सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली की साइकिल पर चलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि खेतों की हवा खुद रास्ता बनाती है, और हम बस उसके साथ बहते हैं। मकर-संक्रांति की गंवई भीड़, गंगा का मंथर बहाव, स्नानार्थियों और मेले की आवाजें—सब पीछे छूटते जा रहे थे। आगे सिर्फ सन्नाटा और सरसों-गेंहू के खेत थे।
इसी शांति में, पतली सड़क पर, अचानक एक आकृति दिखी—एक युवक, पतला-सा, धूप की तरफ आंखें तिरछी करके चलता हुआ। सिर पर सफेद गमछा लिपटा हुआ, जैसे गांव का ताज हो। शरीर पर पुरानी धारियों वाली स्वेटर। हाथ में उसकी साइकिल—वही सदाबहार भारतीय साइकिल, जो जितनी पुरानी होती है उतनी ही विश्वसनीय लगती है।

वह मुझे देख रहा था—पर एक साधारण नजर की तरह नहीं। उसकी आंखों में ऐसी चमक थी, जैसे कोई बच्चा पहली बार किसी खिलौने में बिजली की चिनगारी देख ले। जब मैं पास पहुंचा, तो उसने “एSS एSS” जैसी ध्वनि निकाली—एक अनगढ़, लेकिन बेहद सच्ची पुकार। यही वह क्षण था जब समझ में आया कि वह मूक-बधिर है, और अपनी दुनिया की भाषा में मुझसे बातें करना चाहता है।
मैंने धीरे से साइकिल की रफ्तार कम की। वह अपनी साइकिल को लगभग दौड़ाते हुए मेरे पीछे आने लगा। उसकी आवाजें उस खुले मैदान में गूंज नहीं रहीं थीं, पर मेरे भीतर जरूर असर डाल रही थीं। उसकी आंखों में एक सीधी, साफ, बिना किसी हिचकिचाहट वाली उत्सुकता थी—एक ऐसा भाव जो आजकल लोगों के चेहरों पर कम ही दिखता है।
मैंने साइकिल रोक दी। वह भी पास आकर खड़ा हो गया। हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन उस पल के आसपास एक अजीब गर्माहट पैदा हो गई थी—मानो धूप की एक किरण हमारे बीच उतर आई हो। इशारे से वह मेरी साइकिल के बारे में कौतूहल जता रहा था।
मैंने हाथ से साइकिल की बैटरी की तरफ इशारा किया। फिर पीछे झुककर मोटर दिखाई। उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक उजाला फैलता गया, जैसे किसी ने भीतर से बल्ब जला दिया हो। उसने तुरंत अपनी उंगलियों से थ्रॉटल की मुद्रा बनाई—क्या यह ऐसा चलता है? मैंने सिर हिलाया। वह मुस्कुराया—बिना आवाज के, लेकिन इतनी चौड़ी मुस्कान कि लगा जैसे पूरा खेत उसके साथ मुस्कुरा रहा है।

फिर उसने थम्ब्स-अप दिखाया। उसकी उंगलियां गोल होकर हवा में एक छोटा-सा चक्र बना गयीं—“बहुत बढ़िया”, “टॉप क्लास”, “कमाल की चीज”—इन तीनों का मिला-जुला अर्थ उसमें था। उसकी खुशी बिल्कुल कच्चे गन्ने के रस जैसी थी—सीधी, मीठी और बिना किसी मिलावट के।
मैंने हल्का-सा थ्रॉटल घुमाकर साइकिल को कुछ मीटर आगे ले गया—थोड़ा तेज, ताकि उसे दिखे कि बिजली वाली साइकिल चलना सिर्फ चलना नहीं, एक अलग-सी उड़ान है। पीछे मुड़कर देखा, तो वह अब भी वहीं खड़ा था—हवा में थम्ब्स-अप दिखाते हुए। उसकी आंखों में इतने सहज भाव थे कि वह दृश्य सीधे दिल में उतर गया।
मैं आगे बढ़ता गया, पर मन बार-बार पीछे ही लौटता रहा। रास्ता वही था, सूरज वही, हवा वही—लेकिन मैं जैसे किसी गहरी सीख के साथ लौट रहा था। मन में शब्द घुमड़ रहे थे – क्या लिखूंगा इस अनकही बातचीत के बारे में?
उस छोटी-सी मुलाकात ने पहली बार यह महसूस कराया कि संवाद सिर्फ शब्दों से नहीं होता। कभी-कभी वह आंखों में होता है, उंगलियों की हलचल में, चेहरे की एक मुस्कान में, या किसी साधारण-सी “एSS एSS” ध्वनि में। दुनिया में आवाजें बहुत हैं, पर अनुभव ने बताया कि सबसे सच्चा संवाद चुप्पियों की भाषा में होता है।
मुझे लगा—हमें मूक-बधिर लोगों की भाषा, उनके संकेत, उनकी दुनिया की बुनावट—थोड़ी-बहुत जरूर सीखनी चाहिए। ताकि अगली बार ऐसा कोई युवक सड़क पर मिले, तो हम सिर्फ मुस्कुरा कर न निकल जाएं, बल्कि उसके साथ दो कदम चल सकें, उसकी खुशी में शामिल हो सकें।
द्वारिकापुर घाट की भीड़, संक्रांति का सूरज, खेतों की हरियाली—सब उस मुलाकात की गर्माहट में कुछ और ही रंग ले बैठे। और उस युवक की चमकती आंखें—वह तो अब भी मेरे भीतर कहीं बैठी हैं, जैसे कोई छोटा-सा दीपक, जो बताता रहता है कि इंसानियत आवाजों पर नहीं, संवेदनाओं पर चलती है।
पता नहीं उस नौजवान का नाम क्या था? अगर मैं उसका नाम पूछता भी तो कैसे, और वह बताता भी तो कैसे?
