गोरखपुर में बंगाली – श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी से मुलाकात


श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी
श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी

अचिन्त्य लाहिड़ी ने मुझे बताया था बंगाली लोगों के विगत शताब्दियों में गोरखपुर आने के बारे में। उन्होने यह भी कहा था कि इस विषय में बेहतर जानकारी उनके पिताजी श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी दे सकते हैं। श्री लाहिड़ी से मुलाकात मेरे आलस्य के कारण टलती रही। पर अन्तत: मैने तय किया कि सन् 2014 में यह सम्पन्न कर ही ली जाये। सो मैं उनसे मिलने गया 29 दिसम्बर की शाम उनके आवास पर।

श्री लाहिड़ी को ज्यादा प्रश्नों से कुरेदना नहीं पड़ा मुझे। डेढ़ घण्टे के समय में मुझे बहुत त्वरित गति से – गति, जो बातचीत करने का अन्दाज भी अनुसरण कर रही थी और कम से कम समय में अधिकाधिक जानकारी देने का प्रयास भी कर रही थी – उन्होने  मुझे (1) गोरखपुर में बंगालियों के योगदान, (2) इस सरयूपार के क्षेत्र का पुरातत्व महत्व और (3) उनके अनेक प्रकार के सामाजिक कार्यों के बारे में अवगत कराया।

एक ब्लॉगर एक कुशल पत्रकार नहीं होता। अपनी छोटी पोस्टों के लिये वह श्रवण के आधार पर नोट्स लेने पर कम देखने पर अधिक निर्भर रहता है। यहां उसके उलट रहा। अपनी पतली कॉपी में नोट्स लेने की मेरी प्रवृत्ति बहुत अटपटी/खुरदरी है। लिहाजा जो नोट कर पाया, कर पाया। बहुत कुछ छूट गया। बहुत कुछ इतना उथला नोट किया कि उसके आधार पर आधा-अधूरा लिखना विषय के साथ अन्याय होगा। अत: अगली बार श्री लाहिड़ी जैसे अध्ययन-जानकारी और व्यक्तित्व में ठोस विभूतियों से मिलने में पर्याप्त सावधानी और तैयारी रखूंगा। अन्यथा ब्लॉगरी में भी रैगपिकर कहलाऊंगा! 🙂

श्री लाहिरी का दफ्तर (या अध्ययन कक्ष) मंझोले आकार का और सुरुचिपूर्ण था। मेज, कुर्सी, फाइलें, कागज, दीवार पर पुरात्त्व विषयक सामग्री के चित्र और अलमारियों में सरयूपार क्षेत्र के इकठ्ठे किये हुये कुछ टेरा-कोटा के नमूने थे। शाम के साढ़े छ बजे थे। कमरे में उनके चित्र लेने के लिये मेरे पास मोबाइल भर था, जो ट्यूबलाइट की रोशनी में बहुत अच्छे परिणाम नहीं देता। मुझे उनसे मिलने के बाद अहसास हुआ कि समय का ध्यान कर कैमरा भी उपयुक्त होना चाहिये।

खैर, मुलाकात पर आयें।

मुलाकात मुख्यत: ऊपर लिखे  तीन विषयों पर थी। इस पहली पोस्ट में मैं गोरखपुर में बंगाली लोगों के आने और उनके बसने के बारे में उनसे मिली जानकारी रखूंगा।

श्री लाहिड़ी ने बताया कि बंगाली लोग सबसे पहले 1802 में गोरखपुर आये। वे लोग मुस्लिम थे। चन्दसी दवाखाना वाली वैदकी करते थे। चान्दसी दवाखाने के बारे में इण्टरनेट पर मैने जो टटोला, उसमें निकला – शीघ्रपतन, फिश्तुला (भगन्दर), बवासीर, क्षार-सूत्र चिकित्सा आदि। सम्भवत: ये मुस्लिम वैद्य उन रोगों के इलाज में दक्ष थे, जिनके बारे में सामान्यत: व्यक्ति खुल कर नहीं बात करता। वैसे आज भी अनेक शहरों में अनेक चान्दसी दवाखाने हैं और गोरखपुर में भी है; अत: उनकी वैद्यकी विधा पर बिना जाने अधिक नहीं कहूंगा मैं। … पर भारत के विभिन्न भागों से लोगों का एक स्थान से दूसरे में गमन और वहां बसना बहुत रोचक विषय है जानने के लिये। संचार और यातायात (मुख्यत: रेल) के अच्छा न होने के समय भी यह गमन होता रहा है। कुछ समय पहले मैने महाराष्ट्र के पंत ब्राह्मणों के उत्तराखण्ड में बसने पर लिखा था। ऐसे अनेक गमन-विस्थापन जिज्ञासा जगाते हैं।


श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी

श्री लाहिड़ी की लिखी सरयूपार के पुरातत्व पर एक पुस्तक।
श्री लाहिड़ी की लिखी सरयूपार के पुरातत्व पर एक पुस्तक।

श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी जीव विज्ञान की सनद रखते हैं। पहले ये दवा व्यवसायी थे। सन 1976 में इन्होने होटल व्यवसाय में पदार्पण किया।

इनकी रुचि पुरातत्व अध्ययन में है। सन 1997 से ये सरयूपार के क्षेत्र में विस्तृत भ्रमण कर पुरातत्व सामग्री पर शोध करते रहे है।

श्री लाहिड़ी ने कचरा प्रबन्धन, जेल के कैदियों और चिन्दियाँ बीनने वाले बच्चों की शिक्षा आदि के विविध कार्यों में लगन और प्रतिबद्धता से अद्वितीय कार्य किये हैं।


