1941 से 2021 – अनिरुद्ध कर्मकार से राजबली विश्वकर्मा

मैं ‘गणदेवता’ जैसे किसी दस्तावेज सृजन का स्वप्न तो नहीं देखता; पर अपने जीवन की दूसरी पारी में गांव में रहने के कारण यह तो मन में है कि पचास साल से हुये ग्रामीण बदलाव को महसूस किया जाये और लेखन में (भले ही ब्लॉग पर ही हो) दर्ज किया जाये।


गणदेवता – ताराशंकर बंद्योपाध्याय

“गणदेवता” (सन 1941-46 के बीच लिखा कालजयी उपन्यास। लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय) के प्रारम्भ में आते हैंं पात्र – अनिरुद्ध कर्मकार लुहार और गिरीश सूत्रधार बढ़ई। पंचग्राम (पांच गांवों का समूह) के गांव वालों के सभी लुहार/बढ़ई के काम ये करते हैं। ये दोनों बेगारी और बिना पैसा दिये काम कराने की गांव की व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होते हैं। उपन्यास का समय बंगाल और भारत के नवजागरण काल का है। ताराबाबू उपन्यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में लिखते हैं –

बंगाल के ग्राम्य जीवन का जो चित्र इस उपन्यास का आधार है, वह केवल बंगाल का होने के बावजूद भी, उसमें सम्पूर्ण भारत के ग्राम्यजीवन का न्यूनाधिक प्रतिबिम्ब मिलेगा। बंगाल के गांव का खेतिहर-महाजन श्रीहरि घोष, संघर्षरत आदर्शवादी युवक देबू घोष, अथवा जीविकाहीन-भूमिहीन अनिरुद्ध लुहार केवल बंगाल के ही निवासी नहीं हैं। इनमें भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम – सब दिशाओं के भिन्न भिन्न राज्यों के ग्रामीण मनुष्यों का चेहरा खोजने पर प्रतिबिम्बित मिल जायेगा। बंगाल के श्रीहरि, देबू या अनिरुद्ध ने दूसरे प्रांतों में जा कर सिर्फ नाम ही बदला है, पेशे और चरित्र में वे लोग भिन्न नहीं हैं।

राजबली विश्वकर्मा की लोहा तपाने की भट्ठी। बांयी ओर धौंकनी (bellow) दिख रही है। भट्ठी के सामने कूट (anvil) है।

मैंं मचिया मिशन के संदर्भ में आसपास के लुहार – खाती/बढ़ई लोगों से मिला हूं। द्वारिकापुर के भोला विश्वकर्मा और कटका पड़ाव के राजबली विश्वकर्मा से कई बार मिला हूं। राजबली के साथ उनके घर-कम-वर्कशॉप पर पीढ़ा और कुर्सी पर बैठ कर उनसे बात की है। उनके घर की तीन पीढ़ी से मेरा परिचय है। हर एक के गुणों, बदलावों और बदलते जीवन मूल्यों को मैंने महसूस किया है। मैंने यह भी विश्लेषण करने का यत्न किया है कि भोला विश्वकर्मा ने कई बार चक्कर लगाने और उसके द्वारा मांगी गयी कीमत पर सहमत होने के बावजूद भी क्यों नहीं बनाया मचिया का फ्रेम? लीक से अलग काम करना क्यों नहीं चाहता आम गंवई कारीगर? उसके उलट राजबली ने अपने कहे को निभाया। राजबली की इज्जत, प्रतिष्ठा और जीवन मूल्य क्या हैं?

राजबली का पोता ईश्वरचंद्र मुझे भट्ठी की कार्यविधि समझाते हुये।

समाज में, विशेषकर कारीगर समाज कैसा है और उसके जीवन में क्या परिवर्तन हुये पिछले पचास साठ साल में – वह जानना और दर्ज करना मुझे एक चैलेंज लगता है।

गणदेवता को तो ज्ञानपीठ पुरस्कार ही मिला। मेरे ख्याल से उससे कई कमतर पुस्तकों को नोबेल मिल चुका है। मैं उस पुस्तक जैसे किसी दस्तावेज सृजन का स्वप्न तो नहीं देखता; पर अपने जीवन की दूसरी पारी में गांव में रहने के कारण यह तो मन में है कि पचास साल से हुये ग्रामीण बदलाव को महसूस किया जाये और लेखन में (भले ही ब्लॉग पर ही हो) दर्ज किया जाये।

