‘अन्नदाता’ पर विचार

मैं अपनी छ दशक की जिंदगी में साम्यवाद और समाजवाद की समस्याओं को सुलझाने में असमर्थता को देख चुका हूं। वे मुझे समाधान देते नजर नहीं आते। और यह ‘अन्नदाता’ आंदोलन या प्रतिपक्ष कोई वैकल्पिक ब्ल्यू-प्रिण्ट भी नहीं रखता। हंगामा खड़ा करना ही उनका मकसद लगता है।


मैंने एक पोस्ट दो महीने पहले लिखी थी –

यह भी किसान हैं, इनको भी सुना जाये

जब एक सज्जन सौरभ गुप्त जी, ट्विटर पर मेरे किसान के प्रति कुढ़न और नफरत की बात करते हैं, तो मैं उनका ध्यान इस पोस्ट की ओर इंगित करना चाहता हूं। उनकी ट्वीट है –

सौरभ गुप्ता जी की ट्वीट

सौरभ जी के कहा कि मेरे लिखे ब्लॉग बढ़िया होते हैं। प्रशंसा के लिये धन्यवाद। उन्होने कुढ़न और नफरत की जो बात कही, उस संदर्भ में यह अनुरोध है कि ऊपर लिंक दिये ब्लॉग पोस्ट को कृपया पढ़ें। अगर पहले पढ़ भी रखा हो तो एक बार पुन: अवलोकन कर लें।

“उसके पास अपनी जमीन नहीं है। इतनी भी शायद नहीं उनके एक कमरे के मकान के आगे एक शौचालय बन सके।”

अभी जो “किसान” आंदोलन चल रहा है, और जिसे मेरे आसपास का कोई किसान तनिक भी उद्वेलित नहीं दिखता; उसे मैं व्यंग में “अन्नदाता आंदोलन” कहता हूं। उस “अन्नदाता आंदोलन” के विषय में मेरे यह विचार हैं कि वह आंदोलन मेरे यहां के गरीब किसान को छूता भी नहीं। और ऐसा गरीब किसान भारत में बहुतायत में है। यहां तक कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी बिना जमीन या बहुत थोड़ी जमीन का किसान अधिक होगा वरन इन ‘बड़े’ किसानों के। और इस आंदोलन से इस गरीब का भला होने वाला नहीं है।

पूरा का पूरा आंदोलन गेंहू-धान की मोनोकल्चर वाले, पानी का बेतहाशा अपव्यय करने वाले धनी किसानों का बंधक हो गया है। और अब तो लगता है कि पश्चिमी देशों के ‘सेलिब्रिटी’ तथा अश्लील ‘स्टार’ भी आंदोलन के समर्थन में आ गये हैं। अब तो यह राजनीति ज्यादा है, आंदोलन कम।

मैं यहां गांव में राजकुमार से दलित बस्ती के हालचाल लिया करता हूं। वह बताता है कि उसकी बस्ती में करीब पंद्रह परिवार खेती करते हैं। जमीन किसी के पास भी नहीं है। सब अधिया पर खटते हैं। अधिया की किसानी से घर का खर्चा पूरा नहीं पड़ता। इसलिये वे समय निकाल कर मजदूरी भी करते हैं। कुछ लोग – ज्यादातर उम्रदराज लोग – जिन्हे कार्पेट बुनना आता है; अधिया-किसानी के साथ साथ कार्पेट बुनने का भी काम करते हैं। विचार यह होता है कि खेती करने से खाने भर का मिल जाये और कार्पेट बुनने से बाकी खर्चा चल सके।

कार्पेट बुनने का काम रोज रोज नहीं मिलता। वह हुनर पर निर्भर करता है। कार्पेट के ऑर्डर भी अब बहुत कम हो गये हैं। इसलिये जो पहले से बुनना जानते हैं, वे ही काम में लगे हैं। नयी पीढ़ी का कोई कार्पेट बुनना नहीं सीख रहा। राजकुमार के पिता भी कार्पेट बूम के समय में चार पांच कार्पेट की खड्डी चलाते थे। अब वह काम खत्म हो गया है। अब राजकुमार भी नरेगा में काम करता है या फुटकर मजदूरी करता है। उसने कार्पेट बुनना नहीं सीखा।

अधिया या मार्जिनल खेती से अव्वल तो बेचने लायक अनाज बचता ही नहीं। और अगर बचता भी है तो उसे वे कस्बे के बाजार में बेचते हैं। भाव एमएसपी से निश्चय ही बहुत कम मिलते हैं। पर एमएसपी पर अनाज बिकना अधिया किसान की समस्या का समाधान नहीं है। वह तो रिकार्ड में तो किसान है ही नहीं। उसका कल्याण तो इसमें है कि उसे यहीं गांवदेहात में रोजगार मिले। यहां उसके पास घर है। किसी महानगर में नारकीय जिंदगी जीने की बजाय खुली हवा है। जो उसके पााासस नहीं है, वह है रोजगार।