श्री लाहिड़ी ने बताया कि 1886 में डा. जोगेश्वर रॉय गोरखपुर आये। अन्य भी अनेक बंगाली परिवार आये। डा. रॉय मिलिटरी में डाक्टर थे। उसके बाद 1880 के दशक में ही अनेक बंगाली आये जो रेलवे लाइन बिछाने में काम कर रहे थे। उस समय की (सम्भवत:) बी.एन.डब्ल्यू.आर. (बंगाल एण्ड नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे); जो अवध-तिरहुत रेलवे की पूर्ववर्ती थी; के इंजीनियर और बाबू लोग। पहले जो डाक्टर लोग आये, उनका, उनके पेशे के अनुसार,स्थानीय जनता से पर्याप्त मेलजोल रहा और उनके लिये स्वास्थ्य, सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में उनका योगदान भी रहा। रेलवे के इंजीनियर और बाबू लोग अपेक्षतया (शुरू में) अलग थलग रहे, पर रेलवे के माध्यम से उनका योगदान कमतर नहीं कहा जा सकता। सन 1947 के बाद तो बहुत बंगाली परिवार रेलवे की नौकरी के कारण गोरखपुर आ कर बसे।

डा. जोगेश्वर रॉय ने सन 1896 में सिविल सोसाइटी के माध्यम से दुर्गापूजा गोरखपुर में प्ररम्भ की। यह प्रतिवर्ष होती रही, पर 1903 में प्लेग की महामारी के कारण इसमें व्यवधान आ गया। सन 1907 में विनोद बिहारी रॉय, रमानाथ लाहिड़ी और अघोर नाथ चटर्जी के सामुहिक प्रयासों से यह क्रम पुन: प्रारम्भ हुआ। यह सुहृद समिति और आर्य नाट्य मंच के विलय से बंगाली एसोशियेशन की स्थापना के साथ हुआ। [ उल्लेखनीय है कि सांस्कृतिक समारोह के रूप में शारदीय दुर्गापूजा का प्रारम्भ बंगाल में सन 1868 में  श्री व्योमेश चन्द्र बैनर्जी ने किया था – ‘श्री श्री दुर्गापूजा एवम शारदीय महोत्सव’ के रूप में। इसका ढ़ाई दशकों में बंगाल से गोरखपुर जैसे स्थान पर फैल जाना बंगाली सांस्कृतिक उत्कर्ष का प्रमाण है। ]

श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी के दादा जी ( श्री रमानाथ लाहिड़ी) दुर्गापूजा के सांस्कृतिक समारोहों के प्रमुखों में से रहे। वे बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे गोरखपुर के सांस्कृतिक परिदृष्य में।

कालांतर में सन 1947 से रेलवे की दुर्गा पूजा भी प्रारम्भ हुई गोरखपुर में। उसके बाद दुर्गापूजा और रामलीला का समागम राघो-शक्ति मिलन के रूप में होने लगा। उस कार्यक्रम में रामलीला के राघव (राम) माँ दुर्गा की शक्ति (जिसके बल पर उन्होने रावण वध किया) माँ को विजय के बाद लौटाते हैं।

बातचीत में श्री लाहिड़ी।
बातचीत में श्री लाहिड़ी।

लाहिड़ी जी ने दुर्गापूजा के माध्यम से गोरखपुर में बंगाली प्रभाव को विस्तार से बताया मुझे। मैने सांस्कृतिक क्षेत्र से इतर भी बंगाली प्रभाव की बात पूछी तो उन्होने बताया कि शिक्षा के क्षेत्र में भी बंगाली लोगों का बहुत योगदान रहा गोरखपुर में। गोरखपुर हाई स्कूल, महाराणाप्रताप कॉलेज आदि के बहुत से अध्यापक और प्राचार्य बंगाली रहे। एक समय तो रेलवे और सिविल प्रशासन के अनेकानेक अधिकारी – महाप्रबन्धक, कमिश्नर और मुख्य चिकित्साधिकारी आदि बंगाली थे। श्री लाहिड़ी को विभिन्न कालों के, विभिन्न पदों पर स्थापित अनेक सज्जनों के नाम याद थे। उन्होने बताये और मैने लिखे भी अपनी स्कैप-बुक में। पर उनका ब्लॉग पोस्ट में जिक्र इस लिये नहीं कर रहा हूं कि नोट करने में शायद त्रुटियां हुई हों।

विगत के बंगाली समाज के कार्य और रुचियों में उत्कृष्टता की बात करते हुये वे आजकल आये गिराव की भी बात करने लगे श्री लाहिड़ी। संगीत की जानकारी और रुचि दोनो का ह्रास होता जा रहा है। अपने समारोहों में कानफोड़ू डीजे बजाने का प्रचलन धीरे धीरे करते जा रहे हैं लोग। वाद्य यंत्रों की बजाय सीडी और पेन ड्राइव का प्रयोग करने लगे हैं संगीत के लिये। ….

प्रतुल लाहिड़ी जी से मैं मूलत: बंगाली लोगों के गोरखपुर में बसने के विषय में जिज्ञासा ले कर गया था। पर जैसा लगा कि उनका रुंझान (या जुनून या पैशन) उनके पुरातात्विक और सामाजिक क्षेत्र के कार्यों में है। उनके बारे में जिस बारीकी और विस्तार से उन्होने बताया, उससे इस 72 वर्षीय भद्र पुरुष का न केवल मैं प्रशंसक बन गया वरन एक सार्थक जीवन जीने के लिये मुझे रोल मॉडल भी नजर आया। उस बातचीत का विवरण अगली ब्लॉग पोस्ट/पोस्टों में करूंगा।

रेल का रूपांतरण


रेलवे के किसी दफ्तर में चले जाओ – मुंह चुचके हुये हैं। री-ऑर्गेनाइजेशन की हवा है। जाने क्या होगा?! कोई धुर प्राइवेटाइजेशन की बात कहता है, कोई रेलवे बोर्ड के विषदंत तोड़े जाने की बात कहता है, कोई आई.ए.एस. लॉबी के हावी हो जाने की बात कहता है। कोई कहता है कि फलाना विभाग ढिमाके विभाग को धकिया कर वर्चस्व बना लेगा। मेकेनिकल वाले इलेक्ट्रिकल वालों को माड्डालेंगे। या ट्रेफिक वाले तो टग-ऑफ-वार हारते नजर आ रहे हैं, इत्यादि!