भट्ठी पर गलीचा बुनकर के औजार को तपाते और धार देते राजबली।

राजबली का जीवन बंगाल के अनिरुद्ध कर्मकार जैसा तो नहीं दिखता। उनके बेटे शिवकुमार ने बताया कि उनके घर में अभाव जैसा कुछ नहीं था। औराई से गडौली तक पांच-छ कोस के इलाके में सारी खेती किसानी उन्ही के द्वारा बनाये गये औजारों-हलों पर निर्भर थी। लोगों के पास पैसे नहीं होते थे और पैसे की बजाय बनी-मजूरी का प्रचलन था। उनके घर में इतना अनाज आता था कि मौसम से इतर उसे खरीदने वाले भीड़ लगाये रहते थे। यह सब उनकी कारीगरी के बल पर ही था। अब भी काम मिलने की समस्या नहीं है। हुनर के लिये ग्राहक हैं ही। यह जरूर है कि समय के साथ काम का स्वरूप/प्रकार बदला है। पहले जिन चीजों की जरूरत होती थी, आज उनकी मांग नहीं है।

शिवकुमार जो बता रहे थे, वह मेरी सामान्य सोच और “गणदेवता” में पढ़े बदलते समय के द्वंद्व से अलग, एक खुशनुमा रोमाण्टिक कथा जैसा लगा। किसी बदलते समय की क्राइसिस जैसा नहीं। क्या ऐसा है? क्या ऐसा इसलिये है कि राजबली ने अपने और अपने परिवार के लिये नैतिक चरित्र के प्रतिमान बना दिये हैं और उनका पालन करते हैं? क्या ऐसा अगर वास्तव में है तो वह इसलिये कि उनके परिवार की जरूरतें संयमित थीं/हैं? या सामान्यत: कारीगर वर्ग दलित या खेत मजदूरों की अपेक्षा हमेशा बेहतर रहा और उसे अपने हाथ के हुनर के बल पर कभी आर्थिक समस्या नहीं आयी?

मेरे घर पर शिवकुमार अपने पिताजी (राजबली) के बारे में बताते हुये।

मैं शिवकुमार से कहता हूं कि उनके पिताजी के पास मुझे फुर्सत में समय गुजार कर उनके जीवन की गाथा सुननी और नोट करनी है। कुछ दिनों में मौसम सुधरे तो यह किया जाना है। शिवकुमार ने बताया कि राजबली सवेरे तीन बजे उठ कर शौच-स्नान-पूजा-पाठ में समय व्यतीत करते हैं। उनहत्तर साल के हो गये हैं पर दिनचर्या के नियम पूरी कड़ाई से पालन करते हैं। अपनी जिंदगी अपने उसूलों के अनुसार चलाते हैं और उसमें किसी की दखल नहीं होती! शिवकुमार अपने पिता के बारे में जो भी बताये, उसके अनुसार राजबली के पास फुर्सत के समय में मिलने की इच्छा बलवती हो गयी है। अभी तो जब भी उनसे मिला हूं, वे काम में लगे मिले हैं। कभी खड़ाऊं बनाते, कभी भट्टी पर लुहार का काम करते पाया है।

‘गणदेवता’ के अनिरुद्ध कर्मकार के समांतर राजबली विश्वकर्मा को रख कर तुलना करना रोचक होगा। उन दोनो का जीवन अब तक ज्ञात जानकारी के अनुसार बहुत अलग नजर आता है।

देखें; राजबली से विस्तृत मुलाकात कब होती है!


अयोध्या का पहला ऑर्कियॉलॉजिकल उत्खनन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने किया था

बी.एच.यू. के पुरातत्व विभाग ने अपने पुराने संग्रह से सभी उपयुक्त सामग्री चिन्हित कर एकत्र कर ली है। डा. अशोक कुमार सिंह कहना था कि वे लोग एक महीने में यह विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर लेंगे।


प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह, से मैं अगियाबीर के पुरातात्विक उत्खनन के समय से परिचित हूं। उनके अगियाबीर के उत्खनन की ट्वीट्स का रिकार्ड आप इन मोमेण्ट्स में देख सकते हैं।

डा. अशोक कुमार सिंह

सन 2018 से प्रोफेसर सिंह मेरे अभिन्न मित्र बन चुके हैं। कल उन्होने बातों बातों में बताया कि अयोध्या का पहला पुरातात्विक उत्खनन 1969-70 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उनके विभाग ने किया था। उस उत्खनन में स्थान की प्राचीनता के स्पष्ट प्रमाण मिले थे। तीन अलग अलग स्थानों पर की गयी खुदाई में 600 बीसीई से ले कर मध्यकाल तक की बसावट के साक्ष्य उसमें मिले थे।

