शैलेश की कार्य योजना – फाटा से मन्दाकिनी पर ग्रेविटी गुड्स रोप-वे राहत सामग्री के लिये


शैलेश गुप्तकाशी से चल कर फाटा में हैं। फाटा से मन्दाकिनी के उस पार करीब 10-15 गांवों की सूची है उनके पास। उन गांवों में लगभग चार-पांच हजार लोग हैं को राहत से कटे हैं। भूस्खलन से वहां जाना दुर्गम है। सड़क मार्ग से राहत गुप्तकाशी से कालीमठ-चौमासी होते हुये करीब 70 किलोमीटर चल कर वहां पंहुचाई जा सकती है।

ग्रेविटी रोप वे
ग्रेविटी रोप वे

फाटा से मन्दाकिनी के उस पार स्थान नीचाई पर है। नदी करीब 70 मीटर चड़ाई में है। अगर ग्रेविटी रोप-वे बनाया जाये (पुली के माध्यम से धरती की गुरुत्व शक्ति का प्रयोग कर रस्सी पर लटका कर राहत लुढ़काई जाये) तो काफी राहत तीव्रता से रेलगांव क्षेत्र में भेजी जा सकती है। जो स्थान/गाव इससे लाभ पायेंगे वे हैं – ग्रामसभा जाल-  रेलगांव 600 लोग, जलतल्ला 700, चौमासी 1100, शायूगढ़ 300, ब्योंखी 1200, कुंजेठी – 500, कालीमठ 300, कबील्था 700, मनेरा 200 और खोम 300 की आबादी वाले आदि।

ग्रेविटी रोप वे में सामान लदता हुआ।
ग्रेविटी रोप वे में सामान लदता हुआ।

अभी शैलेश को सात-आठ हेलीकॉप्टर राहत सामग्री ले कर जाते दीख रहे हैं। पर ये कब तक काम करेंगे और इनकी लागत भी निश्चय ही बहुत होगी। शैलेश का विचार यह रोप-वे चार पांच दिन में कार्यांवित करने का है। इसमें (उनके अनुसार 2-3 लाख का खर्च आयेगा। लोगों ने सहायता देने की बात कही थी। अब वे उनके साथ सम्पर्क करेंगे। अगर सहायता मिली तो ठीक वर्ना अपने रिसोर्स इस यज्ञ में होम करने का विचार पक्का कर चुके हैं वे।

शैलेश के अनुसार; यही काम सरकार भी कर सकती है। पर शायद वहां सभी करने में समय बहुत ज्यादा लगता है। यही काम होने में महीना लग सकता है। आवश्यकता त्वरित काम करने की है।

शैलेश ने मुझे सामान की जरूरत भी बताई – उचित स्पेसीफिकेशन की 150 मीटर रस्सी देहरादून से खरीदनी पड़ेगी। वे लगभग छ पुली लेने की सोच रहे हैं। इसके अतिरिक्त कुछ और रस्सी भी चाहिये होगी। वे यह सामान ग्रामीणों को दे बनाने में उन्हे जोड़ना चाहते हैं। एक फेसीलिटेटर की भूमिका निभाते हुये।

मैने इण्टर्नेट पर ग्रेविटी रोप-वे के बारे में सर्च किया तो बहुत लिंक मिले। शैलेश तो वहां फाटा में हैं; मुझे यहां इलाहाबाद बैठे इस योजना की सरलता सोच कर जोश आ रहा है। ग्रेविटी माल ढुलाई की रोप वे बनाने का एक 6MB का मैनुअल भी मैने डाउनलोड कर लिया है!

Gravity Goods Roapway - Design
Gravity Goods Roapway – Design

जो लोग सहायता देना चाहें, वे शैलेश पाण्डेय को सम्पर्क करें; जो दुआ करना चाहते हैं, वे नीचे टिप्पणी में करें! 😆

और चल पड़ा सामान ग्रेविटी रोप वे पर।
और चल पड़ा सामान ग्रेविटी रोप वे पर।
नदी की धारा के बीचोबीच ग्रेविटी रोप वे पर सामान
नदी की धारा के बीचोबीच ग्रेविटी रोप वे पर सामान
गुप्तकाशी-फाता-रेलगांव गूगल अर्थ पर।
गुप्तकाशी-फाता-रेलगांव गूगल अर्थ पर।
Phata Rail; Guptkashi
Phata Rail; Guptkashi