मेरा सोचना है कि जब खेती धान-गेंहूं की मोनो कल्चर से मुक्त होगी, जब इसमें बाहर से पूंजी आ कर लगेगी, जब सब्जी-फल-दलहन आदि की खेती का चलन होगा और उनकी प्रोसेसिंग की तकनीक गांव-कस्बे तक पंहुचेगी; तब (शायद) उनको रोजगार मिलेगा।

हो सकता है, मेरे सोचने में लोचा हो। हो सकता है, जम्मींदार बड़े किसान जैसे इन छोटे किसानों का शोषण करते हैं, उसी तरह पूंजी लगाने वाले भी इस मार्जिनल किसान का शोषण ही करें। इस आशंका को मैंने पहले की ब्लॉग पोस्ट में व्यक्त भी किया है, जिसका लिंक पोस्ट में ऊपर दिया है।

एक अधिया पर किसानी करता परिवार

लेकिन, और मैं जोर दे कर कहूंगा कि इस मार्जिनल गरीब किसान, इस अधिया की खेती करते किसान का कोई नफा इस ‘अन्नदाता’ आंदोलन में नहीं है। जो ‘अन्नदाता’ लोग आंदोलन कर रहे हैं; वही इसे दबाते, शोषित करते आए हैं। ये ‘अन्नदाता’ घोर सामंतवादी, कम्यूनल, जातिवादी और अपनी ही कहने, किसी और की न सुनने वाले हैं। मैं ऐसे लोगों की ट्रेट वाले लोगों को अपने आसपास भी चिन्हित कर सकता हूं। उनके दबदबे/उज्जड्डता के कारण कभी कभी लगता है कि व्यर्थ में गांव आया रहने के लिये। मेरे मन में जो तल्खी है, वह उन जैसों की जमात से है।

मैं अपनी छ दशक की जिंदगी में साम्यवाद और समाजवाद की समस्याओं को सुलझाने में असमर्थता को देख चुका हूं। वे मुझे समाधान देते नजर नहीं आते। और यह ‘अन्नदाता’ आंदोलन या प्रतिपक्ष कोई वैकल्पिक ब्ल्यू-प्रिण्ट भी नहीं रखता। हंगामा खड़ा करना ही उनका मकसद लगता है।

मेरे मन में सरकारी एक्ट्स के द्वारा होने वाले परिवर्तनों को ले कर भी संशय हैं। डीमोनेटाइजेशन या जी.एस.टी. प्रकरण में अकुशल और भ्रष्ट सरकारी मशीनरी ने जो पलीता लगाया वह सामने है। उसके अलावा मन में यह दगदग है कि कहीं कॉर्पोरेट्स भी गरीब को ठगने का ही काम तो नहीं करेंगे। उस संशय को किसी ने एड्रेस नहीं किया है। पर मैं यह भी जानता हूं कि जो हालत है, उसमें बदलाव जरूरी है। जो चल रहा है, उसे रोक कर कुछ नया किया जाना चाहिये।

बस।


यह भी किसान हैं, इनको भी सुना जाये

किसानी के आइसबर्ग का टिप है जो अपने ट्रेक्टर ले कर दिल्ली दलन को पंहुचा है और घमण्ड से कहता है कि छ महीने का गल्ला लेकर धरना देने आया है। यह गांव वाला बेचारा तो छ महीने क्या, छ दिन भी दिल्ली नहीं रह पायेगा।


उसके पास अपनी जमीन नहीं है। इतनी भी शायद नहीं उनके एक कमरे के मकान के आगे एक शौचालय बन सके। अगर कुछ खेती की जमीन है भी तो इतनी नहीं कि उसकी खेती से वह परिवार के भरण-पोषण लायक अन्न उपजा सके। वह अधिया पर किसी और का खेत जोतता है। असल में किसान वही है। उसी के श्रम से अन्न उपज रहा है। पर उसकी पंहुच मण्डी तक नहीं है। जो कुछ उसके हिस्से का होता है वह उसके घर में ही खप जाता है। कुछ बेचने लायक हुआ तो आसपास में किसी को बेच देता है।

अधिया पर खेत जोतता किसान दम्पति

उसके पास एक दो बकरियां हैं – वे उसका गाढ़े समय के लिये बीमा जैसी हैं। अगर फसल नहीं हुई तो बकरी बेच कर काम चलता है। कुछ मुर्गियां होती हैं। बिस्तर के लिये गद्दे नहीं हैं, सर्दी की गलन से बचने को वह पुआल बिछाता है। औरतें दिन में दो तीन घण्टे सूखी घास और पत्तियां बीनती हैं , जिससे अलाव जलता है और खाना बनता है। आधे पर खेत जोतने के लिये हल बैल या ट्रेक्टर वह किराये पर लेता है। उसके अपने घर में एक फावड़ा भी शायद न हो। खुरपी मिले, बस। फटक गिरधारी है वह। न लोटा न थारी!