इस उत्खनन की संक्षिप्त रिपोर्ट इण्डियन ऑर्कियॉलॉजी रिव्यू 1969-70 (पेज 40-41); में उस समय छपी थी। उस रिपोर्ट को नीचे स्लाइड्स में देखा जा सकता है।

अत: जब डा. अशोक सिंह ने मुझे सन 1969-70 के उत्खनन के बारे में बताया तो मुझे बहुत हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की शेयर वैल्यू मेरी निगाह में और भी बढ़ गयी! 😀

अब मैं और मेरे जैसे लगभग सभी आम जन जो अयोध्या के उत्खनन को आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के तत्वावधान में डा. बीबी लाल और उनकी टीम द्वारा 1976-77 में किये अनुसंधान से मान कर चलते हैं और जिसके बारे में मैंने डा. लाल की पुस्तक “राम – हिज हिस्टॉरिसिटी, आर्कियॉलॉजी एण्ड अदर साइंसेज” के दूसरे अध्याय (पेज 54-68) से विस्तृत परिचय पाया है; वे बी.एच.यू. के इस योगदान से अपरिचित रहे हैं।

अत: जब डा. अशोक सिंह ने मुझे सन 1969-70 के उत्खनन के बारे में बताया तो मुझे बहुत हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की शेयर वैल्यू मेरी निगाह में और भी बढ़ गयी! 😀

डा. अशोक सिंह ने कहा कि उस उत्खनन को करने वाले तीनों दिग्गज पुरातत्वविद – प्रोफेसर एके नारायण, श्री टी.एन. रॉय और डा. पुरुषोत्तम सिंह – इस समय दिवंगत हो चुके हैं। डा. पुरुषोत्तम सिंह, जिन्हे डा. अशोक सिंह अपना गुरू मानते हैं और जिनके साथ पहले पहल उन्होने अगियाबीर का उत्खनन-अनुसंधान किया था; का देहांत पिछले साल ही हुआ है।

सन 1969-70 के उत्खनन की विस्तृत रिपोर्ट उस समय नहीं बन सकी थी। सम्भवत: पुरातत्वविदों की वह टीम अन्य स्थानों के अकादमिक और उत्खनन अध्ययन में व्यस्त हो गयी थी। पर अयोध्या की प्राचीनता के प्रति जिज्ञासा जगाने का प्रारम्भिक कार्य तो उन्होने किया ही था! डा. सिंह के अनुसार डा. बीबी लाल ने भी अपने उत्खनन के पहले बी.एच.यू. के किये उत्खनन को भी स्वीकारा और उसके महत्व को ‘एक्नॉलेज’ किया है।

अब उपलब्ध साक्ष्य-सामग्री के आधार पर; मूल अयोध्या उत्खनन करने वालों के न होने की स्थिति में बी.एच.यू. के पुरातत्व और प्राचीन इतिहास विभाग के प्रमुख और डा. अशोक सिंह की टीम ने उस उत्खनन के पचास साल होने के समय विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का संकल्प किया है।

इस उत्खनन में अयोध्या के विस्तृत क्षेत्र के सांस्कृतिक सीक्वेंस को समझने के लिये बी.एच.यू. की टीम नें तीन स्थानों – जैन घाट, लक्ष्मण टेकरी और नल टीला – पर छोटे हिस्सों में खुदाई की थी।

इसके अलावा, जैसा कि इण्डियन ऑर्कियॉलॉजी रिव्यू 1969-70 की संक्षिप्त रिपोर्ट में कहा गया है, बी.एच.यू. की टीम ने अलेक्जेण्डर कनिंघम (1862-63 में भारत के ऑर्कियॉलॉजिकल सर्वेयर) द्वारा वर्णित कुबेर टीला क्षेत्र का भी अध्ययन किया था। आशा है उस अध्ययन पर भी अगले महीने बी.एच.यू. द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्ट प्रकाश डालेगी। डा. अशोक सिंह ने मुझे कनिंघम रिपोर्ट का अयोध्या का एक नक्शा भी भेजा है, जो नीचे प्रस्तुत है –

अलेक्जेण्डर कनिंघम का अजुध्या (अयोध्या) का नक्शा। इसमें घाघरा/सरयू का पुराना बहाव मार्ग देखा जा सकता है।