Bibek Debroyमैं यदा कदा बिबेक देबरॉय की ट्वीट्स देख लिया करता था कि शायद उसमें कुछ बात हो। फिर देखना बन्द कर दिया। बिबेक देबरॉय की कमेटी री-ऑर्गेनाइजेशन के मामले में अनुशंसा देने वाली है। सात सदस्यीय कमेटी एक साल लेगी। कुछ खबर आती है कि कुछ महीनों में ही अनुशंसा दे देगी। इस बीच दो और समितियां प्रकाश में आयी हैं – ई श्रीधरन कमेटी जो टेण्डरिंग, महाप्रबन्धकों और मण्डल रेल प्रबन्धकों की कार्यप्रणाली पर अपनी अनुशंसा देगी तथा डीके मित्तल कमेटी जो रेलवे रेलवे फिनांस में सुधार के बिन्दु बतायेगी। कुल मिला कर बहुत कुछ सुझाया जायेगा परिवर्तन लाने के लिये।

आप रेल अधिकारियों से बात करें तो हर किसी के पास कोई न कोई लुकमानी नुस्खा है रेलवे में परिवर्तन का। कोई बहुत व्यापक ढांचागत परिवर्तन की नहीं कहता। पर काम के तरीकों में बदलाव की बात सभी कहते हैं। आजकल कई जोनल रेलवे पर महाप्रबन्धकों की पोस्टें खाली पड़ी हैं और एक महाप्रबन्धक दो या दो से अधिक जोनों का काम देख रहे हैं। अधिकारी यह भी देख चुके हैं कि बेहतर संचार और वीडियो कॉंफ्रेंसिंग आदि की सुविधा से कम महाप्रबन्धकों से भी काम चल सकता है। शायद बेहतर कनेक्टिविटी से जोनल ऑर्गेनाइजेशन संकुचित कर प्रबन्धन को और चुस्त किया जा सके। पर हर कोई निर्णय त्वरित लेने और उनके कार्यांवयन की बात किसी न किसी प्रकार से करता पाया जाता है। यह भी बात उठती है कि महत्वपूर्ण इंफ्रॉस्ट्रक्चरल जरूरतें विगत में मुहैया नहीं हुई हैं और फालतू फण्ड के क्षेत्रों में पैसा लगा है।

जब मोदी जी की सरकार बनी थी – या यह तय लगता था कि 272 के आसपास आ ही जायेंगे सांसद और सरकार उनकी ही होगी तो सोशल मीडिया पर एक दो लोगों ने – जो प्रचार-प्रसार में सक्रिय थे, ने मुझसे कहा था कि रेलवे में कार्यपद्यति परिवर्तन के बारे में मेरे क्या विचार हैं। मैने कहा था कि मैं विभागीय अनुशासन से बंधा हूं। अत: कुछ कहना उचित नहीं है। अब भी लगभग वही कहता हूं। पर अब यह जरूर लग रहा है कि परिवर्तन की बात इतनी लम्बी खिंच रही है कि अनिश्चितता रेल कर्मियों को हतोत्साहित कर रही है। बेहतर यह होता कि रेलवे के काम में ईमानदारी से मेहनत करते लोगों के ऑउट-ऑफ-बॉक्स आईडिया सुने जाते और उनके आधार पर काम प्रारम्भ कर दिया जाता। ढ़ांचागत परिवर्तन होते तो समय के साथ जब होते तो होते रहते।

लोग टैचरिज्म की बात करते हैं कि मारग्रेट टैचर ने आते ही धाड़-धाड़ परिवर्तन कर दिये थे। भारत में मोदी जी ने परिवर्तन का वह मॉडल नहीं चुना है – ऐसा लगता है। पर मोदी जी के मॉडल पर कयास बहुत लगते हैं। उनके इंफॉर्मेशन सिस्टम को ले कर लोग कयास लगाते हैं। यह सोच लोगों में चर्चा में है कि उनके पास सामान्य पॉलिटीशियंस के अलावा भी चैनल है जो व्यापक क्षेत्रों में सूचनायें उनतक पंहुचाता है। अगर ऐसा है तो यह रेल दफ्तरों में चल रही हलचल भी उनके संज्ञान में होगी ही। परिवर्तन की प्रतीक्षा की बजाय परिवर्तन का चक्र धीरे धीरे ही सही, चलने लगे तो अच्छा लगेगा। परिवर्तन चालू हो जाये – भले निरंतरता के साथ परिवर्तन हो। परिवर्तन की प्रतीक्षा का नैराश्य  न गहराये तो अच्छा हो।


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आज सुधीर कुमार की Bankruptcy to Billions: How the Indian Railways Transformed ऑर्डर की है अमेजन.इन पर। यद्यपि उस समय के रेल के कार्य का मैं साक्षी/एक स्तर पर भागीदार रहा हूं और लालू प्रसाद जी का कोई प्रशंसक नहीं रहा। पर एक बार इत्मीनान से पुस्तक पढ़ने का मन हो आया है।


कोहरा और भय


घने कोहरे में घर का पीछे का हिस्सा।
घने कोहरे में एक घर का सामने का हिस्सा।

सौन्दर्य और भय एक साथ हों तो दीर्घ काल तक याद रहते हैँ। सामने एक चीता आ जाये – आपकी आंखों में देखता, या एक चमकदार काली त्वचा वाला फन उठाये नाग; तो सौन्दर्य तथा मृत्यु को स्मरण कराने वाला भय; एक साथ आते हैं। वह क्षण आप जीवन पर्यन्त नहीं भूल सकते।

