दीनानाथ की मेहरारू


घर गांव में उनसे उम्रदराज लोग जा चुके। अब वे ही हैं। ऐसा कहने में उनके स्वर में बहुत दुख का भाव नहीं आया। यूं बताया कि वह एक सत्य का वर्णन हो। जीवन की गति और नश्वरता सम्भवत उन्होने स्वीकार कर ली है।

वर्षा – ग्रेजुयेट चायवाली


मेरे पास और रुक कर वर्षा से बातचीत करने का अवसर नहीं था। अन्यथा बहुत से प्रश्न मन में थे। पति क्या करते हैं? बच्चे कितने बड़े हो गये हैं। घर का रहन सहन, स्तर कैसा है। आदतें मध्यवर्गीय हैं या वर्किंग क्लास की?…

टेक-फ्यूडलिज्म,चैटजीपीटी और स्पीचीफाई


साम्यवाद तारतार हो गया मेरे जीवन के दौरान। समाजवाद (भारत में) परिवारवाद मात्र बन कर रह गया है। पूंजीवाद क्या इसी तरह खत्म हो कर टेक-सामंतवाद को इलाका सौंप दे देगा? आगे क्या होगा, समय ही बतायेगा।

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