बी.एच.यू. के पुरातत्व विभाग ने अपने पुराने संग्रह से सभी उपयुक्त सामग्री चिन्हित कर एकत्र कर ली है। डा. अशोक कुमार सिंह कहना था कि वे लोग एक महीने में यह विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर लेंगे। राम मंदिर और अयोध्या इस काल खण्ड में जन मानस का प्रिय है। उस अवसर पर; वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उसके अनुसन्धान का जो पायोनियर कार्य किया था; उसे प्रतिष्ठित करना अपना अकादमिक दायित्व मानते हैं।

मैं तो पुरातत्व का ताजा ताजा जिज्ञासु भर हूं। अर्कियॉलॉजी का फुट-सोल्जर तक भी नहीं हूं। पर मुझे भी यह जान कर बी.एच.यू. की विस्तृत रिपोर्ट जानने की जिज्ञासा प्रबल हो गयी है। आशा है उनकी रिपोर्ट जल्दी ही तैयार हो जायेगी और उसके कुछ अंश मुझ जैसे को भी ज्ञात हो सकेंगे।


2 मचिया बन गये अंतत:

मचिया के फ्रेम से मेरी पत्नीजी को एक और रचनात्मक काम मिल गया। … मैं बार बार जा कर उन्हे तन्मयता से पेण्ट करते देखता रहा। बहुत कुछ ऐसा भाव था उनके मन में जैसे कोई महिला एक शिशु को दुलार रही हो।


मैंने राजबली विश्वकर्मा जी से मिल कर तय किया था कि वे दो मचिया के फ्रेम बनायेंगे।

अपने कहे के पक्के निकले राजबली जी। वे सोमवार को मुझे बना कर देने का वायदा किये थे, पर रविवार को ही उन्होने सूचना दी कि उनका काम पूरा हो गया है। मैंने जा कर देखा तो उनके बनाये फ्रेम को संतोषजनक पाया। उसी दिन शाम को उनका पोता ईश्वरचंद्र मेरे घर पर दोनो मचिये के फ्रेम दे गया। शायद उन्हे मेहनताना लेने की जल्दी थी। पर निश्चय ही, राजबली पहले वाले खाती भोला विश्वकर्मा से बेहतर – बहुत बेहतर साबित हुये। व्यक्ति के रूप में भी और कारीगरी के रूप में भी।

2 मचिया पूर्णत: बनने के बाद सेण्टर टेबल पर रखे हुये।

फ्रेम बनने के बाद हमें यकीन हो गया कि अब मचिया बन ही जायेंगे। अब मेरी पत्नीजी के मन में यही चलने लगा कि कैसे उत्कृष्ट मचिया बन सके। वे आजकल अपने बगीचे के साथ बहुत प्रयोग करती हैं। घर के बेकार प्लास्टिक के डिब्बे – बोतल काट कर उन पर पेण्ट कर कई खूबसूरत गमले उन्होने बनाये हैं। पेड़ पर पुराने जूते भी टांगें हैं कि कोई चिड़िया उसमें अपना घोंसला बना ले। कार के टायर बदलने के बाद पुराने टायर फैंके नहीं गये। उनके साथ भी मुड्ढ़ा, या सेण्टर टेबल या कोई हैंगिंग गमला बनने जा रहा है। इस सब करने में वे अपने को दिन भर व्यस्त रखती हैं।

मचिया के फ्रेम से उन्हे एक और रचनात्मक काम मिल गया। हम ह्वाइट प्राइमर, ब्राउन पेण्ट, तारपीन का तेल, सैण्डपेपर और ब्रश आदि ले कर आये। एक कागज पर मचिया का फ्रेम रख कर वे अकेले पोर्टिको में बैठ गयीं। मैं बार बार जा कर उन्हे तन्मयता से पेण्ट करते देखता रहा। बहुत कुछ ऐसा भाव था उनके मन में जैसे कोई महिला एक शिशु को दुलार रही हो।

सर्दी में ठण्डी हवा में बाहर पोर्टिको में बैठ मचिया पेण्ट करती रीता पाण्डेय

एक मचिये पर उन्होने पेण्ट किया। उसके बाद हमारे वाहन चालक अशोक को भी जोश आया। दूसरे पर अशोक ने पेण्ट किया। और बढ़िया काम किया उन्होने।

