घंसौर से आगे – नदी सौंदर्य दिखाती है, सड़क इंतजाम करती है
21 मई
मेरे हिसाब से प्रेमसागर को घंसौर से बरगी की ओर बढ़ना चाहिये था। नर्मदा उत्तर में हैं। पर वे पश्चिम की ओर निकल गये। सड़क की सहूलियत तय कर रही है — चलना किस दिशा में होगा।
आज लखनादोन रोड पर दो-ढाई किलोमीटर दंड भर कर आठ बजे ही रुक गये। डामर की सड़क सुबह से तपने लगी थी।
पूरे उत्तर भारत में लू बह रही है। मैं घर के बाहर नहीं निकल रहा — वातानुकूलित कार में भी नहीं। ऐसे में अलकतरे की काली सड़क पर लेट-लेट कर बढ़ना; दिन में दो किलोमीटर भी बहुत हैं।
तीन दिन घंसौर में रहना है — रामदीन चौकसे जी के यहाँ। भोजन के लिये लोग अपने-अपने घर बुला रहे हैं। आज रामगोपाल यादव जी के यहाँ जीमना हुआ।
रामदीन जी के बेटे सत्यम की राय है — बरगी की ओर रास्ता खराब है। गाँव दूर-दूर हैं। ठहरने और भोजन की दिक्कत होगी। लखनादोन की तरफ निकलना बेहतर है।
लखनादोन चालीस किलोमीटर दूर है। उसके आगे श्रीनगर-कन्याकुमारी हाईवे। सड़कों के रास्ते नरसिंहपुर पहुँचा जा सकेगा, पर पूरी यात्रा में नर्मदा तीस से साठ किलोमीटर दूर रहेंगी। बरगी का ड्रेगन उन्हें पास नहीं आने देगा। ग्वारीघाट, धुआँधार — सब बायपास।
नर्मदा की अठखेलियाँ, उनका उछलना-कूदना — इस यात्रा में नहीं होगा। यह शरीर के तप की यात्रा है; नर्मदा के सौंदर्य की नहीं।
मैं सोचता हूँ — यात्रा के असली साथी प्रेमसागर नहीं हैं। वे तो एक दूरबीन हैं; कभी साफ, कभी धुंधली, कभी गलत दिशा में फोकस करती हुई। असली पात्र तो रामदीन चौकसे, सत्यम और रामगोपाल यादव जैसे लोग हैं — जो अपने छोटे-छोटे इंतजामों से यात्रा को सम्भाले हुए हैं।
सत्यम की ऑनलाइन सेवाओं की दुकान है — फार्म भरना, खाता-खतौनी, आधार। उनके पिता रामदीन जी पशुओं और लोगों दोनों की चिकित्सा करते हैं। रामगोपाल यादव शिक्षक हैं।
“भईया लोग इतने संस्कारी हैं कि बाहर से घर पर कोई लड़की भी आ जाये तो उसके पैर छू कर प्रणाम करते हैं।” — प्रेमसागर ने कहा।
आज बालपुर तक दंड भरा गया। सी.एल. यादव जी — जो बी.एल.ओ. हैं — उन्हें वापस घंसौर ले आये। कल बालपुर में डेरे का इंतजाम भी उन्हीं ने किया है।
नदी सौंदर्य दिखाती है, सड़क इंतजाम करती चलती है। फिलहाल प्रेमसागर ने नदी नहीं, सड़क चुनी है।
22 मई
आज दंड भरते प्रेमसागर बालपुर के आगे निकल गये। दोपहर का विश्राम और भोजन छविलाल गोलानी जी के यहाँ हुआ। वे उप सरपंच हैं।
परिवार के लोगों ने उनका पैर धो कर पाँवपूजन किया। एक फोटो में बाबाजी सोफे पर बैठे हैं और चार लोग श्रद्धा से हाथ जोड़े खड़े हैं। ऊपर टांड पर देवी-देवताओं के शीशे जड़े फ्रेम। गाँव-अंचल के सरल जीवन का सीधा चित्र।
“भईया, इलाके के लोग बहुत सीधे लगते हैं। श्रद्धा बहुत है, पर अपने आसपास से आगे की जानकारी कम।” — प्रेमसागर बोले।
वे अपने पेट और हथेलियों का चित्र भेजते हैं। दंड भरने से पेट पर कालिमा पड़ गई है। हथेलियाँ गर्म सड़क से छिल कर लाल हो गई हैं।
