कैस्टर और मस्टर्ड


मस्टर्ड (सरसों) उन छात्रों को कहा जाता था, जो हिंदी माध्यम से पढ़े, छोटे शहरों या कस्बों के होते थे। उनकी पृष्ठभूमि निम्न मध्यवर्ग की होती थी। अंग्रेजी में बोलना उन्हें नहीं आता था।…लड़कियों से बोलने बतियाने की कोई आदत नहीं थी। मैं मस्टर्ड था।

सपने में सिर काटई कोई


ऐसा नहीं कि चोरी-उचक्कई-जहरखुरानी आदि होती नहीं हैं। पर उनके प्रति मुझमें सेंसिटिविटी का अभाव जरूर था। मुझे याद है कि रेलवे में हो रही जहरखुरानी पर मीटिंगों में चर्चा के दौरान जब बाकी सभी अधिकारी तत्मयता से उसमें भाग लेते थे; मैं उबासी लिया करता था।

रेल के यार्डों में घूमते हुये


एकाकी जीवन, यार्ड में सीखने के लिये की गयी मेहनत और भोजन का कोई मुकम्मल इंतजाम न होना – यह सब खिन्नता देता था। आगरा मुझे अपनी भीड़ और गंदगी के कारण कभी पसंद नहीं आया। पर इन सब के बावजूद मैंने अपनी ट्रेनिग को बहुत गम्भीरता से लिया।

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