मचिया बीनने के लिये हमारे माली रामसेवक जी ने अपनी सेवायें दीं। उन्होने बताया कि वे चारपाई तो बुनते हैं, पर मचिया बीने बहुत अर्सा हो गया। अब मचिया का प्रचलन नहीं है तो बुनना भी नहीं होता। हम मचिया की जरूरत भर की मोटी सुतली महराजगंज बाजार से खरीद लाये। लोग आजकल सुतली का भी प्रयोग नहीं करते। इसलिये, सुतली मिल तो गयी, पर आशा से ज्यादा रेट लगा। खैर, प्रयोग करते समय एक अच्छी मचिया बनाना ध्येय था, कीमत नहीं! 😀

फ्रेम का पेण्ट कल तक सूख गया था। सवेरे बहुत कोहरा था। रामसेवक बनारस जाते हैं काम करने। घने कोहरे के कारण नहीं जा पाये। सो गांव में उनके पास समय था और दिन भर में उन्होने मचिया ही बुन डाले।

पहली मचिया अपने घर पर बुन कर रामसेवक लाये तो मन मुग्ध हो गया।

बहुत सुंदर मचिया की बुनावट थी रामसेवक की। मेरे मित्र गुन्नीलाल पांड़े, जो कल आये थे, ने देख कर कहा कि “मचिया खूब गझिन बुनी है। आम तौर पर इतनी बढ़िया बुनावट देखने में नहीं आती। पहले कभी कदा कोई ऐसी बुनता था। अब तो कोई बुनता भी है तो सीधी सपाट बुनाई करता है। आपके बुनने वाले ने शानदार काम किया है।”

गुन्नी पांड़े, जो पूरी जिंदगी गांव में रहे हैं, अगर ऐसा कहते हैं तो मचिया की बुनावट वास्तव में उत्कृष्ट मानी जानी चाहिये। यही ध्येय मेरी पत्नीजी का था। इस ‘गझिन, तीन लेयर की बुनावट में’ सामान्य से दुगनी सुतली लगी। पर मचिया मजबूत बनी है।

रामसेवक मचिया बुनते हुये।

कल मचिया का चित्र ट्विटर पर पोस्ट किया तो सबसे पहले मेरी बिटिया वाणी ने कहा कि उसे यह चाहिये। उसे बताया गया कि यह तो रघुनाथ जी के लिये बनी है। अगली बार उसका नम्बर लगेगा।

रघुनाथ जी ने टिप्पणी की कि ऐसी ही मचिया की कल्पना उन्होने की थी – “रस्सी से बुनी हुई।” और उन्हे बेसब्री से इंतजार है मचिया का!

छतीसगढ़ से सुरभि तिवारी का कहना था – “वाव भैया मुझे ये बहुत पसंद है। आप, पास में होते तो मैं अपने लिए भी बनवाने का आग्रह करती।” भारतीय रेलवे के अधिकारी संतोष मिश्र जी ने कहा – “वाह, मजबूत और सुंदर। इस पर बैठ कर कौड़ा तापने का मजा आ जाएगा। मेरे लिए भी ऑर्डर करवा दीजिये।”

अब “ऑर्डर करवाने” का तो कोई विकल्प है ही नहीं। इसको बनाने में हम न केवल फेसिलिटेटर थे, वरन सक्रिय रूप से बनाने में जुटे भी थे। आगे भी अगर बनाना/बनवाना होगा तो मशक्कत हमें ही करनी होगी। 🙂

अभी रघुनाथ जी के लिये ये मचिए पैक कर कुरियर करना बाकी है। मौसम बहुत खराब है। कोहरा है और गलन भी। कुरियर करने में तो एक दो दिन लगेंगे। यह रघुनाथ जी को मैंने बताया। रघुनाथ जी का कहना है –

“Gyan ji you (people – my wife included) are facilitators. A very viable and trusted facilitator with offering them (the villagers) e-commerce arrangement. You are An aggregator of different craftsmen from your village who look up to you as patron. For instance, you have brought carpenter, thread seller, weaver, painter and courier together. This carpenter displayed keen interest in creating the frame in no time. The others you aggregated. If these segments get steady traffic on your trust equity, you could create earning opportunity for all of them.”

मैंने कभी इस कोण से सोचा नहीं था, जिसकी बात ऊपर रघुनाथ जी ने की है। मेरे विचार में था कि किसी भी प्रकार का बिजनेस करने या प्रोमोट करने में लोग यही सोचेंगे कि यह बंदा प्रॉफिट कमाने के लिये उद्यम कर रहा है! एक शुद्ध ब्यूरोक्रेट दिमाग में वह सोच जमती नहीं। सरकार अगर पेंशन न दे रही होती तो जरूर इस दिशा में सोच कर अब तक कुछ असफल/सफल प्रयास कर चुका होता। पर जो रघुनाथ जी कह रहे हैं; मैं गांव वालों को जीविका में कुछ वृद्धि करने की सम्भावनायें दे सकता हूं। उस दिशा में मुझे सोचना या प्रयास करना चाहिये।

फिलहाल तो मचिया देख कर आनंदित हो रहे हैं मेरी पत्नीजी और मैं। आशा है चित्र में आपको भी अच्छे लग रहे होंगे, मचिये!


