केवड़ारी से केदारपुर
अप्रेल अंत — मई 2026
29 अप्रेल 2026
महीना भर हो गया है दंड भरते प्रेमसागर को। नक्शे पर दूरी जोड़ी जाये तो कच्ची-पक्की सड़कों, पगडंडियों, गाँवों-जंगलों से गुजरते पैंतालीस किलोमीटर नाप लिये हैं — दंड भरते। पच्चीस हजार से ज्यादा दंड। उनकी मानी जाये तो वे इससे दुगना नाप चुके हैं, पर नक्शे की गणना इतनी गलत नहीं हो सकती।
शुरुआती समय और गर्मी का मौसम — रफ्तार कुछ कम रही। अभी तो जेठ तप रहा है। कालिदास के मेघदूत जब अमरकंटक से उज्जैयिनी की ओर बढ़ेंगे — तब तेजी आयेगी। ऐसा प्रेमसागर का कहना है। बोलते हैं — “भईया, जब सड़क का डामर ठंडा होता है तो ज्यादा दंड भरा जाता है।”
भाषा भी अजीब है। गेहूँ नहीं पिसाया जाता — आटा पिसाया जाता है चक्की पर। उसी तरह शरीर को दंड की तरह धरती पर गिराया नहीं जाता — दंड भरा जाता है। इसमें भरने की क्या बात हुई भला? पर कहा जो जाता है, वही सही है।
शाम कल केवड़ारी के शिक्षक धनलाल केवलराम जी के घर डेरा लगा। आठ साल पहले रिटायर हुए। हरे रंग की गंजी पहने थे। रात के अँधेरे में चित्र साफ नहीं आता, पर अपनी पोती को साथ लेकर फोटो खिंचाया। घर साधारण — दीवार पर टंगे कपड़े, लोहे का संदूक, घरेलू सामान। पर दिल के धनी होंगे धनलाल जी। प्रेमसागर दिल के धनी को खोज ही लेते हैं।
आगे कुकरा गाँव पड़ा। वहाँ के डॉक्टर विकास सरकार ने सड़क पर उठते-लेटते प्रेमसागर को देखा होगा। घर बुलाया, चाय पिलाई।
विकास बंगाली हैं — कलकत्ते के। उनके बाप-दादा यहाँ आ कर बसे होंगे। चाँदसी दवाखाने के बंगाली डॉक्टर उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों के साथ भारत भर में फैले। आज कलकत्ते में चुनाव था। पूछने पर बोले — “लोग दीदी से ऊब गये हैं, इस बार हार जाएँगी।” तीन पीढ़ी पहले नर्मदा किनारे आया बंगाली कलकत्ते की खोज-खबर रखता है। वह चाँद पर भी चला जाये, कलकत्ते का हाल जरूर लेगा।
प्रेमसागर ने इलाके के भूगोल की जानकारी दी — पानी की कमी है इलाके में। गाँव में कुआँ है तो दूर-दूर से लोग पानी भरने आते हैं। बरगी बाँध बना, नर्मदा झील बनी — पर बरगी का ड्रेगन उसी क्रूरता से आग उगलता है। बाँध के डूब से थोड़ी ही दूर पानी की कमी है।
30 अप्रेल 2026
कल ज्यादा दंड नहीं भरा जा सका। असहनीय दर्द होने लगा। प्रेमसागर उठ नहीं पाये — दाएँ घुटने ने साफ विद्रोह कर दिया।
यह देह का अति-दोहन है या उम्र की आहट?
