लोग जैसा सोचते हैं वैसा हो तो न जाने कितना बेहतर हो जाये यह समाज, यह देश। अपनी सोच या अपने लेखन में जितना आदर्श दिखाते हैं हम, वह अगर कार्य रूप में परिणत हो रहा हो तो न जाने कितनी तेज तरक्की कर जाये मानवता। भले ही हम धुर समाजवादी, साम्यवादी या पूंजीवादी (या किसीContinue reading “आदर्शवाद और आदर्श का बाजार”
Category Archives: आत्मविकास
एक और अंगुलिमाल
स्वामी जगदात्मानन्द ने कन्नड़ भाषा में युवकों को नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की तरफ आकर्षित करने को एक पुस्तक लिखी थी। उसका अन्य भाषाओं में अनुवाद छपा। उनकी इस पुस्तक “जीना सीखो” को अद्वैत आश्रम, कोलकाता ने छापा है। उस पुस्तक में एक प्रसंग एक ऐसे किशोर और ऐसे फादर का है जो हमें बताताContinue reading “एक और अंगुलिमाल”
उच्च साधकों की निश्छलता की याद
यह रीता पाण्डेय की पारिवारिक पोस्ट है। इसका टाइपिंग भर मेरा है। अनूप शुक्ल जी को स्पष्ट करता हूं कि इसमें मेरा टाइपिंग और चित्र संयोजन के अलावा कोई योगदान नहीं है। :-) ज्ञान की पोस्ट “महेश चन्द्र जी से मुलाकात” में पंकज अवधिया जी टिप्पणी में कहते हैं कि महेश जी अगर निश्छल मनContinue reading “उच्च साधकों की निश्छलता की याद”