जेठ की तेज बारिश और मठल्लू यादव की मड़ई

लौटते समय मैं सोच रहा था – चालीस साल इस तरह के अनुभव कभी नहीं हुये। सवेरे साइकिल भ्रमण। बारिश में फंसना। मड़ई में शरण और एक किसान से इस तरह मुलाकात/बातचीत! कितने अफसर यह अनुभव ले पाते होंगे? नौकरी में या उसके बाद।


परसों और कल तापमान 46 डिग्री तक था। कल तो उमस भी थी और लेटने पर बिस्तर मानो जल रहा था। आधी रात में हवा चली और आज सवेरे पांच बजे जब साइकिल-सैर के लिये तैयार हो रहा था तो हल्की बारिश थी।

चार किलोमीटर बटोही के साथ चलने पर जब अगियाबीर टीले की तलहटी में गंगा तट पर पंहुचा, तब भी यह अन्देशा नहीं था कि इतनी तेज बारिश होगी।

आसमान बादलों से भरा जरूर था, पर लगता था कि तेज पुरवाई बहेगी और उन्हें उड़ा ले जायेगी। पर अचानक हवा का रुख बदला। तेज पुरवाई पछुआ में तब्दील हो गयी। और लाई तेज/घनी बारिश।

अगियाबीर में गंगा किनारे यह दृष्य था। बादल घिरे थे। हवा चंचल थी। यदाकदा बिजली चमक जाती थी।

हम (राजन भाई और मै) ने टीले के खड़ंजे के किनारे साइकिलें खड़ी कर दीं। पेड़ के नीचे खड़े हो गये। तब भी आशा थी कि बारिश रुक जायेगी। वह बढ़ती ही गयी। मुझे अपने से ज्यादा अपने कैमरे और मोबाइल की फिक्र होने लगी। अगर उनमें पानी चला गया और वे खराब हो गये तो 20-25 हजार का चूना लग जायेगा। एक क्षण मैने निर्णय लिया – यह नहीं देखा कि राजन भाई कहां खड़े हैं; बटोही को बबूल के तने के साथ अधलेटा किया; अपना कैमरे/मोबाइल का थैला लिया और टीले पर तेजी से चढ़ गया। सामने एक मड़ई थी। एक औरत उसमें अपना सामान रख रही थी। उसे कहा कि कुछ देर मड़ई में रुकूंगा मैं। चिरौरी वाले अंदाज में कहता तो सम्भावना (भले ही बहुत कम) थी कि वह मना कर देती। अत: लगभग निश्चयात्मक अंदाज में मैने कहा।

मठल्लू की मड़ई।
मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – ये लोग अमीर हैं। इन्हे काम करने की जरूरत नहीं। अपने आनन्द के लिये टहल-घूम रहे हैं। मठल्लू के लिये हम अमीर थे (उनके यह कहने में कोई व्यंग नहीं था)।

खैर, उस महिला ने बिना झिझक मुझे आने दिया। मड़ई छोटी थी। दो खाट की जगह। पांच लोग उसमें थे। छठा मैं। किसान (नाम पता चला – मठल्लू यादव) ने अपने लड़के को भेजा, राजन भाई को ढूंढ कर लिवा लाने को। करीब दस-पन्द्रह मिनट हम वहां रुके, जब तक बारिश तेज रही।

मठल्लू मेरी उम्र के निकले। मैने बताया कि रेलवे में नौकरी करता था मैं और रिटायर हो कर गंगा किनारे गांव-देस देख रहा हूं। राजन भाई ने भी बताया कि वे कालीन के एक्स्पोर्ट का काम करते थे।

मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – मठल्लू ने अपने नाती को हमारे बारे में अपनी ओर से बताया – ए पचे अमीर हयें। एनके काम करई क जरूरत नाहीं बा। मजे के लिये घूमत-टहरत हयें (ये लोग अमीर हैं। इन्हे काम करने की जरूरत नहीं। अपने आनन्द के लिये टहल-घूम रहे हैं।)