सवेरे साढ़े पाँच बजे केवड़ारी से यात्रा शुरू की थी। कुकरा में डॉक्टर विकास सरकार ने चाय पिलाई — पर थोड़ी ही देर बाद उन्हीं के यहाँ लंगड़ाते हुए वापस लौटना पड़ा। दिन उन्हीं के यहाँ आराम करते गुजरा।
रात नौ बजे दंड-यात्री से बातचीत हुई। उन्होंने अपनी विपदा बताई। यह भी कहा — “कल सवेरे फिर निकलेंगे।”
सवेरे विकास सरकार अपना आकलन दे रहे थे कि बंगाल में सरकार बदलेगी। शाम को एग्जिट पोल भी वैसा ही बता रहे हैं। पता नहीं, डॉक्टर साहब अब क्या सोच रहे होंगे — प्रेमसागर के यूँ लौट आने को कैसे लिया होगा? सवेरे किसी को चाय पिलाना और शाम को उसके लिए रात गुजारने का इंतजाम करना — दो अलग तरह की बातें हैं।
वैसे प्रेमसागर अच्छे नेटवर्कर हैं। उन्होंने एक सम्बन्ध खोज लिया — सरकार जी की बिटिया और प्रवीण भईया का बेटा, दोनों इंदौर में एक ही क्लास में साथ कोचिंग पढ़े हैं। एक पुराना परिचय, एक नया संयोग — इतना काफी था कि रात कट जाए। यायावर ऐसे ही चलते हैं — लोगों के सहारे, और थोड़ी-सी जुगत के भरोसे।
01 मई 2026
रात प्रेमसागर की डॉक्टर विकास सरकार जी के यहाँ अच्छी कटी। सवेरे दण्ड-परिक्रमा पर निकलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मौसम ने भी साथ दिया — धूप निकली पर ताप कम रहा। दण्ड ज्यादा भरा गया।
मंडला से दण्ड-यात्रा के दो अलग-अलग अंश प्रेमसागर बताते हैं — मंडला से घाघा तक गाँवों में कबीरपंथी अधिक हैं। उनका नर्मदा-परिक्रमा में सेवा-भाव उतना नहीं दिखता। उसके बाद जंगल आते हैं, फिर ये गाँव — जो नर्मदा तट से थोड़ा दूर हैं, पर लोगों में सेवा-भाव भरपूर है।
लोग खुद ही चले आते हैं — कोई चाय लेकर, कोई पानी, कोई शर्बत, कोई बस साथ देने। कई लोग अपने छोटे बच्चों को भी साथ लाते हैं — उन्हें दिखाने कि ये परिकम्मावासी हैं, इनकी सेवा करनी चाहिए। दण्ड-यात्री अपने नियम से बँधा रहता है — कहीं जा नहीं सकता। इसलिए गाँव वाले ही उसके पास आ जाते हैं। यह सिर्फ मदद भर नहीं है — यही वह तरीका है जिससे एक पीढ़ी अगली को सिखाती है कि नर्मदा-परिक्रमा क्या होती है।
जीवन अग्रवाला जी के यहाँ रुकना तय था, पर डॉक्टर विकास सरकार आए और आग्रह कर अपने साथ ले गए — “मेरी पत्नी ने आपका भोजन घर पर बना लिया है, आज वहीं चलिए।” दण्ड-परिकम्मावासी को दो लोग अपने-अपने यहाँ रुकने के लिए खींचें — यह अतिथेय-परम्परा की प्रगाढ़ता का ही संकेत है। नर्मदा की कृपा।
डॉक्टर साहब के यहाँ बच्चों की पढ़ाई को लेकर जो गंभीरता दिखती है, वह गाँव की नहीं, मध्यवर्ग की सोच है। बिटिया यूपीएससी की तैयारी में इंदौर में कोचिंग कर रही है। उनकी पत्नी कलकत्ते की हैं — बांग्ला भद्रलोक के संस्कार घर में दिखते हैं।
पूरी दण्ड-यात्रा में जुड़ते लोग हैं, आतिथ्य भरपूर है — पर नर्मदा नहीं दिखतीं। पाँच किलोमीटर उत्तर में धारा है, पर उस पर बरगी के ड्रेगन की पूँछ का ठहरा जल फैला है।
कल उसी ड्रेगन ने आग उगली — बरगी डैम के पास सैलानियों से भरा एक क्रूज उलट गया। उनतालीस लोग थे — नौ शव निकाले जा चुके थे, कुछ अब भी लापता।
रात में प्रेमसागर से बात हुई। वे इस हादसे से बेखबर थे। मैंने भी नहीं बताया।
क्यों नहीं बताया — यह सोचता हूँ तो लगता है, कुछ खबरें यात्री तक नहीं पहुँचानी चाहिए। जो आदमी अगले दिन फिर उठकर दंड भरने निकलेगा, उसे उस रात बरगी के डूबे हुए लोगों का बोझ क्यों दूँ? आर्मचेयर पर बैठे मुझमें यह विलासिता सहज है — दुख पढ़ने की, सोचने की। दंड भरते यात्री को नहीं।
दण्ड-यात्री अपनी धुन में चले — वही ठीक है। अपने घुटने का दर्द थामे। बरगी के ड्रेगन से उसका क्या लेना-देना?