इस पोस्ट में आगे मिले इनपुट्स के आधार पर एडिटिंग सम्भव है।

"खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गया है)"


चार दिन पहले गंगा उफन रही थीं। बहाव तेज था और बहुत सी जलकुम्भी बह कर आ रही थी। बढ़ती गंगा में आसपास के ताल तलैयों, नहरों नालों की जलकुम्भी बह कर आने लगती है। वैसा ही था। खबरें भी थीं गंगा और उत्तर की अन्य कई नदियों में उफान की।

किनारे एक धतूरे का पौधा बारिश में नवजीवन पा लहलहा रहा था। कई फूल लगे थे। वह जलधारा के इतना करीब था कि मुझे लगा वह व्यर्थ लहलहा रहा है – यह नहीं जानता कि दो दिनों में गंगा उसे जलमग्न कर लेंगी।

पर मैं कितना गलत था। गंगा में उफान रुक गया। जिस दशा में उस दिन देखा था, आज लगभग उसी दशा में; या उससे कुछ कम फैलाव लिये थीँ। वह धतूरा अपनी जगह पर उसी अन्दाज में लहलहा रहा था।

धतूरे का फूल - सांझ के धुंधलके में
धतूरे का फूल – सांझ के धुंधलके में

दूर लगभग एक रेखा की तरह गंगा के बीच एक टापू बचा था। अगर बढ़ी होतीं तो वह जलमग्न हो गया होता। किनारे से लगभग 250-300 मीटर दूर थी वह टापू की रेखा। संझा का समय था। धुन्धलका हो रहा था। उस रेखा पर एक व्यक्ति कन्धे पर एक सफेद बोरी लिये चल रहा था। जहां वह टापू खत्म हुआ तो वह जल में भी उसी अन्दाज में चलता रहा। काफी दूर आगे चलने के बाद वह किनारे आने के लिये नब्बे अंश के कोण पर मुड़ा। अभी उसके कमर तक पानी था। थोड़ी ही देर में उसके सीने और गरदन तक पानी आ गया। वह उसी आत्मविश्वास से और तेज चाल से चल रहा था। चल वह रहा था, पर डर मुझे लग रहा था कि कहीं बैलेंस न बिगड़े और वह डूब जाये।

कन्धे पर सफेद बोरी लिये वह तट के पास आ गया।
कन्धे पर सफेद बोरी लिये वह तट के पास आ गया।

पर वह दक्ष था गंगा की गहराई की जानकारी के बारे में। थोड़ी ही देर में किनारे आ गया। बोरी जमीन पर रखी तो कई अन्य शाम की कछार सैर वाले उसके पास हो आये। एक ने पूछा – कितनी पाये?

मछेरा था वह। बदन से पानी झटकते हुये वह बोला – खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गयी हैं)। फिर बोरी में से एक छोटी बोरी निकाल कर दिखाई। उसके आकार से लग रहा था कि तीन किलो तक तो रही होगी। उत्सुक ग्राहकों में से एक ने पूछा – कौन सी है?

मछली के खरीददारों को पोटली दिखाता मछेरा
मछली के खरीददारों को पोटली दिखाता मछेरा

उसने उत्तर नहीं दिया। बोरी कछार की रेत में रख कर गंगाजी में फिर हिल गया वह – और स्नान करने लगा। ग्राहकों में से एक दो हटे पर कुछ खड़े रहे। मुझे मछली खरीदने में दिलचस्पी नहीं थी, सो अन्धेरा होते देख चल दिया घर जाने के लिये।

बोरी किनारे रख, वह फिर गंगा में हिल गया, नहाने के लिये।
बोरी किनारे रख, वह फिर गंगा में हिल गया, नहाने के लिये।

उस मछेरे को मैं पहचानता हूं। डेढ़ महीना पहले अपनी पत्नी-बच्चों के साथ उसे टापू पर सब्जियां उगाने के लिये जाते देखता रहा हूं। एक बार अपनी छोटी बच्ची को टापू से किनारे छोड़ कर वापस जाते देखा थ मैने। बच्ची रोने लगी थी तो जेब से दो रुपये निकाल कर उसे बिस्कुट खाने के लिये भी दिये थे। सब्जियाँ उगाने का काम गंगाजी के घटने बढ़ने से फेल हो गया था। आज उसे मछली पकड़ कर लाते देखा। कुल मिला कर उसकी जिन्दगी गंगा पर ही आर्धारित है। गंगा पालित है वह। गंगा जी का बेटा।

फिर कभी दिखा तो उससे पूछूंगा कि गंगा नदी को किस भाव से देखता है?

