उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार


“नहीं भईया, नागा लोगों का दिया धन पचाना आसान बात नहीं है। मेरे मना करने पर भी पचास रुपया और दिये नागा बाबा। … कपड़ा-लंगोट कुछ नहीं पहने थे। बस एक गमछा लपेट लिये थे लोगों के सामने आने के समय।”

कुछ और चलें – गाडरवारा से उदयपुरा


मुझे अपनी दशा सम्पाती की तरह लगी। वह और किसी प्रकार से वानरों की सहायता नहीं कर सकता था। वह केवल यह देख सकता था कि लंका कितनी दूर है और सीता कहां पर हैं। मैं भी केवल यह बता सकता था कि प्रेमसागर का गंतव्य कितना दूर है।

गाडरवारा, खपरैल, मनीष तिवारी और नदियां


मनीष बताते हैं कि ये नदियां – और कई नदियां हैं जो नर्मदा माई में जा कर मिल जाती हैं – उनके बचपन में सदानीरा हुआ करती थीं। …अब उनमें में गर्मियों में पानी नहीं रहता; रेत रहती है।

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