गर्दभ अहो रूपम – अहो ध्वनि! (यह मेरी 25 फरवरी 2007 की एक शुरुआती पोस्ट का लिंक है।) आप रूप का बखान करें या ध्वनि का। विकल्प आपके पास है। इतना समय हो गया, पाठक जस के तस हैं हिन्दी ब्लॉगरी के। वही जो एक दूसरे को रूपम! ध्वनि!! करते रहते हैं। महाजाल वाले सुरेशContinue reading “गधा और ऊँट – च्वाइस इज़ योर्स”
Category Archives: आत्मविकास
यह ब्लडी पसन्दगी की जरूरत
अजीब बात है; पोस्ट लिखने पर वाह-वाह की टिप्पणियों की चाह चाह नहीं जरूरत बन गयी है और कब बनी, पता न चला। चाह और जरूरत में अंतर है। यह दुष्ट सेल्फ-अप्रूवल सीकिंग मन सड़ल्ला है। बड़ी जल्दी कमजोर बन जाता है। चाह को जरूरत (want को need) में बदल देता है। हमारे नेताओं में;Continue reading “यह ब्लडी पसन्दगी की जरूरत”
विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 2.
अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैने पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसके पहले भाग का अनुवाद कल प्रस्तुत किया था। (आप कड़ी के लिये मेरीContinue reading “विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 2.”