घने कोहरे के तिलस्म में दस प्रन्द्रह मिनट फंसना भी वैसी ही अनुभूति ला देता है। एक बार हम गंगा किनारे घने कोहरे में फंस गये थे। कोहरा अचानक आया और हमें जकड़ गया। आठ दस कदम के आगे दिखता नहीं था। एक दो बार गलत ओर बढ़ने के बाद दिशा भ्रम हो गया। कुछ दूर बाद गंगाजी का जल दिखा तो एक लैण्ड (या वाटर) मार्क मिला। यह लगा कि धारा के लम्बवत उससे दूर चलते रहे तो घाट पर पंहुच जायेंगे। अन्यथा कछार की रेत और कोहरा तो दबोचे ले रहे थे। उस दशा में भी सौन्दर्य था और भयानक भय भी। गजब का सौन्दर्य और भय। भटक कर जब वापस घाट की सीढ़ियों पर लौटे थे तो पण्डाजी ने बताया कि वे भी कोहरे में एक बार फंस चुके हैं। सवेरे साढ़े चार बजे गंगाजल लेने गये थे और कोहरे में भटकते रहे। सात बजे जब कछार से उबरे तो शिवकुटी से करीब एक-डेढ़ किलो मीटर दूर पाया था अपने को।

लगभग वैसी ही अनुभूति फिर हमें हुयी कल। एक दिसम्बर से पड़ रहा कोहरा कल दोपहर में कुछ हल्का हुआ था। धूप चटक निकली थी कुछ घण्टे। रात भोजन कर मैने सोचा कि ऑफ्टर डिनर टहल लिया जाये 20-25 मिनट। मन में विचार था कि आज कोहरा छंटा होगा। पर दरवाजे के बाहर पैर रखते ही भूल का गहरा आभास हो गया। दिन की खुली धूप, खुला आसमान (बादलों से रहित) और हवा का अभाव – डेडली कॉबिनेशन हैं संझा/रात में कोहरा घना आने के। वही हुआ था। बस गनीमत यह थी कि हम घर के पास रेलवे गोल्फ-कालोनी के गोल्फार (कछार की तर्ज पर स्थान का नामकरण) में थे। जहां रेत के विस्तार जैसी भूलभुलैया नहीं थी। पर भय उत्पादन करने के लिये शाल के बड़े विशालकाय वृक्ष थे। एक दो नहीं, अनगिनित और घने। कोहरे और स्ट्रीट-लाइट में वे बड़े बड़े दैत्य सरीखे लग रहे थे। हर घर बन्द था और हर दरवाजा निस्पृह सा अनामन्त्रित करता। कुछ दूर चलने के बाद लगा कि पैर यन्त्रवत उठ रहे हैं। कब दांया उठा और कब बांया, यह अहसास ही नहीं हो रहा। एक मन कहता था कि वापस हो लिया जाये। पर कोहरे का सौन्दर्य आगे चलने को उकसा रहा था।

मुझे सुनसान जगह का भय भी लगा। पत्नीजी साथ थीं और हमारी रक्षा के लिये बेटन भी न था, जो सामान्यत: मैं घूमते समय साथ ले कर निकलता था। यद्यपि हम रेलवे कालोनी में थे, पर गोरखपुर को निरापद नहीं कहा जाता। कोई खल इस घने कोहरे का लाभ ले कर अगर हम पर झपटता है तो आत्मरक्षा के लिए अपने हाथ पैर के अलावा कुछ नहीं है…. हम लोग हमेशा कनेक्टेड रहने के आदी हो चुके हैं और अचानक वह खत्म हो जाये – जैसा इस कोहरे में हुआ – तो ऐसा भय आता ही है।

दृष्यता लगभग 12-15 कदम भर थी। करीब 200 कदम चलने के बाद स्थान का भ्रम होने लगा। आगे वाला घर बेचू राय का है या कंचन का? यह नहीं चींन्हा जा रहा था। सड़क और कोहरे में मद्धिम पड़ी स्ट्रीट लाइट के सहारे ही चलना हो रहा था। हम लोग लगभग 1000-1500 कदम चल कर वापस हो लिये।

कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।
कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।

वापसी में एक व्यक्ति साइकल पर सामने से गुजरा। मैने कहा कि वह औरत थी। पत्नीजी ने कहा कि आदमी था। कोहरे में पहचानना कठिन था आदमी औरत को। उसके कुछ ही देर बाद एक औरत पैदल गुजरी। माहौल और मन – दोनो से प्रेरित मैने उस औरत के पैर की ओर भी देख लिया। … बचपन से बताया गया है कि बियाबान में घूमती हैं डाकिनी और चुडैल। और उनके पांव उल्टे होते हैं। …

एक जगह रुक कर मैने चित्र लेने चाहे तो पत्नीजी ने डपटा – इस समय फोटो लेने की सूझ रही है? चुपचाप घर चलो। वहीं ले लेना कोहरे की फोटो, जितनी लेनी हो!  

फिर भी दो तीन चित्र तो लिये ही। यह जरूर हुआ कि अगर रुक कर इत्मीनान से लेता तो मेरा मोबाइल का कैमरा भी कुछ वाकई अच्छे चित्र दर्ज कर लेता कोहरे के।

मेरे घर के पास अपनी बाइक खड़ी कर दो रेलवे टेलीफोन विभाग के कर्मी एक सीढ़ी लगा टेलीफोन के तार ठीक करते दिखे। अच्छा लगा कि घने कोहरे में भी लोग मुस्तैद हैं। रेल कर्मी काम कर रहे हैं।

मेरे अपने घर में भी मेन गेट पर ताला लगा कर आउट-हाउस वाले अपने अपने कमरों में बन्द हो चुके थे। हम पीछे के संकरे गेट से उछल कर अन्दर आये। कोहरे की नमी युक्त हवा को फेफड़ों मे पूरी तरह भर कर मैने घर के भीतर प्रवेश किया।

अथ कोहरा एडवेंचर कथा!

घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।
घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र


उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस
उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस

शुक्रवार को आदेश हुआ कि मंडुआडीह (वाराणसी) से नयी चलने वाली 15117/15118 मंडुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वोत्तर रेलवे के चार विभागाध्यक्षों को उपस्थित रहना है। चार थे – निर्माण संगठन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी श्री ओंकार सिंह, प्रमुख-मुख्य अभियन्ता श्री एच के अग्रवाल, मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री अशोक लाठे और मैं। कोहरे और सर्दी का मौसम – उसमें बनारस तक चक्कर लगाना मुझे तो नहीं रुचा; और अधिकारियों को भी शायद ही रुचा हो। कोहरे के मौसम में नयी गाड़ी इण्ट्रोड्यूज़ करना मानो मलमास में शादी करना है। पर सरकार ये सब नहीं मानती। दूसरे कोहरा तो सिर्फ तराई पूर्वोत्तर में ही फैला है। विन्ध्याचल के उसपार तो मौसम साफ़ है। सतना के आगे तो यह गाड़ी कोहरे को चीर कर आगे बढ़ जायेगी।

रेल की नौकरी में वर्षा और कोहरे का समय मेरे लिये भयंकर दुस्वप्न रहा है। नजरिया बदलेगा – जब रेल यातायात की जिम्मेदारियों का सलीब कांधे से हट जायेगा। हटने में ज्यादा समय नहीं है!

खैर, हम, श्री लाठे, मैं और हमारे साथ दो अन्य अधिकारी चौरीचौरा एक्स्प्रेस से रवाना हुये गोरखपुर से। रात साढ़े दस बजे चलती है ट्रेन गोरखपुर से। उस दिन उसकी जोड़ी की ट्रेन लेट आई थी, तो कुछ लेट ही रवाना हुई। रास्ते में कोहरे में लेट होती गयी। लगभग तीन घण्टे लेट पंहुची शनिवार की सुबह वाराणसी। समारोह साढ़े इग्यारह बजे नियत था, इसलिये कोई हबड़ धबड़ नहीं थी। मेरे साथ चल रहे श्री लाठे कैरिज में सूर्यनमस्कार और अनेक प्रकार के बाबारामदेवियाटिक प्राणायाम कर रहे थे – इत्मीनान से। बाद में उन्होने इन आसन-प्राणायाम के लाभ भी बताये मुझे।

ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।
ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।

इत्मीनान से हम लोग तैयार हुये और लगभग 11 बजे पंहुच गये मंडुआडीह स्टेशन। स्टेशन के इलाहाबाद छोर पर मंच बना था। ट्रेन फूलों के बन्दनवार से सजी प्लेटफार्म पर लगी हुई थी। चार्ट डिब्बों पर पेस्ट थे और सरसरी निगाह डालने पर लगता था कि आधे से ज्यादा सीटें भरी हुई थीं अडवान्स रिजर्वेशन से। कुछ लोग इसे साप्ताहिक की बजाय रोजाना की गाड़ी बनाने की बात कहते दिखे प्लेटफार्म पर। पूर्वांचल बहुत बड़ा डिमाण्डक है सवारी रेल गाड़ियों का। यद्यपि कुछ समय से टिकट बिक्री में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं हो रही; पर उससे न तो जनता की नयी गाड़ियों की मांग करने में कमी आ रही है न नेताओं द्वारा उस प्रवृत्ति को हवा देने में। यात्रियों की संख्या के आधार पर कई गाड़ियां खत्म कर देनी चाहियें और कई रूट जहां वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में बेहतर सड़क मार्ग के विकल्प है‍, सेवाओं को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिये। जीरो-बेस टाइम-टेबलिंग। पर उसके लिये चाहिये दृढ़ संकल्प। आने वाले समय में वह हो – शायद न भी हो।


पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।

समारोह स्थल पर सबसे पहले आये मुख्य अतिथि – पद्मभूषण पण्डित छन्नू लाल मिश्र। पण्डित जी वाराणसी सीट से नामांकन भरते समय श्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्तावकों में से एक थे। निश्चय ही उनकी उपस्थिति से श्री मोदी के नामान्कन को गरिमा मिली होगी। आज नयी ट्रेन को भी वही गर्व मिलने जा रहा था। सबसे पहले आये तो उन्हे मंच पर बिठा दिया गया – आदर के साथ। लेकिन मंच पर वे अकेले थे और एक ऐसी विभूति को अकेले बैठे देख अजीब सा लगा। कोई छोटा नेता या अफसर भी यूं अकेले बैठा नहीं दीखता सार्वजनिक स्थल पर। कुछ ही देर बाद वाराणसी के महापौर रामगोपाल मौर्य भी आये और मंच पर एक से दो हुये। उसके बाद हम विभागाध्यक्षों को भी मंच पर बैठने का आदेश पूर्ण आग्रह हुआ। मैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी के पीछे बैठा।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।

मंत्री महोदय की इंडिगो की फ्लाइट दिल्ली से देर से रवाना हुयी और उनके समारोह स्थल पर आने में देरी हुई। और समारोह नियत समय से एक घण्टा बाद प्रारम्भ हो पाया।

मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।
मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।

समारोह बहुत सधी चाल से चला। पण्डित छन्नू लाल मिश्र ने अपने सम्बोधन में रेल विषयक कविता का पाठ किया – कविता जैसी भी थी, पण्डित जी की आवाज तो मन को अन्दर से झंकृत कर देने वाली थी। लगभग उसी समय मेरे मित्र श्री गिरीश सिंह ने ह्वाट्सएप्प पर सन्देश दिया – भईया, हो सके तो पण्डित मिश्र से मिलकर उन्हे हमारा प्रणाम बोलियेगा। गिरीश से पूछना रह गया कि क्या वे उनसे व्यक्तिगत परिचय रखते हैं, पर मैने यह सोच लिया कि समारोह के बाद पण्डित जी से मिलूंगा जरूर।

ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।
ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।

ट्रेन को पण्डित मिश्र जी ने झण्डी दिखाई। अन्य उपस्थित होगों ने भी दिखाई। इस काम के लिये कई हरी झण्डियाँ उपलब्ध थीं। ट्रेन रवाना होते समय इंजन की हॉर्न की आवाज थी और मंच से एक गेरुआ वस्त्र धारी सज्जन शंखनाद कर रहे थे – क्या बुलन्द आवाज थी शंख की और कितनी देर अनवरत वे बजाते रहे सज्जन। बहुत मजबूत फेफड़े के आदमी होंगे वे। समारोह के बाद वे दिखे नहीं, अन्यथा उनसे उनके बारे में जानने का यत्न करता। वैसे, शंख बजवैय्या काशी में न होंगे तो कहां होंगे!

भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।
भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।

समारोह के समय गेट पर रोके गये कुछ डीजल कारखाना के कर्मचारी रेलवे के प्राइवेटाइजेशन की आशंका के कारण विरोध में नारे लगा रहे थे। मंत्री महोदय ने अपने भाषण में यह स्पष्ट किया कि रेल के निजीकरण की कोई योजना नहीं है। पर रेलवे को बहुत व्यापक निवेश की आवश्यकता है। यातायात की जरूरतें सात गुना बढ़ी हैं और रेल नेटवर्क दो गुना ही हुआ है। इस लिये, जो विरोध कर रहे हैं, उन्हे कड़ाई से निपटा जायेगा। मंत्री जी ने समारोह के बाद पत्रकारों-प्रतिनिधियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।


समारोह के बाद मंच से उतर कर मैने पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी को चरण छू कर प्रणाम किया और यह कहा भी कि मेरे मित्रवर ने मुझे इसके लिये आदेश दिया है। पण्डित जी मुझसे प्रसन्न लगे। उन्होने आशीर्वाद के लिये अपने जेब से इत्र की एक शीशी निकाल कर मेरे दांये हाथ पर इत्र मला। यह भी कहा कि काफी समय तक – दिन भर से ज्यादा उसकी सुगन्ध रहेगी। उन्होने महामृत्युंजय मंत्र का भी उच्चार किया मुझे आशीर्वाद देते हुये। मुझे इत्र लगाते देख कई और लोगों ने अपने हाथ बढ़ा दिये इत्र लगवाने को। बहुत ही सरल हृदय थे पण्डित जी। उन्होने किसी को भी निराश नहीं किया।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।

मेरे सहकर्मी श्री प्रवीण पाण्डेय ने पण्डित मिश्र के साथ मेरा चित्र भी लिया उस अवसर का। अपने आई-फोन से तुरंत ई-मेल भी कर दिया मुझे।

एक विभूति को प्रणाम करने और आशीर्वाद पाने के वे क्षण मेरे लिये सदैव स्मृति में रहेंगे। पता नहीं, आगे कभी पण्डित जी से मुलाकात होगी या नहीं – मैं न तो गायन विधा में दखल रखता हूं और न मुझे गीत-संगीत की समझ है। पर सरल, महान लोगों की महानता मुझे झंकृत करती है। उसी का परिणाम था कि मैं पण्डित जी से मिल पाया। वही भावना भविष्य में उनसे या उन जैसे लोगों से मिलवायेगी।


मुझे याद आता है आज से लगभग दो दशक पहले का समय। मैं रतलाम में अधिकारी था और उज्जैन से इलाहाबाद की यात्रा कर रहा था अपने घर आने के लिये। फर्स्ट क्लास के 4-बर्थर खण्ड में मैं और मेरा परिवार था और पास के कूपे में कवि श्री शिवम्ंगल सिंह ‘सुमन’ चल रहे थे। उनका भी श्रद्धावश जा कर मैने चरण स्पर्श किया था और मेरे बच्चों ने भी उनके पैर छुये थे। उन्होने भी हम से प्रसन्न हो कर मेरी बिटिया की कॉपी में कविता की दो पंक्तियां लिख कर दी थीं! … वे भी बहुत सरल हृदय व्यक्ति थे।

यूं ही, अचानक जीवन में मिल जाती हैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र और श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी जैसी विभूतियां और जीवन धन्य हो जाता है।

मैने गिरीश सिंह को फोन कर घटना के बारे में बताया। गिरीश ने बाद में ह्वाट्सएप्प में सन्देश दिया – जय हो! आनन्द आ गया आज तो। ज्ञान भैया ने कमाल कर दिया!

कमाल तो गिरीश के आग्रह ने किया था। अन्यथा मैं शायद पण्डित मिश्र जी से मिलने का विचार भी न करता।

कृष्णनगर को छू कर आना


बढ़नी रेलवे स्टेशन का फसाड
बढ़नी रेलवे स्टेशन का फसाड

उत्तरप्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में है बढ़नी बाजार। यहां नगरपालिका है। बारह-पन्द्रह हजार के आसपास होगी आबादी। सन 2001 की जनगणना अनुसार 12 हजार। रेलवे स्टेशन है। गोरखपुर-बढ़नी-गोंडा लाइन पहले मीटरगेज की थी; अब गोरखपुर से बढ़नी तक यह ब्रॉडगेज बन चुकी है और अगले मार्च तक गोंडा तक हो जायेगी।

झण्डानगर  में नाई की दुकान का बोर्ड
झण्डानगर में नाई की दुकान का बोर्ड

बढ़नी के आगे 100-200 कदम पर है नेपाल के कपिलवस्तु जिले (लुम्बिनी जोन) का कस्बा कृष्णनगर। यह झण्डानगर के नाम से भी जाना जाता है – इस नाम से साइनबोर्ड वहां मुस्लिम दुकानदारों के दिखे। शायद हिन्दू कृष्णनगर कहते हों और मुसलमान झण्डानगर। कृष्णनगर की आबादी सन 1991 में थी 20 हजार। अब शायद दुगनी हो?