मठल्लू यादव और छबीले। मड़ई के अन्दर।

मठल्लू के लिये हम अमीर थे (उनके यह कहने में कोई व्यंग नहीं था)। हमारे लिये टाटा-बिड़ला-अम्बानी-अडानी अमीर हैं। दूसरे, यह भी नहीं है कि अमीर को काम नहीं करना पड़ता। इन अमीरों को दिन में 10-12 घण्टे काम तो करना ही पड़ता है। रतन टाटा तो पचहत्तर के होने पर भी रोज साइरस मिस्त्री से तलवार भांजने को बाध्य हैं! … एक बार मुझे लगा कि मैं मठल्लू का प्रतिवाद करूं। कहूं कि चालीस साल बहुत खटा हूं काम करते करते। अब भी पढना-लिखना अगर काम हो तो दिन में 5 घण्टे तो कर ही रहा हूं। पर कुछ सोच चुप रह गया। इस मड़ई में बैठे किसान से क्या प्रतिवाद करूं? न वे मेरा काम समझ सकते हैं, न मैं उनका।

पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। “आपके बड़ी जातियों में आज से चालीस साल पहले लड़के इस लिये पढ़ाये जाते थे कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती थी। अब लड़कियां इसलिये पढ़ाई जाती हैं कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती।”

मठल्लू का नाती था छबीले। दर्जा सात में पढ़ता है गडौली के सरकारी स्कूल में। बहुत बढ़िया नहीं है पढ़ने में। उसका फोटो खींचा मैने तो वह तन गया। मैने कहा – जरा हंस कर फोटो खिंचाओ। सो दूसरी बार खींचा। फोटो खींचते ही उसे देखने की जिज्ञासा हुई। सो दिखाये भी।

प्रीति, मठल्लू की नातिन। तीसरी कक्षा में पढ़ती है। घर का काम भी करती है।

नातिन थी प्रीति। तीसरी क्लास में पढ़ती है। मठल्लू ने बताया कि पठने में ठीक ही है। वर्ना उसे घर का काम करना होता है।

पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। पढ़ने की आवश्यकता पर उन्होने एक बात कही। “आपके बड़ी जातियों में आज से चालीस साल पहले लड़के इस लिये पढ़ाये जाते थे कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती थी। अब लड़कियां इसलिये पढ़ाई जाती हैं कि बिना पढ़े उनकी शादी नहीं हो सकती।”

गांव के परिवेश के लिये यह मुझे बहुत गूढ़ वक्तव्य लगा। शिक्षा का मूल ध्येय रोजगार या जागरूकता नहीं, शादी हो या न हो पाना है!

हम अमीर शायद नहीं हैं; पर मठल्लू गरीब हैं। थोड़ी खेती है और कुछ गोरू। अरहर होती है इस टीले पर। इसलिये कि टीले पर बारिश का पानी रुकता नहीं। सब्जी नहीं उगाते वे। मैने पूछा – मक्का नहीं उगाते? “नहीं। नीलगाय मक्का बरबाद कर देती है। इसके अलावा साही भी हैं। वे पहले पेड़ को खोद कर तोड़ देते हैं, उसके बाद मक्का के नरम दाने खा जाते हैं। टीले पर सियार भी हैं। दिन में भी घूमते हैं। मक्के को बरबाद करना उन्हे भी पसन्द है।”

एक लड़का बम्बई गया है रोजगार के लिये; मठल्लू ने बताया।

पानी का बरसना कुछ कम हुआ था। हमने रिस्क लिया निकल चलने का। मठल्लू के लडके/नाती लोग – कुलदीप और छबीले पेड़ के नीचे लिटाई हमारी साइकलें ले आये। कुलदीप ने हमें सहारा दिया ताकि गीली मिट्टी में बिना फिसले टीले की ढलान उतर सकें। हमने उन सब का धन्यवाद किया और मैने दोनो से हाथ मिलाया। उनका घर ऐसी जगह पर है कि नदी किनारे जाते समय उनके घर पर कभी न कभी रुकूंगा जरूर।

लौटते समय मैं सोच रहा था – चालीस साल इस तरह के अनुभव कभी नहीं हुये। सवेरे साइकिल भ्रमण। बारिश में फंसना। मड़ई में शरण और एक किसान से इस तरह मुलाकात/बातचीत! कितने अफसर यह अनुभव ले पाते होंगे? नौकरी में या उसके बाद।

