किंडलियों की दुनिया


उनकी किताबों की अलमारी दिखती नहीं—क्योंकि होती ही नहीं। सोशल मीडिया पर एक अलग ही किस्म का साहित्यिक उत्सव चलता रहता है। कोई किताबों के मेले की तस्वीर डालता है, कोई लिटरेरी फेस्टिवल के मंच की, कोई अपनी हाल ही में खरीदी गई हार्डबाउंड किताबों की करीने से सजी हुई फोटो। लगता है— किताबें अक्सरContinue reading “किंडलियों की दुनिया”

इकराम अंसारी


वह आदमी दुबला सा, गौरैया जैसा था। ओरोंथोलॉजिस्ट सलीम अली की तरह— शांत, पर्यवेक्षक। स्पेंसर्स के सुपर बाजार में अपनी बुर्का पहने पत्नी के साथ। ट्रॉली नहीं लिये था, एक बास्केट में थोड़ा सामान लेने आये थे दंपति। मेरी ओर देखा तो मैने कह दिया – आपकी पर्सनालिटी बहुत आकर्षक लग रही है।” वे मुस्कुराए,Continue reading “इकराम अंसारी”

पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये


इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है। हमारे घर में, हर सुबह आँगन में बिखरे फीके नमकीन पर जो दृश्य बनता है, वह प्रकृति का खेल नहीं लगता, एक छोटा-सा समाज लगता है। कौव्वे तेज़ी से आते हैं, तेज़ी से खाते हैं और ज़्यादा लेContinue reading “पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये”

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