02 मई 2026
कुकरा के आगे केदारपुर। वन विभाग के विश्राम गृह में दण्ड-यात्रा ने पड़ाव डाला। प्रेमसागर यहाँ के रास्तों के पुराने पदयात्री हैं, इसलिए सहूलियत और परिचय दोनों सहज मिल जाते हैं।
यह रेस्ट हाउस सन् 1932 की विरासती वास्तुकला को आज भी सहेजे हुए है। 2013 के जीर्णोद्धार ने दीवारों को नई पुताई और छत को नई खपरैल दी है, पर साखू-सागौन का फर्नीचर आज भी उसी पुराने रुतबे के साथ चमकता है। शेल्फ पर अंग्रेज़ों के ज़माने के चीनी मिट्टी के टी-पॉट और पीतल के लैम्प अब गरिमापूर्ण सेवानिवृत्ति में हैं — न वह दौर रहा, न किरोसीन की वह सुलभता।
रेस्ट हाउस के केयरटेकर हैं सतीश यादव। उनके पिता और उनके बाबा भी इसी के केयरटेकर रहे। सतीश का बेटा वेद कुमार भी पूरी तत्परता से प्रेमसागर की सेवा करता है। वन विभाग की पीढ़ियों को जोड़े रहने की परम्परा कायम रहे।
रात ढली, तो आतिथ्य के रंगमंच पर एक और दृश्य उभरा। सुनील और जीवन अग्रवाल जी ने चूल्हे की आँच पर प्रेमसागर के लिए सोंधे ‘गाकड़’ तैयार किए। राख की गर्मी से एक-एक कर निकलते वे सुनहरे गाकड़ उस दिन की कठिन दण्ड-यात्रा की थकान का एकमात्र इलाज थे। प्रेमसागर का चेहरा खिल उठा — “आनंद आ गया भईया! बाहर से कड़े, अंदर से बिल्कुल नरम।”
मुझे तत्काल अमृतलाल वेगड़ जी की पंक्तियाँ याद हो आईं —
“गाकड़ प्रकृति है, रोटी संस्कृति है और पूड़ी विकृति।”
सन् 1932 के उस पुराने विश्राम गृह में गाकड़ का वह सादगी-भरा भोज पूरी तरह प्रकृति का सान्निध्य था। दण्ड-परिक्रमा में देह का भारी श्रम है, तो आत्मा के लिए प्रकृति का भरपूर पोषण भी।
03 मई 2026
कल शाम प्रेमसागर ने खबर दी — “आज दंड नहीं दे पाया। बुखार आ गया। साथ में पेट भी खराब।” वन विभाग के गोपाल सिंह जी ने कहा — जब तक तबियत न सुधरे, रेस्ट हाउस में आराम करें। डॉक्टर साहब भी आए।
डॉक्टर साहब ने दो दिन आराम करने की सलाह दी। प्रेमसागर पर ही निर्णय छोड़ा — “आपको दवाई दे रहा हूँ। ज्यादा कमजोरी लगे तो पानी भी चढ़ा दूँ?”
ऐसा कहने पर ज्यादातर ग्रामीण पानी चढ़वाने पर यकीन करते हैं। पानी चढ़ा तो ताकत आयेगी। बाद में कहने को कहानी बनती है — बड़ी जबरदस्त बीमारी थी, तीन बोतल पानी चढ़ा तो जान में जान आई। प्रेमसागर ने पानी नहीं चढ़वाया।
“आज तो भईया दंड की हाजरी भर कर वापस लौट आया। दो-एक दिन आराम कर निकलूंगा।”
नब्बे साल पुराने इस रेस्ट हाउस में कई अंग्रेज और देसी अफसर रहे होंगे। नर्मदा किनारे जा बैठे होंगे या मछलियाँ पकड़ी होंगी। पर क्या कभी ऐसी उलट खोपड़ी का दण्ड-परिक्रमा करता यात्री भी रुका होगा?
