हैं कहीं बोधिसत्व!


काशी तो शाश्वत है। वह काशी का राजा नहीं रहा होगा। वरुणा के उस पार तब जंगल रहे होंगे। उसके आसपास ही छोटा-मोटा राजा रहा होगा वह। बहुत काम नहीं था उस राजा के पास। हर रोज सैनिकों के साथ आखेट को जाता था। जंगल में हिंसक पशु नहीं थे। सो हिरण बहुत थे। वहContinue reading “हैं कहीं बोधिसत्व!”

पूर्वाग्रह, जड़ता और मौज की बाईपास


अनूप शुक्ल का कहना है कि हमें मौज लेना नहीं आता। यह बात बहुत समय से मन में खटक रही है। बात तो सही है। पर अपनी समस्या क्या है? समस्या पता हो तो निदान हो। जिन्दगी को लेकर क्यों है इतनी रिजिडिटी (जड़ता)? क्यों हैं इतने पूर्वाग्रह (prejudices)? यह हमारे साथ ही ज्यादा हैContinue reading “पूर्वाग्रह, जड़ता और मौज की बाईपास”

मॉथ मनोवृत्ति वाला प्रबन्धन


मै‍, अपनी दैनिक ड्यूटी के तहद अपने महाप्रबन्धक महोदय के पास सवेरे साढ़े दस बजे जाता हूं। वहां रोज की मालगाड़ी परिवहन पर रिव्यू होता है और कुछ सामान्य बातचीत। शुक्रवार को मैने चलते चलते कहा – “हम आज लदान के लिये एक बीटीपीएन रेक (नेफ्था/पेट्रोल/डीजल के लदान के ४८ टैंक वैगन की मालगाड़ी) बढ़ानेContinue reading “मॉथ मनोवृत्ति वाला प्रबन्धन”

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