“मैं अपने काम के सिलसिले में जर्मनी या अमेरिका में होता था। सर्दियों (जनवरी-फरवरी) में वहां सूरज कम ही दिखते थे। जब दिखते थे तो हृदय की गहराई में अनुभूति होती थी कि जैसे कोई मेरे घर-गांव से खबर ले कर आया हो! सूरज वही होते थे, जो मुझे अपने घर के पास मिलते थे।” – सूर्यमणि तिवारी
Author Archives: Gyan Dutt Pandey
मुझे क्या पढ़ना, देखना या सुनना चाहिये?
पढ़ने, देखने या सुनने के इतने विकल्प जीवन में पहले कभी नहीं थे। अब टेलीवीजन का महत्व खत्म हो गया है। जो कुछ है वह मोबाइल या टैब पर है। जब लिखना होता है तब टैब या लैपटॉप पर जाना ठीक लगता है। उसके लिये कभी कभी लगता है कि विण्डोज वाले लैपटॉप की बजायContinue reading “मुझे क्या पढ़ना, देखना या सुनना चाहिये?”
मध्यकाल से लोग कलात्मकता को नकारते रहे हैं इस इलाके में
मध्य काल में औरतों को पर्दे में बंद कर इस गांगेय प्रदेश ने जीवन के कला बोध भोथरे कर दिये हैं। आदमी भी वैसे ही हो गए हैं – चिरकुट।
