“मेरा कौन पढ़ेगा” : गौरव श्रीवास्तव से मुलाकात


गौरव श्रीवास्तव पढ़ाकू जीव हैं। मोतीलाल नेहरू टेक्नॉलॉजी संस्थान के डॉक्टरेट के रिसर्च स्कॉलर। संकोची व्यक्ति। वे इस ब्लॉग के नियमित पाठक हैं। यहीं पास में उनका कार्य क्षेत्र है – मेरे घर से डेढ़ किलोमीटर दूर। पर मुझसे कभी मिले नहीं। जब उन्हे पता चला कि मैं यहां से गोरखपुर स्थानान्तरण पर जा रहाContinue reading ““मेरा कौन पढ़ेगा” : गौरव श्रीवास्तव से मुलाकात”

ब्रॉडबैण्ड, बाटी-चोखा और चालू चाय


मैं अपने घर और अपने मोबाइल के लिये ब्रॉडबैण्ड/वाईफाई/इण्टरनेट की सुविधा की तलाश में बीएसएनएल दफ्तर के पास घूम रहा था। मेरे साथ थे मेरे सहकर्मी राजेश। सड़क के किनारे 2जी/3जी सिम बेचने वाले यूं बैठे थे, जैसे चना-चबैना बेचने वाले बैठे हों। यह सोच कर कि कहीं ये फर्जी नाम से सिम न टिकाContinue reading “ब्रॉडबैण्ड, बाटी-चोखा और चालू चाय”

“बाबूजी, हम छोटे आदमी हैं, तो क्या?”


फाफामऊ से चन्द्रशेखर आजाद सेतु को जाती सड़क के किनारे चार पांच झोंपड़ी नुमा दुकाने हैं। बांस, बल्ली, खपच्ची, टाट, तिरपाल, टीन के बेतरतीब पतरे, पुरानी साड़ी और सुतली से बनी झोंपड़ियां। उनके अन्दर लड़के बच्चे, पिलवा, टीवी, आलमारी, तख्त, माचा, बरतन, रसोई, अंगीठी और दुकान का सामान – सब होता है। लोग उनमें रहतेContinue reading ““बाबूजी, हम छोटे आदमी हैं, तो क्या?””

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