लोगों की श्रद्धा का अर्जन शरीर को झुलसा कर ही सम्भव है।
शाम पाँच बजे वे फिर घंसौर में हैं — रामगोपाल यादव जी के घर। व्हाट्सऐप पर उनके पिता, मामाजी, पत्नी और नाती के साथ कई चित्र आते हैं। नाती छोटा है — साल भर का होगा। आँखों में काजल लगाया है। बड़ी-बड़ी आँखों वाला सुंदर बालक।
लगता है आधा दर्जन लोग विदाई देने जमा हैं। रामगोपाल जी अपने वाहन से उन्हें अगले पड़ाव तक छोड़ कर आयेंगे।
धीमे चलती दंड यात्रा में आगे और पीछे के लोग कई-कई दिन तक आते-जाते-मिलते रहते हैं। धीमी यात्रा में मानवीय जुड़ाव का गाढ़ापन बढ़ जाता है। लोग अपने लगने लगते हैं।
मजेदार है — दंड यात्रा में शरीर घिसना। उसके घर्षण से श्रद्धा की ऊष्मा पैदा करना और उस ऊष्मा से यात्रा की सुविधाएँ पकाना। श्रद्धा से भोजन, ठहराव, सहायता, साथ — सब निकलता है।
यात्रा केवल पैरों से नहीं चलती; वह दूसरों की भावनात्मक ऊर्जा पर भी चलती है। एक तरह की स्लो कुकिंग है यह। स्वाद धीरे-धीरे भीतर तक उतरता है।
23 मई
पचास दिन हो गये दंड भरते। रोज कितना आगे बढ़े होंगे?
सूर्यकुंड, मंडला से घंसौर के आगे बालपुर तक का रास्ता मैंने नक्शे पर ट्रेस किया। दूरी निकाली — कुल पचहत्तर किलोमीटर के आसपास। पाँच-सात किलोमीटर की कमी भी मान लें तो बयासी किलोमीटर।
औसत निकालें तो हर दिन लगभग नौ सौ-पचास दंड। रोज पौने दो किलोमीटर से कुछ कम। प्रेमसागर शायद तीन-चार किलोमीटर मान कर चलते होंगे। मैं गणना और आँकड़े की बात करता हूँ, वे श्रम और अनुमान की।
उनके पास छाले हैं, पेट पर कालिमा है और हथेलियों की ललाई है। मेरे पास नक्शा है, माउस है और मॉनीटर की स्क्रीन है।
स्क्रीन से यात्रा करता हूँ तो प्रेमसागर बालपुर के मिशन प्राथमिक शाला के पास से गुजरते नजर आते हैं। दंड भरते शायद स्कूल पर उनकी नजर भी न पड़ी हो।
नक्शे में स्कूल के दो साल पुराने चित्र और वीडियो चस्पाँ हैं। बच्चे घरेलू पोशाक में फिल्मी गीतों पर नाच रहे हैं। मास्टर साहब टाइट जीन पहने हैं। गाँव के भीतर शहर और सिनेमा दोनों प्रवेश कर चुके हैं।
प्रेमसागर को यह कहाँ दिखेगा — प्राइमरी का एक लमघोड़ा बच्चा शाहरुख खान के अंदाज में हाथ फैला कर नाच रहा है। गूगल का नक्शा भी कम यात्रा नहीं कराता।
दंड यात्रा में अनिश्चितता भी बहुत है। कल दिन में प्रेमसागर बालपुर में रात के डेरे की बात कर रहे थे। रात में उनका चित्र मिला कि वे ईश्वरपुर ग्वारी के किसी खपरैल वाले घर में हैं। बालपुर से थोड़ा आगे का गाँव।
खपरैल की ढलवाँ छत केवल सुंदर ही नहीं लगती — बाहर की गर्मी से दो-तीन डिग्री कम ताप वाली भी होगी। मोटी मिट्टी की दीवारें, चूने की पुताई, लकड़ी का भरपूर इस्तेमाल। आजकल के सीमेंट के बंद डिब्बेनुमा मकान क्या बराबरी करेंगे।
जैसे प्रेमसागर की यात्रा धीमी है, वैसे ही धीमे बदलते समय का अहसास भी ये मकान देते हैं। घास-फूस की झोंपड़ी से यह खपरैल वाला घर कितनी पीढ़ियों में विकसित हुआ होगा?
