गांव में आ कर शुरू शुरू में लगता था कि यहां वह सब नहीं होगा जिसकी शिकायत शहरों और राजनीति में की जाती है। कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट, उगाही — ये सब कहीं दूर की चीजें लगती थीं। गांव मानो बचपन में लौटने की जगह था।
शायद हम गांव को देखना नहीं, याद करना चाहते हैं। इसलिये बहुत कुछ दिखता नहीं।
मुझे गांव में रहते दस साल हो गये। शुरुआती महीनों में मैं भी उसी “अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है!” वाले रोमांटिसिज्म में था। धीरे धीरे वह परत उतरने लगी। फिर वे चीजें दिखने लगीं जो पहले दृश्य में थीं, पर दृष्टि में नहीं थीं।
किसी को आवास योजना दिलवाने में हिस्सा। शौचालय का पैसा निकलवाने में हिस्सा। सरकारी सामान बंटने में हिस्सा। गरीबों के मुफ्त राशन से कटौती। नाम अलग अलग हो सकते हैं, पर प्रकृति एक ही है। बंगाल उसे “कट मनी” कहता है। कहीं और उसका कोई दूसरा नाम है। यह सब दृष्टिगत होने लगा।
सार्वजनिक चीजों पर निजी दबंगई भी दिखती है; भरपूर। कहीं रास्ते पर कब्जा, कहीं तालाब पर, कहीं मिट्टी या बालू पर। गांव में यह सब और सहज हो जाता है, क्योंकि यहां शक्ति का प्रदर्शन ज्यादा प्रत्यक्ष है।
जब साइकिल ले कर निकलता हूं और पतली सड़क पर मिट्टी लादे ट्रैक्टर धूल उड़ाते निकल जाते हैं, तो वह केवल धूल नहीं लगती। उसके पीछे पूरा एक तंत्र दिखाई देने लगता है। ट्रैक्टर वाला अकेला नहीं है। उसके पीछे स्थानीय दबंगई, सरकारी तंत्र, छोटे बड़े नेता, अधिकारी — सबकी कोई न कोई परत जुड़ी महसूस होती है। शायद ऊपर तक।

धीरे धीरे समझ में आने लगा कि बंगाल या किसी एक प्रदेश की बदनामी दरअसल केवल डिग्री का अंतर है। प्रवृत्ति लगभग हर जगह मौजूद है। आधुनिक समाज का यह स्थायी तत्व सा लगता है — चाहे व्यवस्था लोकतंत्र कहलाये, तानाशाही या कुछ और।
फिर सवाल उठता है कि यह सब देखता आदमी क्या करे? सिस्टम से लड़े या आंख बंद कर ले? अपने रिटायरमेंट का सुकून बचाये रखे? या जो दिख रहा है, उसे दर्ज करे?
जिन लोगों के पास मजबूत कलम थी, उन्होंने दर्ज किया। व्यंग्य लिखा, उपन्यास लिखे, पात्र गढ़े। इसीलिये ‘रागदरबारी’ आज भी पढ़ी जाती है। वह केवल हंसाती नहीं, अपने समय के समाज की बनावट भी दिखाती है।
शायद वही काम छोटे स्तर पर ब्लॉग पोस्ट भी करती हैं। वे किसी व्यवस्था को बदलती हों या नहीं, पर समय का एक रिकॉर्ड जरूर छोड़ जाती हैं। बाद में कोई देखे तो उसे पता चले कि गांव केवल सरसों के खेत, पोखर और बैलगाड़ी भर नहीं था। उसके भीतर कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट और छोटे छोटे समझौते भी थे।
लगता है ये प्रवृत्तियाँ समाज के रक्तबीज हैं। नाम बदलते हैं, तरीके बदलते हैं, पर वे किसी न किसी रूप में फिर उग आती हैं। फर्क केवल इतना है कि कोई उन्हें देख कर चुप रह जाता है, कोई एक ब्लॉग पोस्ट लिखता है, और कोई ‘रागदरबारी’।
अपनी अपनी कलम की ताकत का मामला है।
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