प्रेमसागर से ज्यादा उलट जीव तो वेगड़ जी थे। उनकी यात्रा में नियम बहुत कम थे; नर्मदा का सान्निध्य और आनंद बहुत अधिक। बीमार होने पर दंड की हाजरी जैसा कुछ नहीं — बस शांत बैठ शांतिनिकेतन की याद करते या स्केच बनाते।
जब उन्होंने यात्रा की (1977–80) तो बरगी का डूब उतना नहीं था, पर आशंका बन चुकी थी। उन्होंने एक जगह लिखा है —
“पद्मीघाट में एक अच्छा आश्रम है, रात वहाँ रहे। भोर होते ही चल दिये। पेड़ ऐसे काले दिख रहे थे, मानो झुलस गये हों। शाम को बखारी पहुँचे। गाँव के पटेल के यहाँ रहने को तो मिल गया, लेकिन पानी माँगा, तो उसने रस्सी-बालटी थमा दी और कुआँ बता दिया। पानी लेने गये तो रस्सी मुश्किल से बीच कुएँ तक पहुँची! पानी पाताल को चला गया था। पास की झोंपड़ी का ग्रामीण हमारी परेशानी समझ गया। अपनी रस्सी ले आया, दोनों को जोड़ा, तब पानी निकला।”
नर्मदा यात्रा में पास के गाँवों में पानी की कमी — आज का पर्यावरणीय अभिशाप नहीं, तब का भी था जब बरगी का ड्रेगन नहीं आया था। अब तो ड्रेगन और भी बदल रहा है आबो-हवा।
अच्छा है। आज दंड-यात्री बीमार है तो सौंदर्य की नदी नर्मदा को पढ़ने-खंगालने का समय मुझे मिल गया।
07 मई 2026
दो दिन प्रेमसागर ने आराम किया। एसडीओ साहब, गोपाल सिंह जी ने खूब खोज-खबर ली। संतोष अग्रवाल जी, उनकी पत्नी और बच्चे भी कई बार आए। डॉक्टर साहब को भी बुलाया। केयरटेकर सतीश यादव जी और परिवार तो बाबा जी की सेवा में लगे ही थे। इतने लोगों की सेवा-शुभकामना हो तो ठीक होना ही था।
एक दिन दंड की हाजरी भर कर ही लौट आए। हाजरी माने कान पकड़ तीन बार उठक-बैठक और एक-दो दंड। उससे ज्यादा नहीं। अगले दिन एक किलोमीटर, उसके अगले दिन दो किलोमीटर। अब आगे की यात्रा के लिए डेरा बदला जाएगा।
केदारपुर में वन उतने घने नहीं दिखते, पर इलाका हरा-भरा है। मकान कच्चे-पक्के हैं। कुछ पर खपरैल की छत, कुछ पर डिश एंटीना। सन् अस्सी में जब वेगड़ गुजरे होंगे तो हो सकता है जंगल रहा हो, घर इक्के-दुक्के रहे हों, किसी किसी जगह रेडियो।
अब वैसा अँधेरा नहीं बचा। लोग दिल्ली-बम्बई-कलकत्ता से जुड़े हैं। पर पुराना पूरी तरह गया कहाँ? प्रेमसागर कुछ ठीक हुए तो पास की साप्ताहिक हाट घूम आए।
केदारपुर का बुधवासरीय हाट

सब्जी-भाजी से लेकर बर्तन और सोना-चाँदी के आभूषण — सब मिलते हैं। लाई-चना-गट्टा, मिठाई, झाड़ू, मिट्टी के बर्तन — घड़ा, घरिया, पुरवा — सब है।
पीले तिरपालों के नीचे फैला हाट दूर से किसी अस्थायी नगर जैसा लगता है। दोपहर की धूल और शाम की रोशनी आपस में घुली रहती है। कहीं लाल मिर्च की बोरियाँ खुली हैं, कहीं धनिये और जीरे की गंध हवा में तैर रही है। एक तरफ तरकारी वाली औरतें जमीन पर बोरा बिछाए बैठी हैं; दूसरी तरफ ठठेरे अपनी पीतल-काँसे की थालियाँ ऐसे सजाए हैं जैसे धूप बेच रहे हों।
किसी दुकान पर बच्चा कटोरी बजा रहा है। कहीं बाट-तराजू की खनक है। कहीं बकरियों की मिमियाहट। कहीं आदमी दाम सुनकर मुस्कुरा रहा है, कहीं झुँझलाकर आगे बढ़ जा रहा है।