घर अकेला नहीं। छविलाल जी के पिता चार भाई हैं। चारों के घर आस-पास। बड़े पिताजी रिझनलाल सत्तर साल के हैं। बताते हैं — बारात गई-आई बैलगाड़ी पर थी। बाद में डीजल-पेट्रोल वाले वाहन आ गये, पर बैलों से खेती बारह साल पहले तक होती रही।
रिझनलाल जी अंतर बताते हैं — गरीबी बहुत थी पहले, अब साधन बढ़ गये हैं। मईया की परिक्रमा भी लोग झटपट वाहन से कर अपनी घर-गिरस्ती सम्भालना चाहते हैं। धीमी चाल से चलने वाले कम होते जा रहे हैं।
“धन्य भाग हमारे कि महराज जी आये हमारे यहाँ।”
मैंने जो भी कुछ उनसे पूछा, हामी में उन्होंने ‘हओजी’ कहा — ‘हाँ जी’ नहीं। इलाके की भाषा में यही प्रचलित है। रिझनलाल जी के पास अनुभव है, आकलन है और अपनी अलग सोच है।
24 मई
“भईया, नीचाई पर दंड भरना कठिन होता है। शरीर रपटता है। ऊँचाई बेहतर है।”
हजारों किलोमीटर की यात्रा एक-एक छोटी सुविधा-असुविधा नापते हुए ही पूरी होती है।
रात्रि विश्राम मेहता गाँव के रामकुमार शिवहरे जी के घर हुआ। दंड भरते प्रेमसागर उन्हें सड़क पर ही मिल गये थे।
“महराज जी, नया घर बन रहा है। एक दिन वहाँ भी रह कर आशीर्वाद दे दीजिये।”
छोटा परिवार है — रामकुमार, उनकी पत्नी, दो बच्चे और उम्रदराज पिताजी। पिताजी ने प्रेमसागर से शिकायत की —
“महराज, इस छोटे लड़के को समझाइये। पढ़ने में मन नहीं लगता। चुपके से ट्रैक्टर की चाभी ले गया और गड्ढे में पलटा दिया।”
बाबाजी का काम केवल दंड भरना नहीं, शिक्षा देना भी है।
मकान बड़ा है — सात कमरे, दो बरामदे। अपनी और बटाई की जोड़ कर रामकुमार जी चालीस एकड़ से अधिक खेती करते होंगे। दिन में रोटी-दाल-सब्जी थी। रात में पूरी, चावल और आम का गुरम्मा भी।
दंड भरने का प्रताप है। परिक्रमा में लोगों का वजन कम होता है — ऐसा सत्कार मिलता रहा तो कहीं बाबाजी का वजन बढ़ न जाये।
केवल भोजन ही नहीं; लोग फल भी बहुत लाते हैं। इतने कि अपने काम भर का रख कर प्रेमसागर बाकी बाँट देते हैं। खजूर दो-तीन किलो इकट्ठा हो गया है। सवेरे दो-तीन खजूर और केला लेकर दंड भरने निकलते हैं।
“कल तो भईया, औरतें अपने घर के बाहर झाड़ू-बुहार कर रही थीं। मुझे दंड भरता देख वे गमछे से मेरे आगे सड़क बुहारती आगे चलने लगीं। मैं फोटो लेना चाहता था, पर संकोच कर गया।” — प्रेमसागर
कहीं कोई नहीं मिलता था। पानी माँगने पर लोग केवल टंकी की ओर इशारा कर देते थे। और यहाँ लोग फ्रिज का ठंडा पानी, शरबत लेकर रास्ते में खड़े मिलते हैं। जगहों की अपनी प्रकृति होती है। अपने देवता। वे लोगों में अलग-अलग भाव जगाते हैं।
“कल मैं दंड भर रहा था और एक छोटी बच्ची दूर तक साथ-साथ चलती रही। हर आदमी, हर बच्चा अपने हिसाब से जुड़ाव का अहसास देता है। अच्छा लगता है भईया।” — प्रेमसागर
जुड़ाव अच्छा लगे तो ठीक, पर जुड़ाव में आसक्ति हो जाये तो बात बिगड़ती है।
यहाँ लोग बताते हैं — पाँच महीना पहले एक बाबाजी दंड भरते आ रहे थे। वे पूजा के लिये ढाई सेर दूध और डाला भर बेलपत्र-फूल माँगते थे। धीरे-धीरे लोग उनसे ऊब गये।
लोगों में श्रद्धा है; पर उसे जब रबर की तरह ताना जाये, तो वह टूट जाती है।
25 मई
मेहता बड़ा गाँव लगता है। नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर है। यहाँ पंचायत भवन में अन्नक्षेत्र चलता है। तीस-पैंतीस परकम्मावासियों के रहने और भोजन की व्यवस्था है।
