‘अन्नदाता’ पर विचार

मैंने एक पोस्ट दो महीने पहले लिखी थी –

यह भी किसान हैं, इनको भी सुना जाये

जब एक सज्जन सौरभ गुप्त जी, ट्विटर पर मेरे किसान के प्रति कुढ़न और नफरत की बात करते हैं, तो मैं उनका ध्यान इस पोस्ट की ओर इंगित करना चाहता हूं। उनकी ट्वीट है –

सौरभ गुप्ता जी की ट्वीट

सौरभ जी के कहा कि मेरे लिखे ब्लॉग बढ़िया होते हैं। प्रशंसा के लिये धन्यवाद। उन्होने कुढ़न और नफरत की जो बात कही, उस संदर्भ में यह अनुरोध है कि ऊपर लिंक दिये ब्लॉग पोस्ट को कृपया पढ़ें। अगर पहले पढ़ भी रखा हो तो एक बार पुन: अवलोकन कर लें।

“उसके पास अपनी जमीन नहीं है। इतनी भी शायद नहीं उनके एक कमरे के मकान के आगे एक शौचालय बन सके।”

अभी जो “किसान” आंदोलन चल रहा है, और जिसे मेरे आसपास का कोई किसान तनिक भी उद्वेलित नहीं दिखता; उसे मैं व्यंग में “अन्नदाता आंदोलन” कहता हूं। उस “अन्नदाता आंदोलन” के विषय में मेरे यह विचार हैं कि वह आंदोलन मेरे यहां के गरीब किसान को छूता भी नहीं। और ऐसा गरीब किसान भारत में बहुतायत में है। यहां तक कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी बिना जमीन या बहुत थोड़ी जमीन का किसान अधिक होगा वरन इन ‘बड़े’ किसानों के। और इस आंदोलन से इस गरीब का भला होने वाला नहीं है।

पूरा का पूरा आंदोलन गेंहू-धान की मोनोकल्चर वाले, पानी का बेतहाशा अपव्यय करने वाले धनी किसानों का बंधक हो गया है। और अब तो लगता है कि पश्चिमी देशों के ‘सेलिब्रिटी’ तथा अश्लील ‘स्टार’ भी आंदोलन के समर्थन में आ गये हैं। अब तो यह राजनीति ज्यादा है, आंदोलन कम।

मैं यहां गांव में राजकुमार से दलित बस्ती के हालचाल लिया करता हूं। वह बताता है कि उसकी बस्ती में करीब पंद्रह परिवार खेती करते हैं। जमीन किसी के पास भी नहीं है। सब अधिया पर खटते हैं। अधिया की किसानी से घर का खर्चा पूरा नहीं पड़ता। इसलिये वे समय निकाल कर मजदूरी भी करते हैं। कुछ लोग – ज्यादातर उम्रदराज लोग – जिन्हे कार्पेट बुनना आता है; अधिया-किसानी के साथ साथ कार्पेट बुनने का भी काम करते हैं। विचार यह होता है कि खेती करने से खाने भर का मिल जाये और कार्पेट बुनने से बाकी खर्चा चल सके।

कार्पेट बुनने का काम रोज रोज नहीं मिलता। वह हुनर पर निर्भर करता है। कार्पेट के ऑर्डर भी अब बहुत कम हो गये हैं। इसलिये जो पहले से बुनना जानते हैं, वे ही काम में लगे हैं। नयी पीढ़ी का कोई कार्पेट बुनना नहीं सीख रहा। राजकुमार के पिता भी कार्पेट बूम के समय में चार पांच कार्पेट की खड्डी चलाते थे। अब वह काम खत्म हो गया है। अब राजकुमार भी नरेगा में काम करता है या फुटकर मजदूरी करता है। उसने कार्पेट बुनना नहीं सीखा।

अधिया या मार्जिनल खेती से अव्वल तो बेचने लायक अनाज बचता ही नहीं। और अगर बचता भी है तो उसे वे कस्बे के बाजार में बेचते हैं। भाव एमएसपी से निश्चय ही बहुत कम मिलते हैं। पर एमएसपी पर अनाज बिकना अधिया किसान की समस्या का समाधान नहीं है। वह तो रिकार्ड में तो किसान है ही नहीं। उसका कल्याण तो इसमें है कि उसे यहीं गांवदेहात में रोजगार मिले। यहां उसके पास घर है। किसी महानगर में नारकीय जिंदगी जीने की बजाय खुली हवा है। जो उसके पााासस नहीं है, वह है रोजगार।

मेरा सोचना है कि जब खेती धान-गेंहूं की मोनो कल्चर से मुक्त होगी, जब इसमें बाहर से पूंजी आ कर लगेगी, जब सब्जी-फल-दलहन आदि की खेती का चलन होगा और उनकी प्रोसेसिंग की तकनीक गांव-कस्बे तक पंहुचेगी; तब (शायद) उनको रोजगार मिलेगा।

हो सकता है, मेरे सोचने में लोचा हो। हो सकता है, जम्मींदार बड़े किसान जैसे इन छोटे किसानों का शोषण करते हैं, उसी तरह पूंजी लगाने वाले भी इस मार्जिनल किसान का शोषण ही करें। इस आशंका को मैंने पहले की ब्लॉग पोस्ट में व्यक्त भी किया है, जिसका लिंक पोस्ट में ऊपर दिया है।

एक अधिया पर किसानी करता परिवार

लेकिन, और मैं जोर दे कर कहूंगा कि इस मार्जिनल गरीब किसान, इस अधिया की खेती करते किसान का कोई नफा इस ‘अन्नदाता’ आंदोलन में नहीं है। जो ‘अन्नदाता’ लोग आंदोलन कर रहे हैं; वही इसे दबाते, शोषित करते आए हैं। ये ‘अन्नदाता’ घोर सामंतवादी, कम्यूनल, जातिवादी और अपनी ही कहने, किसी और की न सुनने वाले हैं। मैं ऐसे लोगों की ट्रेट वाले लोगों को अपने आसपास भी चिन्हित कर सकता हूं। उनके दबदबे/उज्जड्डता के कारण कभी कभी लगता है कि व्यर्थ में गांव आया रहने के लिये। मेरे मन में जो तल्खी है, वह उन जैसों की जमात से है।

मैं अपनी छ दशक की जिंदगी में साम्यवाद और समाजवाद की समस्याओं को सुलझाने में असमर्थता को देख चुका हूं। वे मुझे समाधान देते नजर नहीं आते। और यह ‘अन्नदाता’ आंदोलन या प्रतिपक्ष कोई वैकल्पिक ब्ल्यू-प्रिण्ट भी नहीं रखता। हंगामा खड़ा करना ही उनका मकसद लगता है।

मेरे मन में सरकारी एक्ट्स के द्वारा होने वाले परिवर्तनों को ले कर भी संशय हैं। डीमोनेटाइजेशन या जी.एस.टी. प्रकरण में अकुशल और भ्रष्ट सरकारी मशीनरी ने जो पलीता लगाया वह सामने है। उसके अलावा मन में यह दगदग है कि कहीं कॉर्पोरेट्स भी गरीब को ठगने का ही काम तो नहीं करेंगे। उस संशय को किसी ने एड्रेस नहीं किया है। पर मैं यह भी जानता हूं कि जो हालत है, उसमें बदलाव जरूरी है। जो चल रहा है, उसे रोक कर कुछ नया किया जाना चाहिये।

बस।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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