुका कर पार कर पाने में असमर्थ था।

ट्रेन गुजर गयी तो वह साइकिल वाला और मैं गेट खुलने पर बीच ट्रैक में मिले। उसको मैंने रोका और पूछा कि क्या ले कर जा रहा है?

इस्माइल फेरीवाला – हम ट्रैक के बीचोंबीच मिले।

“पाव रोटी है साहब।”

उसने मुझे डबल रोटी, बन, पित्जा बेस जैसी चीजें दिखाईं। बताया कि सवेरे सात बजे महराजगंज बाजार में पण्डित की दुकान से सामान ले कर चलता है वह। विक्रमपुर, भगवानपुर, करहर, गडौली तक जाता है। गांवों में लोगों और दुकान वालों को यह सामान बेचता है। इग्यारह बजे वापस पंहुचता है महराजगंज। इंटवा गांव का रहने वाला है। नाम है इस्माइल।

“कितना कमाते हो इस फेरी से और इग्यारह बजे के बाद कोई और काम करते हो?”

इस्माइल की साइकिल पर लदा बेकरी का सामान

“डेढ़ सौ के आसपास मिल जाता है इससे। उसके बाद तिउरी में कारपेट सेण्टर है, वहां जा कर गलीचा बुनाई करता हूं” – इस्माइल ने उत्तर दिया।

“गलीचा बुनने में तो चार-पांच सौ मिल जाते होंगे?”

“नहीं साहब। कारपेट का काम बहुत महीन काम है। जितना बुनता हूं, उसके हिसाब से पैसा मिलता है। डेढ़-दो सौ से ज्यादा नहीं मिल पाता।”

मुझे मैदे के बने इन बेकरी आइटम की जरूरत नहीं थी, फिर भी इस्माइल से लिया। आखिर उससे कुछ तो लेना ही था। थैले में दूध की बोतल है, जिसे लेने सवेरे मैं निकलता हूं।

अर्थव्यवस्था को ले कर नौजवान रोना रो रहे हैं। नौकरी नहीं मिलती। #गांवदेहात में आठ हजार की मासिक आमदनी का मॉडल तो इस्माइल जी आज सवेरे सवेरे दे दिये मुझे। ऑफकोर्स, यह बहुत बढ़िया नहीं है। चार घण्टे फेरी लगाने में और उसके बाद छ घण्टा कारपेट की महीन बुनाई बहुत मेहनत का काम है। पर गांव में आठ हजार की आमदनी, जहां खर्चे अपेक्षाकृत कम हैं; बुरा नहीं है।

मुझे अपनी आठवीं की किताब में किसी अंगरेजी विद्वान का कथन लिखा याद आता है – न पढ़े होते तो सौ तरीके होते खाने-कमाने के!


कुछ बच्चों के पुराने चित्र

कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे।


साढ़े पांच साल हो गये। अचानक पुराने चित्र लैपटॉप की हार्ड डिस्क में नजर आ गये। धीरे चल रहा है तब का लिया लैपटॉप। उसे फेज आउट करने या री-फार्मेट कर एक बार फिर इस्तेमाल करने का उहापोह चल रहा है। उसी संदर्भ में टटोलते ये चित्र दिखे। आठ अगस्त 2015 की तारीख है जो उन चित्रों की ‘प्रॉपर्टीज’ खंगालने पर दिखी।

उस समय मैं अपने रिटायरमेण्ट की तैयारी कर रहा था। सात सप्ताह बाद रेल सेवा से निवृत्ति होनी थी। कटका रेलवे स्टेशन के पास घर बनवा रहा था। वहीं की ट्रिप पर था। रास्ते में कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक दिखा था। देख कर लगता था मानो इथियोपिया या सोमालिया का दृश्य हो। बहुत उदास करने वाला सीन। मुझे याद नहीं आता कि मैंने उसे कुछ दिया था या नहीं।

कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक

रिटायरमेण्ट के बाद में यहां गांवदेहात में रहते घूमते मैंने बहुत गरीबी देखी है और विपन्न बच्चे भी। पर इतना दारुण दृष्य नहीं देखा। यह बच्चा अपना चित्र खिंचवाने में झेंप रहा था। मैंने बहुत देर इंतजार किया कि वह अपना हाथ मुंह से हटाये। पर जब तक वहां रहा, वह मुंह ढ़ंके ही रहा।

उसी दिन गांव में, जहां मेरा घर बन रहा था; बहुत से बच्चे दिखे। खाकी रंग की स्कूल यूनीफार्म में। उस समय आधी छुट्टी हुई थी। उन्हें मिड डे मील मिला था। अपने अपने घर से लाये बर्तनों में भोजन ले कर मेरे साले साहब के परिसर में आ कर भोजन कर रहे थे। भोजन सादा ही था। चावल और दाल/सब्जी। मात्रा देख कर लगता था कि हर बच्चे का पेट तो भर ही जा रहा होगा।

एक चित्र में दो लड़कियां और एक लड़का है। यहींं गांव के बच्चे हैं। अब इस चित्र को खींचे छ साल होने को आये। ये बच्चे अगर पढ़ रहे होंगे तो अब प्राइमरी स्कूल में नहीं, मिडिल स्कूल में होंगे। चित्र नीचे है –

विकास, अंजलि और काजल – बांये से दायें।

इन बच्चों के बारे में पता किया। इनके नाम हैं – विकास, अंजलि और काजल।

विकास दलित बस्ती का बालक है। उसका पिता, देशराज महराजगंज से आसपास के गांवों में सगड़ी (ठेला) से सामान ढोता है। हाईवे के उस पार के स्कूल में एक दिन छोड़ एक दिन स्कूल लगता है। उसमें जाने लगा है। अन्यथा लॉकडाउन के दौरान, अन्य बच्चों की तरह वह भी यूं ही टहल ही रहा था।

अंजलि मेरे घर काम करने वाली कुसुम की बिटिया है। स्कूल में नाम लिखा है। पर स्कूल जाना उसे रुचता नहीं। घर का काम करती है। फसल कटाई में भी जाती है। इस मौसम में पचास किलो धान और पचास किलो गेंहू कमाया है उसने फसल कटाई में। पढ़ने में मन नहीं लगता पर अपना नाम ठीक से लिख लेती है। मेरी पत्नीजी ने उसे पढ़ाने की कोशिश की। डांट भी पड़ी तो रोने लगी और छोड़ छाड़ कर गयी तो उनके पास वापस नहीं आयी। उसने अपनी जिंदगी के स्वप्न और जीने का तौर तरीका तय कर लिया है। भविष्य में शादी होगी, घर बसायेगी और काम करेगी। जिंदगी चलती रहेगी!

तीसरी लड़की है काजल। उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसकी मां बाबूसराय जाती है कार्पेट सेण्टर में काती बनाने के काम के लिये। माँ काम करने जाती है तो काजल घर में रह कर अपने भाई बहनों की देखभाल करती है। घर का सारा काम करती है। उसकी जिंदगी भी तय हो गयी है।

कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। कुछ टेम्पो में बैठ कर किरियात के कछार में आलू, मिर्च, मटर की सब्जी चुनने के काम में भी जाती हैं। उन्हें सौ रुपया रोज और कुछ सब्जी मिलती है। टेम्पो पर लदे गीत गाते जाते आते देखा है मैंने उनको।

लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे। उन सब के सपने सरल से हैं। जिंदगी सही सपाट है। कुल मिला कर उसमें गरीबी है, कष्ट है, पर सरलता और आनंद भी है। बड़े बड़े विद्वान ‘वर्तमान में जीना सीखो’ का फलसफा हमें सिखाने का भरसक प्रयास करते हैं। मोटे मोटे ग्रंथ लिखे हैं उसको ले कर। यहां ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

गरीबी और अभाव वर्तमान में जीना सिखा ही देते हैं!