काली कोयल, जिसे स्त्रीलिंग का सम्बोधन भारतीय साहित्य में मिलता है, वह असल में नर कोयल है। मादा कोयल तो यह भूरी, चितकबरी पक्षी है। बेचारी! इसका उल्लेख किसी ने न किया। साहित्यकारों का ऑब्जर्वेशन और सौंदर्यबोध अजीब ही है।
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रात भर डीजे बजेगा – लवण्डिया लंदन से …
हम घर में सो रहे होंगे तभी बैंड बाजा और आतिशबाजी शुरू होगी। रात भर डीजे बजता रहेगा। भोजपुरी श्लीलाश्लील गाने बजेंगे। अरहर के खेत की रास लीला की चर्चा वाला गीत बार बार बजेगा। यह वाला गाना भी बार बार आयेगा – लवण्डिया लंदन से लायेंगे, रात भर डीजे बजायेंगे।
आखिर सुंदरलाल आ ही गये!
“हां, भीड़ त रही। लहाई क बैठि ग रहे।” सुंदर साठ से ज्यादा उम्र का है। लम्बी दूरी की ट्रेन में, बिना आरक्षण की बोगी जिसमें लोग ठुंसे रहते हैं, उसमें भीड़ उसके लिये कोई बहुत असुविधा की बात नहीं है।