उसके पास एक दो बकरियां हैं – वे उसका गाढ़े समय के लिये बीमा जैसी हैं।

उसकी खेती हेक्टेयर में नहीं, एकड़ में नहीं, बीघे में नहीं, बिस्वे में होती है। शहरी मानस के लिये यह बता दिया जाये कि एक हेक्टेयर में चार बीघे होते हैं और एक बीघे में बीस बिस्वा। यह किसान (अगर आप उसे किसान मानते हों) बहुतायत में है। किसानी के आइसबर्ग का टिप है जो अपने ट्रेक्टर ले कर दिल्ली दलन को पंहुचा है और घमण्ड से कहता है कि छ महीने का गल्ला लेकर धरना देने आया है। यह गांव वाला बेचारा तो छ महीने क्या, छ दिन भी दिल्ली नहीं रह पायेगा।


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इसी के भाई बंद दिल्ली घेरने वालों की किसानी चमका रहे हैं! वर्ना यहां के तथाकथित बड़े किसान भी (अब का पता नहीं, कुछ साल पहले तक) बीपीएल कार्ड लेने का जुगत बनाते हैं।

गेंहूं के बीज बिखेरता किसान

रोज आसपास आठ दस किलोमीटर की दूरी में घूमता हूं और मुझे इसी तरह के किसान ही नजर आते हैं। इनकी जिंदगी बेहतर करने की जुगत क्या है? इसके लिये कौन से कानून हैं? कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग इस अंतिम छोर के किसान को रोजगार देगी या अनुपयोगी मान कर धकिया कर बाहर कर देगी? सरकार मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर जो भी स्टैण्ड ले; उससे इसको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। अभी लॉकडाउन के दौरान उसे राशन मिल रहा है, खाते में कुछ पैसे आ रहे हैं – उससे वह प्रसन्न है। उसकी जरूरत तो उसी तरह की मदद की है। सरकार कृषि अर्थव्यवस्था को खोले और किसानी में आर्थिक इनपुट्स मिलें तो उत्पादकता बढ़ सकती है। पर उस बढ़ी उत्पादकता में अगर इसका रोजगार छिन जाये और सरकार उसे सीधे सहायता देना जारी न रखे, तब क्राइसिस होगी।

औरतें दिन में दो तीन घण्टे सूखी घास और पत्तियां बीनती हैं , जिससे अलाव जलता है और खाना बनता है।

सरकार कृषि अर्थव्यवस्था को खोले और किसानी में आर्थिक इनपुट्स मिलें तो उत्पादकता बढ़ सकती है। पर उस बढ़ी उत्पादकता में अगर इस गरीब का रोजगार छिन जाये और सरकार उसे सीधे सहायता देना जारी न रखे, तब क्राइसिस होगी।

सरकार उन दिल्ली घेरने वाले तथाकथित किसानों को चाहे थका कर, चाहे पुचकार कर, चाहे नरम दस्ताने पहन घूंसा मार कर लाइन पर लाये; पर पचानवे परसेण्ट ऐसे किसानों की गरीबी को जरूर एड्रेस करे। ये लोग फ्रूगल हैं, सहिष्णु हैं और मेहनत अगर किसानी में कोई करता है तो ये ही लोग करते हैं। इनकी आवाज नहीं है। पर इन मूक लोगों की सुनी जानी चाहिये। सूखे मेवे खाते दिल्ली घेरते किसानों की बजाय इस आदमी की फिक्र की जानी चाहिये।

सवेरे का अलाव और भोजन की तैयारी

सरकार वही है, जो दबाव में सुनने की बजाय अंतिम आदमी का भला करे। कम से कम मोदी सरकार से यही अपेक्षा करते हैं ये लोग।

बिस्तर के लिये गद्दे नहीं हैं, सर्दी की गलन से बचने को वह पुआल बिछाता है।

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धन्यवाद।


श्रीराम बिंद की मटर

हमने उन्हें चाय पिलाई। साथ में दो बिस्कुट। वह व्यक्ति जो हमारे लिये सवेरे सवेरे मटर ले कर आ रहा है, उसको चाय पिलाना तो बनता ही है।


वह पास के गांव में रहता है अपनी “बुढ़िया” के साथ। दो लड़के हैं, दोनो बनारस में खाते-कमाते हैं। एक ऑटो चलाता है और दूसरा मिस्त्री का काम करता है किसी भवन निर्माण की फर्म में। उसके पास दो बिस्सा खेत है और गाय। गाय आजकल ठीक ठाक दूध दे रही है। मुझे दूध सप्लाई करने की पेशकश की थी, पर हमें जरूरत न होने पर वह अपने लड़कों और उनके परिवार के लिये बनारस ले कर जायेगा। “इही बहाने उन्हनेऊं दूध इस्तेमाल कई लेंईं (इसी बहाने उन्हें भी मिल जाये दूध)।

दो बिस्सा जमीन में मटर बोई थी। चार दिन पहले वह लाया था बेचने। 14रुपये किलो दी थी। बहुत अच्छी और मीठी मटर। लम्बी छीमी और हर छीमी में 6-9 दाने। स्वाद लाजवाब था – इस मौसम की सबसे बेहतरीन मटर थी वह। दो बिस्वा (1 बिस्वा बराबर 125 वर्ग मीटर) खेत में बहुत ज्यादा तो होती नहीं। आज दूसरी बार तोड़ी तो आसपड़ोस वाले ही ले गये। किसी तरह से 3 किलो बचा कर लाया हमारे लिये।

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