बढ़नी से हम लोगों को विशेष ट्रेन से वापस लौटना था। मैने वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक महोदय को अनुरोध किया कि उसे आधा घण्टा देरी से चलायें जिससे मैं पैदल सीमापार कृष्णनगर छू कर आ सकूं। और तब पाया कि लगभग सभी अधिकारीगण वहां जा कर आना चाहते थे।

यहां लोगों का नेपाल से आवागमन निर्बाध है। माल आयात-निर्यात के लिये सीमा कर विभाग के चेक प्वाइण्ट हैं। किस प्रकार के सामान की कैसे चेकिंग करते होंगे वे – यह जानकारी हासिल करने का मेरे पास समय नहीं था। दोपहर के भोजन के तुरत बाद हम बढ़नी स्टेशन से निकल गये कृष्णनगर के लिये। साथ में स्टेशन के कर्मचारी थे जो रास्ता बता रहे थे। रास्ता वे ठीक से बता रहे थे। पर दक्ष गाइड नहीं थे – अन्यथा अनवरत हम लोगों को जानकारियां देते रहते और बाद में विकीपेडिया खंगालने की जरूरत नहीं होती।

नेपाल-भारत के बीच नो-मैंस लैण्ड का यह क्षेत्र।
नेपाल-भारत के बीच नो-मैंस लैण्ड का यह क्षेत्र।

दोनो देशों के बीच था नो-मैंस-लैण्ड। करीब पचास मीटर की पट्टी। ऊबड़-खाबड़। बहुत कचरा था वहां। उसकी सफाई पर नेपाल ध्यान न देता हो तो भारत को ही देना चाहिये। न हो तो सफाई करने की ट्रीटी हो जाये। सीमा को इतना गन्दा देखना अच्छा नहीं लगता। उस नो-मैंस-लैण्ड का चित्र ले रहा था मैं तब सीमा के सुरक्षा-कर्मी, एक महिला कर्मी ने मुझसे कहा कि चित्र लेना प्रतिबन्धित है। चित्र तो ले ही चुका था।

DSC_1892कृष्णनगर में नाई, दरजी, गरम कपड़े, कम्बल, अंग्रेजी शराब, कम्यूटर सिखाने, मोबाइल पर गाने अपलोड करने, चाऊमीन जैसे भोजन आदि की दुकानें थीं। ऐसी दुकानें जो किसी भी कस्बे या छोटे शहर में देखने में मिलती हैं। अंतर यह भर था कि वहां चीन-कोरिया का जैकेट-कोट-कम्बल और सस्ता इलेक्टॉनिक सामान मिल रहा था। एक दुकान थी कृष्णा कन्सर्न्स। उसमें यह सामान भरा था। मैने जैकेट खरीदने की कोशिश की। दो-तीन जैकेट नापे भी। फिर खरीददारी में अपने अनाड़ीपन का स्मरण कर विचार त्याग दिया। कभी पत्नीजी के साथ जाना हुआ तो खरीदा जायेगा।

कृष्णा कन्सर्न्स
कृष्णा कन्सर्न्स

नेपाल में अपनी उपस्थिति के कुछ सेल्फियाऊ चित्र खींचे। वापस लौटते हुये नेपाल की सीमा से भारत के क्षितिज में एक मकान के ऊपर टंगे सूर्यदेव नजर आये। वे भी नेपाल से भारत आये थे और मेरी तरह उन्होने भी कोई खरीददारी नहीं की थी।

ढ़लता सूरज। क्षितिज भारत में है।
ढ़लता सूरज। क्षितिज भारत में है।

यह तो नेपाल का पाला छू कर आने जैसा था। विधिवत जाया जायेगा वहां फिर कभी।

कृष्णनगर नगरपालिका, कपिलवस्तु, नेपाल का बोर्ड
कृष्णनगर नगरपालिका, कपिलवस्तु, नेपाल का बोर्ड

बढ़नी का जलसा


बढ़नी में हुये समारोह का ब्रोशर
बढ़नी में हुये समारोह का ब्रोशर

बढ़नी पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ मण्डल का स्टेशन एक है। वहां से नेपाल 150 कदम पर है। पिछले रविवार वहां जाना हुआ। शायद विदेश यात्रा का भी योग था, सो वहीं से पैदल नो-मैंस-लैण्ड डांक कर कृष्णनगर भी हो आया। कृष्णनगर नेपाल के कपिलवस्तु जिले का कस्बा है। बढ़नी का सीमा उस पार ट्विन-कस्बा। इस पार के सांसद महोदय की मानी जाये (आप चुटकी भर नहीं, टनों सॉल्ट के साथ मानें) तो बरास्ते कृष्णनगर हजारों नेपाली रोज भारत आते हैं और काम की खोज में दिल्ली, बम्बई, लुधियाना और कलकत्ता जाते हैं।