भाव से देखना – मेरी पत्नीजी कहेंगी इस तरह से भाव से देखना-फेंखना टाइप सवाल तुम ही कर सकते हो। लोग भाव-फाव नहीं रखते, गंगा को बस गंगा की तरह लेते हैं वे, बस।

हो सकता है, एसा हो। पर ऐसे लोगों को कभी कभी मैने इतनी आश्चर्यजनक बातें करते भी देखा है मैने कि मुझे यकीन है दार्शनिकता अर्बन एलीट के बाप की जागीर नहीं है। कत्तई नहीं!

शैलेश की रिपोर्ट – रुद्रप्रयाग और श्रीनगर के बीच से


ऋषिकेश में गंगा - 1
ऋषिकेश में गंगा – 1

जून 27’2013: सवेरे शैलेश ने ऋषिकेश का चित्र भेजा। गंगा प्रचण्ड रूप धारण किये हुये। मैने पूछा – कैसा लग रहा है गंगा का यह रूप देख कर? क्या इस मौसम में सामान्य है?

नहीं। हवा में कुछ ऐसा है जो भारी कर दे रहा है। लगता है नीचे कहीं कुछ भयानक है इस दृष्य के पीछे। गंगा एक मां का वात्सल्य नहीं दिखा रहीं। उस स्त्री की तरह हैं जो दूसरे से झगड़ा करने पर उद्धत हो। 

शायद वे भद्रकाली के रौद्र रूप से कुछ कमतर बता रहे थे गंगा को। उतनी उग्र भी नहीं, पर पर्याप्त उग्र।

ऋषिकेश में गंगा - 2
ऋषिकेश में गंगा – 2

संझा में फिर शैलेश से बात हुई। वे और उनके एक साथी हर्ष कहीं बीच में अटके थे रुद्रप्रयाग और श्रीनगर के बीच। स्थानीय लोगों ने जगह का नाम बताया शेयोम्भरगढ़। काफी बड़ा भूस्खलन हो गया था वहां। राहत सामग्री के ट्रक भी अटके थे। लोग भी थे जिन्हे राहत की जरूरत थी। पर राहत सामग्री लोगों को वहीं अटके होने पर दे दी जाये, यह किसी के जेहन में नहीं था। शायद कमी राहत सामग्री की नहीं, मैन पावर की है जो उसे अटके लोगों तक पंहुचा सकें।

भूस्खलन स्थल पर कार्यरत मशीनें।
भूस्खलन स्थल पर कार्यरत मशीनें।

दो लोग मिले जो दक्खिन से आये थे, चालीस लोगों के जत्थे को तलाशते। सभी को पेम्फलेट दे रहे थे। शैलेश को भी दिया कि कहीं मिल जायें वे तो सूचित करें। इस प्रकार के कई लोग हैं अपने स्वजनों को तलाशते।

शैलेश और हर्ष अटके लोगों को भोजन पानी वितरित करने में हाथ बटाने लगे उस स्थान पर जहां भूस्खलन हुआ था। अटके लोग ऐसे भी दिखे तो राहत में दी गयी खाने पीने की सामग्री बरबाद भी कर रहे थे। पूड़ी सब्जी के पैकेट्स की बरबादी भी कर रहे थे वे लोग। खैर!

शैलेश ने बताया कि कल सवेरे वे गुप्तकाशी पंहुच जायेंगे। उसके बाद आगे की बात होगी!

[भूस्खलन स्थल के चित्र अभी डाउनलोड नहीं हो पा रहे। होने पर यहां प्रस्तुत कर दूंगा।  अब हो गये! 🙂 ]

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शैलेश का उत्तराखण्ड के लिये प्रस्थान


अगर इस देश की आत्मा है; तो उसका स्पन्दन महसूस करने वाले लोग शैलेश पाण्डेय जैसे होंगे!

इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय
इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय

कल दोपहर में मैं इलाहाबाद रेलवे स्टेशन गया। शैलेश पाण्डेय ने कहा था कि वे उत्तराखण्ड जा रहे हैं, सो उनसे मिलने की इच्छा थी।

25 जून को शाम संगम एक्प्रेस पकड़ने का कार्यक्रम था उनका। मैने अपने दफ्तर का काम समेटा और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पंहुच गया उनसे मिलने। फोन पर पता किया तो वे बाजार में उत्तराखण्ड के प्रवास के दौरान काम आने वाली रिलीफ सामग्री खरीद रहे थे। मुझे स्टेशन मैनेजर साहब के कमरे में इंतजार करना था लगभग आधा घण्टा। वहां बैठे मैं पाल थरू की पुस्तक “घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार” के पन्ने पलट रहा था, जिसमें ओरहान पामुक को ऐसा व्यक्ति बताया गया था, जो “इस्ताम्बूल” की आत्मा पहचानता है। उसी समय मुझे विचार आया था शैलेश के बारे में, जो मैने ऊपर लिखा है।

शैलेश घुमक्कड़ हैं – लगभग पूरा भारत घूम चुके हैं – अधिकांश अपनी मोटर साइकल पर। एक समाज सेवी संस्था चलाते हैं वाराणसी में। फौज से ऐक्षिक सेवानिवृति लिये हैं और जुनून रखते हैं सोच और काम में। आप उनके ट्विटर प्रोफाइल [ @shaileshkpandey ] से उनके बारे में ज्यादा जान सकते हैं। उनकी यात्राओं और उनके कार्य के बारे में जानकारी उनके ब्लॉग से भी मिल सकेगी।

लगभग आधे घण्टे बाद शैलेश मिले। उनके साथ एक अन्य सहयोगी सरजू थे। दोनो के पास पिठ्ठू थे और दो गत्ते के डिब्बों में रिलीफ सामग्री। शैलेश धाराप्रवाह बोल सकते हैं – बशर्ते आप अच्छे श्रोता हों। वह मैं था। उन्होने बताना प्रारम्भ किया – भईया, ये जो पतलून और टीशर्ट पहन रखी है, महीना भर उसी में काम चलाना है। वही धो कर सुखा कर पहना जायेगा। एक गमछा है बैग में। और ज्यादा की जरूरत नहीं।

दूर दराज में बिजली नहीं होगी, सो एक सोलर चार्जर रखा है जो मोबाइल आदि चार्ज कर दिया करेगा। मुझे इण्टीरियर गांव में जाना है वहां। असल में तीर्थयात्री/पर्यटक की फिक्र करने वाले बहुत होंगे उत्तराखण्ड में। दूर दराज के गावों में जहां बहुत तबाही हुई है, वहां कोई खास सहायता नहीं मिली होगी।  मैं वहां जाऊंगा। यहां से मैं हरिद्वार जा रहा हूं। वहां से ऋषिकेश और आगे रुद्रप्रयाग में एक जगह है फोता। वहां पहुंचकर स्थानीय भाजपा के लोगों से भी सम्पर्क करूंगा। … एक गांव में जा कर बच्चों को इकठ्ठा कर मेक-शिफ्ट स्कूल जैसा बनाने का विचार है। … आपदा के समय सब से उपेक्षित बच्चे ही होते हैं!

एक महीना वहां व्यतीत करने का विचार है। उसकी तैयारी के साथ जा रहा हूं। कुछ लोगों ने सहायता देने और हरिद्वार में जुड़ने की बात कही है; पर मैं उसे बहुत पक्का मान कर नहीं चल रहा हूं। ये सरजू और मैं – हम दोनो की टीम है।

अपने साथ मैं इलेक्ट्रानिक रक्तचाप नापने वाला उपकरण ले जा रहा हूं। और साथ में कुछ दवायें हैं – मसलन डायरिया के उपचार के लिये, अस्थमा के लिये इनहेलर्स, वाटर प्यूरीफायर टेबलेट्स…