कल शाम मेहता के दस-बारह लोग प्रेमसागर से मिले थे। आज सवेरे उनका सामान पंचायत भवन में ले आये। नर्मदा किनारे श्रद्धा अक्सर रसोई के धुएँ के रूप में दिखती है।
मोहनलाल जी नर्मदा सेवा समिति के अध्यक्ष हैं। अन्नक्षेत्र का प्रबंध देखते हैं। उन्होंने बताया कि यहाँ बहुत से लोग मूलतः महोबा इलाके से आये हैं।
बुंदेलखंड की कठिन जिंदगी की तुलना में हाईवे और नर्मदा किनारे का यह इलाका उन्हें बेहतर लगा होगा। मैं अपने पूर्वजों के बारे में सोचने लगता हूँ — वे भी तो सरयूपार से निकल कर गंगा किनारे प्रयाग जिले में आ बसे थे। किसी पुराने वैवाहिक सम्बन्ध, व्यापार या संकट ने किसी पूर्वज को महोबा से यहाँ ला कर बसा दिया होगा। अकाल खेत से पहले आदमी की जड़ें सुखाता है।
प्रेमसागर एक वाक्य फेंक कर आगे बढ़ जाते हैं और मैं उसके पीछे इतिहास की पगडंडी पर भटक जाता हूँ।
मेहता गाँव के पास एक तालाब है। अच्छा पक्का घाट बना है। पानी है — बहुत नहीं, पर इतना भी कम नहीं कि चिंता हो। जेठ की गर्मी में यदि यह स्थिति है तो बरसात के बाद लबालब भर जाता होगा।
पानी में थोड़ी जलकुम्भी दिखती है — जगह-जगह शरीर में खुजली की तरह। उसके बावजूद तालाब सुंदर लगता है।
बरसात में हर तालाब उदार लगता है, असली परीक्षा जेठ में होती है। और इस परीक्षा में यह तालाब अच्छे नंबर पाता लगता है।
प्रेमसागर ने बताया कि इस इलाके में शाम के समय भी दंड भरा जा रहा है।
“लखनादौन अब सत्ताईस किलोमीटर है नक्शे में भईया। वहाँ से लोग फोन करने लगे हैं।”
26 मई
मेहता से कहानी आठ किलोमीटर है। अभी वहाँ पहुँचने में दो दिन लगेंगे। तब तक प्रेमसागर पंचायत भवन के अन्नक्षेत्र में टिके हैं। लोग मिलने आते रहते हैं। शाम होते-होते सतसंग जम जाता है। कोई गाँव का इतिहास सुनाता है, कोई पुरानी कथा, कोई रास्ते की खबर।
उन्हीं लोगों ने बताया — महोबा से कई जातियों के लोग लगभग चार सौ साल पहले यहाँ आकर बसे थे। तब यह इलाका घने जंगल से भरा था। लोगों ने जंगल काटा, जमीन साफ की, रहने और खेती का इंतजाम बनाया।
“कुछ और जानकार लोग आयेंगे तो पक्के तौर पर कुछ पता चलेगा। पर इतना जरूर लगता है कि विस्थापन बड़ी संख्या में हुआ था।” — प्रेमसागर
इतिहास यहाँ किताबों में नहीं मिलता। वह लोगों की बातचीत में बिखरा रहता है। कोई चलते-चलते एक वाक्य कह देता है और उसके पीछे सदियों की धूल उड़ती दिखने लगती है।
दोपहर में अन्नक्षेत्र में दो परिक्रमावासियों में झगड़ा हो गया — सत्तर वर्ष के जीवनलाल और पचहत्तर के भगवानलाल। दोनों चचेरे भाई। दोनों ने ओंकारेश्वर से परिक्रमा शुरू की थी। यहाँ आते-आते दोनों में कहा-सुनी हो गई।
जीवनलाल विदिशा जिले के अपने गाँव से शायद ही कभी बाहर निकले थे। खेती-बारी और गाँव के छोटे दायरे में ही पूरी जिंदगी बीती। नर्मदा परिक्रमा उनके लिये पर्यटन नहीं थी — एक धार्मिक इच्छा थी। बुढ़ापे में एक बार माँ नर्मदा के किनारे-किनारे चल लेना। इसी भरोसे वे भगवानलाल के साथ हो लिये थे।
भगवानलाल रास्ते जानते हैं, लोगों से बात करना जानते हैं, कहाँ रुकना है, कहाँ मुड़ना है — यह सब सम्भाल लेते हैं। जीवनलाल उनके पीछे-पीछे चलते हैं। दोनों का सामान भी वही साइकिल पर ढोते हैं। रास्ते का खर्च भी वही करते हैं। पर बदले में डाँट, झिड़की और ताने भी लगातार सुनते रहते हैं।