हमारे रेल राज्य मंत्री जी का बढ़नी का कार्यक्रम था। वहां रेलवे एक मल्टी-फंक्शनल-कॉम्प्लेक्स बनाने जा रही है। उसी का शिलान्यास मंत्री महोदय (श्री मनोज सिन्हा) करने जा रहे थे। कार्यक्रम लखनऊ रेल मण्डल का था। पर चूंकि मंत्रीजी गोरखपुर से बढ़नी जा रहे थे, हम विभागों के प्रमुखगण भी उनकी स्पेशल ट्रेन में चल रहे थे। उनको आग्रहपूर्वक लिवा ले जा रहे थे बढ़नी के भाजपाई सांसद श्री जगदम्बिका पाल। श्री पाल उत्तरप्रदेश के अत्यल्पकालिक मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं सन 1998 में। पिछले चुनाव के पहले, मार्च’14 में अपना कांग्रेसी चोला उतारकर वे भाजपाई बन गये। मोदी लहर में सब जीते; वे भी जीते डुमरियागंज संसदीय क्षेत्र से। श्री पाल अपने संसदीय क्षेत्र के हर ठीकठाक स्टेशन पर जलसा करा कर मंत्रीजी से उनके क्षेत्र के लिये नयी ट्रेनों की मांग कर रहे थे। उनकी मांगों को सुनना राजनीति – विशेषकर पूर्वोत्तरीय उत्तरप्रदेश की राजनीति समझने में एक अध्याय था मेरे लिये।


पूर्वोत्तरीय उत्तरप्रदेश की गरीबी और पिछड़ेपन के मूल में जनता की (अ)कर्मठता नहीं है; यहां के नेतृत्व में जड़त्व है। वह कहीं गहरे में यह समझता है कि अगर प्रांत विकसित हो गया तो उन जैसे लोगों की सम्पन्नता का छद्म मॉडल भरभरा कर गिर पड़ेगा। रेलवे यहां से दिल्ली-बम्बई-कलकत्ता-लुधियाना के लिये सस्ते लेबर का फीडर बने – यह मांग दृढ़ता से रखी-मिली। पर रेलवे इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास के लिये इनपुट्स का फीडर बने – उसकी मांग तो उठी ही नहीं। पूरे रास्ते उर्वर भूमि, प्रचुर जल और बच्चों-जवानों की विशाल आबादी देखी मैने। यह क्षेत्र डेवलपमेण्ट के लिये कसमसा रहा है और जो मांगें सुनने में आ रही थीं, उनका स्वरूप दो दशक पहले की मांगों जैसा ही है। उस प्रकार की मांगों को पूरा करने में रेलवे दो दशक पहले शायद ज्यादा सक्षम थी। अब उसे अपने से की जा रही अपेक्षाओं के विषय में  साफगोई का परिचय देना होगा। 😦


मल्टी फंक्शनल कॉम्प्लेक्स 

इसके बारे में ब्रोशर में बताया गया कि नेपाल आने-जाने वाले यात्रियों के लिये दुकानें, फूड-कोर्ट, कमरे, डॉर्मेट्री आदि की आधुनिक सुविधा का निर्माण इस कॉम्प्लेक्स में होगा। 


बढ़नी में हमें लगभग 12 बजे पंहुचना था। पर रास्ते में कई जगह हुये जलसों में समय लगता गया। उतनी देरी की तो लोग अपेक्षा करते ही हैं। लगभग एक घण्टा बाद शुरू हुआ कार्यक्रम बढ़नी में और पूरी दक्षता से चला। एक वक्ता, जो पहले बोले, ने पाल जी की प्रशंसा में कहा कि भाजपा को अगले विधानसभा चुनाव मे श्री पाल को अपना मुख्यमंत्री घोषित करना चाहिये। उसके बाद श्री जगदम्बिका पाल बोले। वे अपने लम्बे भाषण में इलाके की मांगों की चर्चा करते और जनता से उसके समर्थक में हाथ उठवाते। शोर मचता, हाथ उठते और जो ज्यादा पक्के समर्थक थे, वे दोनो हाथ उठाते।

समारोह में बोलते श्री मनोज सिन्हा, रेल राज्यमंत्री
समारोह में बोलते श्री मनोज सिन्हा, रेल राज्यमंत्री

मंच ऊंचा बना था। उसके बांई ओर शिलान्यस पट्ट लगा था। उसका मंत्री महोदय ने रिमोट से उद्घाटन किया। तालियाँ। और फिर मंत्री महोदय का भाषण। श्री सिन्हा ने काले धन, व्यापक स्तर पर जनता के खुले बैंक अकाउण्ट्स, स्वच्छता अभियान, भारत का फूड सिक्यूरिटी पर दृढ़ पक्ष, भारत में निर्माण, डीजल-पेट्रोल के दामों में कमी आदि की चर्चा की। किसी न किसी प्रकार से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की कर्मठता और उनके करिश्मे की चर्चा हो ही जा रही थी हर एक मुद्दे में। उन्होने बताया कि साल भर पहले वे सियेटल गये थे और हाल ही में शिकागो। वे सात महीने में परदेश में भारतीय लोगों के प्रति आदर में वृद्धि और भारत के प्रति बदली सोच को गहरे से नोटिस कर पाये। श्री सिन्हा ने रेलवे का परिदृष्य बदलने के संकल्प की भी बात कही। उन्होने श्री पाल की प्रशंसा और उनकी मांगों पर समुचित ध्यान देने की बात भी कही।

जलसा बहुत सफल रहा। मंत्री महोदय उसके तुरंत बाद डुमरियागंज के लिये रवाना हो गये। हम लोगों के पास समय था भोजन कर नेपाल में (लगभग 100-200 मीटर दूर) कृष्णनगर के बाजार का चक्कर लगाने का। उसके बारे में अन्य ब्लॉग पोस्ट में।

बढ़नी (भारत) और कृष्णनगर (नेपाल) के बीच यह नो-मेंस-लैण्ड। सामने नेपाल है। सुरक्षाकर्मी ने मुझे फोटो न खींचने की हिदायत दी। पर तब तक खींच चुका था मैं।
बढ़नी (भारत) और कृष्णनगर (नेपाल) के बीच यह नो-मेंस-लैण्ड। सामने नेपाल है। सुरक्षाकर्मी ने मुझे फोटो न खींचने की हिदायत दी। पर तब तक खींच चुका था मैं।