मेरे जैसे कुर्सी पर बैठे विचार ठेलने वाले को एक कर्म क्षेत्र के व्यक्ति से मिलना और सुनना बहुत अच्छा लग रहा था। शैलेश मुझसे 18-19 साल छोटे हैं। एक पीढ़ी छोटे। मेरी पीढ़ी ने तो देश लोढ़ दिया है। या तो बेच खाया है या अपने निकम्मे पन से पंगु कर दिया है। आशा है तो शैलेश जैसे लोगों से है।

मैने शैलेश को सहेजा है कि इस दौरान अपनी गतिविधियों से मुझे अवगत कराते रहें; जिसे मैं ब्लॉग पर प्रस्तुत कर सकूं। उन्होने इस विचार को अपनी स्वीकृति दे दी है। सो आगे आने वाले दिनों में इसकी सूचना मैं देता रहूंगा।

मैं शैलेश को स्टेशन पर छोड़ कर चला आया। उनकी ट्रेन लगभग एक घण्टा बाद चली। इस बीच सरजू को पता चला कि उत्तरप्रदेश सरकार से बंटने वाला लैपटॉप उसे 1 जुलाई को मिलेगा, तो उसकी यात्रा स्थगित हो गयी। अब सरजू शैलेश से 2 जुलाई को चल कर जुड़ेगा। शैलेश फिलहाल चल अकेला मोड में  चले इलाहाबाद से।

शैलेश और सरजू
शैलेश और सरजू

लाजपत राय रोड का धोबी घाट


शिवकुटी से सूबेदारगंज की यात्रा मैं रोज़ आते जाते करता हूँ। इलाहाबाद में मेरा घर शिवकुटी में है और ऑफिस सूबेदारगंज में। इस रास्ते में दो धोबी घाट पड़ते हैं।

एक है मम्फोर्डगंज से गुजरते हुये लाजपत रोड पर और दूसरा ब्वॉयज़ हायर सेकेण्डरी स्कूल के बगल में नाले के पास। बहुत दिनों से इनको देखने का मन था। शनिवार 22 जून को एक को देख पाया।

धोबी घाट का एक दृष्य
धोबी घाट का एक दृष्य

जैसा अपेक्षा थी, मेरा वहां स्वागत नहीं हुआ। लाजपत राय रोड वाले धोबी घाट में उस समय करीब 10-12 लोग थे। सबसे पास में एक व्यक्ति अपना टिफन खोल कर भोजन कर रहा था। उसके पास पानी में खड़े एक नीले रंग का जांघिया भर पहने व्यक्ति ने मेरी ओर देखा तो उससे मैने पूछा – क्या यह धोबी घाट है? 

नीला जांघिया पहने व्यक्ति, भगवतीप्रसाद, जिनसे बातचीत हुई।
नीला जांघिया पहने व्यक्ति, भगवतीप्रसाद, जिनसे बातचीत हुई। काले कपड़े पहने किशोर नांद में कपड़ों में अपने पैरों से दबा दबा कर साबुन लगा रहा है।

जी हां। आपको क्या काम है। आपको कपड़े धोने का काम शुरू करना है? 

हो सकता है उस व्यक्ति का यह सामान्य सा उत्तर हो – प्रश्न के माध्यम से उत्तर! पर मुझे लगा कि वह मुझे अवांछित मान रहा है।

मैने सफाई दी – नहीं भाई, मैं रोज इसी सड़क से सुबह शाम गुजरता हूं, सो जानने की इच्छा हो आयी कि यहां कैसे काम होता है। 

उस व्यक्ति ने मुझे दिखाया कि बड़े से कांक्रीट के (या ईंट के प्लास्टर किये) हौज में कपड़े भिगोये गये थे। “ये कपड़े धोने के लिये हैं।” 

पानी के हौज जिनमें कपड़े भिगोये जाते हैं।
पानी के हौज जिनमें कपड़े भिगोये जाते हैं। बाजू में सूखते कपड़े भी दिख रहे हैं।

सरसरी निगाह से देखने पर लगा कि वे सभी कपड़े होटलों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के नहीं थे। शायद घरेलू ज्यादा थे। इसका अर्थ यह कि वाशिंग मशीन के युग में भी लोग अपने घरेलू कपड़े धोबी से धुलाते हैं।

अच्छा, इनमें साबुन कैसे लगाते हैं? 