मिट्टी के घड़ों पर सफेद चूने से जो कलाकृति उकेरी है — देखते ही बनती है। काली मिट्टी के चमकदार पके मृद्भाण्ड तो कुषाण-कालीन कला के उत्कृष्ट नमूने लगते हैं। कुछ घड़ों पर बनी सफेद लहरदार रेखाएँ प्रेमसागर को नर्मदा की धारा जैसी लगी होंगी — जैसे किसी कुम्हार ने नदी को मिट्टी पर उतार दिया हो।
केदारपुर का हाट दो-तीन हजार साल पहले का भी है और आज का भी।
हाट में घूमते प्रेमसागर खरीदार नहीं थे। यही बात उन्हें बाकी भीड़ से अलग करती थी। लोग घर के लिए चीजें खरीद रहे थे — नमक, तेल, लोटा, चूड़ी, तरकारी, बच्चों के कपड़े। प्रेमसागर के पास रखने को कुछ था नहीं। उनकी पूरी गृहस्थी एक झोले में थी। वे बस धीरे-धीरे भीड़ के बीच से गुजरते रहे।
बाजार में हर चीज का भाव था; केवल उनकी यात्रा का कोई मोल नहीं था।
“भईया, सोना-चाँदी का गहना देखकर तो बहुत अचम्भा हुआ। फोटो लेना चाहता था सुनार की कलाकारी का, पर दुकान लगाने वाले ने मना कर दिया। कुम्हार और ठठेरों के फोटो ही ले पाया। पर था वहाँ सब कुछ।”
मुझे लगता है भारत की असली सभ्यता महानगरों से ज्यादा इन हाटों में बची है। यहाँ आदमी अभी भी चीज को हाथ में उठाकर परखता है। खरीदने से पहले बात करता है। दुकानदार ग्राहक का गाँव पूछता है। लेन-देन में मशीन से ज्यादा चेहरा काम आता है। यहाँ अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह निर्जीव नहीं हुई।
केदारपुर का बुधवासरीय हाट अमेजन और फ्लिपकार्ट से — और किसी भी मॉल से — कितना अलग है। जबकि हैं सब मौसेरे भाई ही।
दो दिन बारिश हुई। मौसम ठंडा हो गया। “हवा तेज थी भईया, बारिश भी खूब और ओले भी पड़े। दंड भरने के लिए अच्छा मौसम हो गया है।”
बारिश के बाद हाट की मिट्टी और भी गहरी महकती होगी। भीगे तिरपाल हवा में फड़फड़ाते होंगे। कहीं दुकानदार बोरी ढँक रहा होगा, कहीं औरत बच्चे को ओले दिखा रही होगी। प्रेमसागर शायद किसी छप्पर के नीचे खड़े यह सब देखते रहे हों। दण्ड-यात्रा में प्रकृति कभी शत्रु लगती है, कभी सहयात्री।
हर हाट शायद एक छोटा समय-द्वार है। वहाँ मोबाइल रिचार्ज भी है और वहीं मिट्टी का पुरवा भी। एक आदमी यूपीआई से पैसा दे रहा है, दूसरा मुट्ठी में सिक्के दबाए खड़ा है। एक लड़का कान में इयरफोन लगाए घूम रहा है और बगल में कोई बूढ़ा अभी भी धोती की गाँठ में नोट बाँधे है। भारत एक साथ कई सदियों में जीता है — यह बात हाट से ज्यादा कहीं साफ नहीं दिखती।
पर मुझ पैंट-कमीज धारी को कोई बाबा थोड़े ही समझता? मुझे तो हर सुविधा के पैसे देने होते। गेरुआ कपड़ा और माथे पर तिलक जो ठाठ देता है, वह मेरे नसीब में कहाँ!
केदारपुर का ठाँव पूरा हुआ है। कल से अगली जगह रहेंगे। आगे बरेली दिखता है नक्शे में — वहीं किसी नर्मदा-भक्त के यहाँ एक दिन का विश्राम तय हुआ है।
नर्मदा तट के दर्शन नहीं हो रहे, पर माई ध्यान रखती चल रही हैं।
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