लौटते समय मठल्लू यादव जी की मड़ई को एक बार फिर निहार कर देखा मैने।

यह फेसबुक नोट्स से ब्लॉग पर सहेजी पोस्ट है। फेसबुक ने अपने नोट्स को फेज आउट कर दिया, इसलिये पोस्ट्स वहां से हटा कर यहांं रखनी पड़ीं। नोट्स में यह पोस्ट जून 2017 की है।


छोटी मछली से बड़ी पकड़ने की तकनीक

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।


रास्ता ट्रेक्टर के गंगा तट पर बालू की (अवैध) ढुलाई लिये बना था। नयी सरकार के आने के बाद यह सुनिश्चित करने के लिये कि बालू की ढुलाई न हो सके, रास्ते को काट दिया गया था उस पर आड़ी खाई बना कर। उस खाई के साइड से अपनी मोटर साइकिल लाते हुये वे तीन नौजवान गंगा तट की ओर बढ़े। जितनी तेजी दिखा रहे थे, उससे हमें (राजन भाई और मुझे) यह लगा कि वे कहीं कोई अवैध काम न करने जा रहे हों गंगा तट पर।

गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

हम दोनो उनके पीछे पीछे गये। सतर्क मुद्रा में। पर वे मात्र मछली पकड़ने वाले निकले। मछली पकड़ना तो ठीक, पर उसके लिये जो तकनीक प्रयोग में ला रहे थे, वह मैने पहले नहीं देखी थी। अपने 65 साल के जीवन में राजन भाई ने भी नहीं देखी थी।

प्लास्टिक की बोतल में पानी में रखी सऊरी मछलियां दिखाता व्यक्ति।
गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

एक बोतल में चारे के रूप में पानी भर कर उसमें जिन्दा मछलियां ले कर आये थे। छोटी मछलियां जो उन्होने अपने गांव के तालाब से पकड़ी थीं। उन मछलियों का नाम बताया – सऊरी। सऊरी को कांटे में फंसाया। कांटा एक लम्बी नायलोन के तार से बंधा था। तार उन्होने बांस की दो खप्पच्चियों से बांध दिया था और खपच्चियां गंगा किनारे गाड़ दी थीं। किनारे पंहुच बड़ी फुर्ती से किया था यह काम उन्होने।

16 नवम्बर 2017 की फेसबुक नोट्स पर पोस्ट। फेसबुक की नोट्स को फेज आउट करने की पॉलिसी के कारण ब्लॉग पर सहेजी गयी है।

Fishing
मेरे सामने सऊरी को बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी।

मेरे सामने कांटे में फंसाई सऊरी को उनमें से एक ने बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी। उसके नदी में तैरने के अनुसार तार हिलने लगा। बस अब इन लोगों का काम तार में असाधारण गति का इन्तजार करना था जो यह बताती कि बड़ी मछली सऊरी को खाने के चक्कर में कांटे में फंस गयी है।

बांस की गाड़ी खपच्चियों से बंधा तार। दायें कोने में खड़े हैं राजन भाई।

सिंपल तकनीक।

उन लोगों से मैने बात प्रारम्भ की। वे महराजगंज (5किमी) के पास कल्लू की पाही गांव से आ रहे थे। सवेरे छ बजे घर से निकले। अब सात बजने को था। दो घंटा मछली पकड़ेंगे। बहुधा आते हैं। कभी मछली नहीं भी मिलती।

कौन मछली पकड़ेंगे?

जो मिल जाये! जैसे पहिना।

दूर गंगा में विष्णु अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

दूर गंगा में विष्णू अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

अर्थात ये लोग न केवल मछली पकड़ने निकले थे, अगर मल्लाह से मछली मिल जाये तो खरीदने का इरादा भी रखते थे। विष्णु ने जवाब दिया – “नहीं, आज मछली मिली ही नहीं।”

वह, मछली न मिलने के कारण एक बार और जाल बिछाने के उद्यम में लगा था। मुझे भी उस पार घुमा कर लाने से मना कर दिया उसने – जाल बिछाना ज्यादा महत्वपूर्ण था इस समय उसके लिये।

गंगा यहां गहरी हैं कि नहीं? कितना पानी है? इन लोगों ने विष्णु से पूछा।

“गहरी हैं करीब एक लग्गी” (8-10फुट)।

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।

कोई उम्र ऐसी नहीं होती जब आपको नयी जानकारी न मिले। अपने परिवेश में इतना बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते। मैं तो क्या, राजन भाई भी नहीं जानते थे कि सऊरी मछली से पहिना पकड़ी जाती है, करारी नदी के किनारे से!

आपको मालुम था?


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