उस व्यक्ति ने मुझे एक तरफ लाइन से बने छोटे साइज के कांक्रीट/ईंट प्लास्टर के चौखाने (नांद)  दिखाये। उनमें कुछ कपड़े साबुन मिश्रित पानी में पड़े थे और एक खाने में एक व्यक्ति अपने पैरों से उन्हे मींज रहे थे। इस तरह उनमें अच्छे से साबुन लग जा रहा था।

कपड़े पटक कर साफ करने का पटिया।
कपड़े पटक कर साफ करने का पटिया।

उसके बाद कपड़े अन्य बड़े पानी के हौज में ले जा कर लोग हौज की बगल में लगे तिरछे पटिये पर पटक कर साफ करते और फिर पानी में भिगो कर निचोड़ते दिख रहे थे। मोटे तौर पर प्रक्रिया मुझे समझ आ गयी। धोबी घाट में एक ओर कपड़े सूख रहे थे। कुछ कपड़े धोबीघाट की दीवारों पर भी डाले हुये थे सुखाने के लिये।

हौज, पानी की उपलब्धता, कचारने का पटिया, साबुन लगाने के चौखाने इत्यादि; यही उपकरण/सुविधायें थी वहां। अन्यथा सारा काम आदमी अपने श्रम से कर रहे थे। कोई मशीनीकरण नहीं। बिजली का प्रयोग नहीं। कोई वाशर/स्पिनर/ड्रायर नहीं। धोबियों का अपना श्रम। बस।

कपड़े साफ करता व्यक्ति।
कपड़े साफ करता व्यक्ति।

मैने कुछ चित्र लिये। नीले जांघिये वाले ने मेरे गाइड की भूमिका निभाई। उसी ने बताया कि वहां करीब चालीस लोग अपनी एसोसियेशन बना कर अपना काम धन्धा करते हैं। नगरपालिका सुविधायें (मुझे तो उसमें पानी की सुविधा भर लगी) देती है। उसने बड़ी सफाई से अपने को किसी फोटो में सामने आने से बचाये रखा।

धोबीघाट की इमारत पर लिखा है कि यह किसी राज्यसभा सांसद श्री चुन्नीलाल जी की सांसद निधि से सन 2000-2001 मे6 बनाया गया है। घाट अच्छी दशा में प्रतीत होता है, बनने के बारह साल बाद भी। शाम को इसके दरवाजे पर किसी को ताला लगाते भी देखता हूं मैं। रखरखाव ठीकठाक है। [इण्टरनेट पर राज्यसभा की साइट सर्च करने पर पता लगा कि श्री चुन्नीलाल 1996-2002 के लिये भाजपा के उत्तरप्रदेश से राज्यसभा सदस्य थे। तीन दिसम्बर 2000 को इनका देहावसान हुआ था।]

अपना भोजन भी यहीं करते हैं वे काम के दौरान।
अपना भोजन भी यहीं करते हैं वे काम के दौरान।

करीब पांच मिनट रहा मैं वहां पर। उन लोगों को चलते समय मैने धन्यवाद दिया। घाट के दरवाजे तक छोड़ने के लिये एक दो लोग मुझे आये भी। वो जांघिया पहने व्यक्ति भी आये थे। मैने उनका नाम पूछा। मुझे आशंका थी कि उसने फोटो नहीं खिंचाई तो शायद नाम भी न बताये। पर लगता है पांच मिनट ने कुछ आत्मीयता बना दी थी। उसने जवाब दिया – भगवती प्रसाद।

मैं भगवती प्रसाद को नमस्कार कर अपने वाहन में बैठ कर चल दिया। धोबी घाट की जिज्ञासा काफी हद तक शांत हो चली थी। मेरे मोबाइल में वहां के कुछ चित्र आ गये थे। ब्लॉग पोस्ट लिखना शेष था; अब वह भी कर दिया।

श्री चुन्नीलाल, सांसद राज्यसभा की सांसद निधि से 2000-01 में बना था यह धोबीघाट।
श्री चुन्नीलाल, सांसद राज्यसभा की सांसद निधि से 2000-01 में बना था यह धोबीघाट।

किसी दिन दूसरा वाला धोबीघाट भी देखूंगा। वह वाला चलते वाहन से देखने में कुछ बड़ा प्रतीत होता है।