यहाँ आते-आते शायद बात कुछ ज्यादा बढ़ गई थी। भगवानलाल छोड़ कर चले जाने की धमकी दे रहे थे। जीवनलाल चुपचाप सुन रहे थे। उनकी चुप्पी में विरोध कम, असहायता ज्यादा थी — जैसे उन्हें सचमुच लगता हो कि गलती उन्हीं की है।
भगवानलाल की शिकायत थी कि जीवनलाल के कारण रात भर सो नहीं पाये।
“क्या किया उन्होंने?” — प्रेमसागर ने पूछा।
“कुछ नहीं। यहाँ मच्छर बहुत हैं। करवट बदलते रहे।”
जीवनलाल बगल में बैठे रहे। सिर झुकाये। जैसे मच्छरों के पैदा होने में भी कहीं न कहीं उनका ही दोष हो।
प्रेमसागर ने बीच-बचाव किया। भगवानलाल को कड़ाई से समझाया भी। तब जाकर मामला कुछ शांत हुआ। दोनों शाम तक आगे निकल गये। जाते-जाते जीवनलाल ने धीरे से कहा —
“महराज जी, आपने अच्छा किया। आग पर पानी डाल दिया।”
परिक्रमा केवल नदी के किनारे चलना नहीं है। आदमी अपना स्वभाव, अपना अहंकार, अपनी आदतें और अपनी कमजोरियाँ साथ लेकर चलता है। कहीं वे दबे रहते हैं, कहीं उफन कर बाहर आ जाते हैं।
प्रेमसागर ने बताया — अभी इलाके में ककड़ी, खीरा और तरबूज खूब बोया गया है।
28 मई
कहानी तक दंड यात्रा पहुँच गई है। कहानी कोई कथा नहीं — जगह का नाम है।
कल डेरा मेहता से उठ जायेगा। अगला पड़ाव कहाँ होगा और किसके यहाँ — यह अभी तय नहीं है। मुकेश ठाकुर जी अपने घर बुला रहे हैं। वन विभाग के एसडीओ साहब पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में ठहराने की बात कर रहे हैं।
बीते रोज धर्मेंद्र पटेल जी ने दोपहर का भोजन कराया। उनके, उनकी पत्नी जी और माता-पिताजी और लड़के के साथ चित्र भेजे। एक चित्र में धर्मेंद्र जी पाँव छू रहे हैं। दंड यात्री का ओहदा सामान्य परकम्मावासी से दस गुना ज्यादा होता ही होगा। उसी ओहदे का भाव दिखा चित्र में।
गर्मी तो पहले जैसी ही है, पर उमस बढ़ गई है। अन्नक्षेत्र के श्रद्धालुओं ने कूलर का इंतजाम कर दिया है, पर वह अब अप्रभावी-सा लगता है। पसीना सूखता ही नहीं। जमीन पर बिछा बिस्तर तक नम महसूस होता है।

दंड भर कर लौटते समय बगल के गाँव दरोट कलाँ के साहू जी ने प्रेमसागर को रोका। उनका नया घर बना है। भागवत कथा रखी गई है। हाथ जोड़ कर आग्रह किया — प्रेमसागर कथा सुनने आयेंगे तो उनका मान बढ़ जायेगा।
दरोट के ही तिवारी जी व्यासपीठ पर हैं। नौजवान हैं। रहते जबलपुर के ग्वारीघाट में हैं। कथा-पुराण का व्यवसाय गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक फलता-फूलता है।
“एक खास बात हो रही है, भईया। पूरे परिक्रमा मार्ग पर हर बीस किलोमीटर पर सरकार धर्मशालाएँ बनवाने जा रही है। रहने, भोजन और सोलर बिजली की व्यवस्था होगी। हर धर्मशाला का बजट सत्तर लाख रुपये है।” — प्रेमसागर
सुबह आठ बजे तक ही उमस और गर्मी दंड भरना कठिन बना देती है।
“आप तो बनारस के पास हैं भईया। आप ही बाबा विश्वनाथ से कहिए कि गर्मी थोड़ी कम कर दें।” — प्रेमसागर
काशी विश्वनाथ से भौगोलिक निकटता यदि बाबा तक अर्जी पहुँचाने की सुविधा देती, तो वहाँ के पंडा-पुजारियों का क्या जलवा होता।
वैसे जलवा तो नर्मदा माई का होना चाहिए, पर इस समय यह इलाका नर्मदा से अधिक बरगी के ड्रेगन के प्रभाव में लगता है। जहाँ प्रेमसागर हैं, वहाँ से ठीक उत्तर में लगभग चौंतीस किलोमीटर दूर बरगी के उस ड्रेगन का मुँह है — जो लगातार आग उगल रहा है। उमस और गर्मी शायद उसी की फुँफकार और लपटों का असर हैं।
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