घाट पर सनिचरा नहीं था


आज सवेरे सब यथावत था। सूरज भी समय पर उगे। घूमने वाले भी थे। घाट पर गंगाजी में पानी कुछ बढ़ा हुआ था। वह भैंसासुर की अर्ध-विसर्जित प्रतिमा पानी बढ़ने के कारण पानी में लोट गई थी। किनारे पर पण्डा यथावत संकल्प करा रहे थे कार्तिक मास का। पास में सनीचरा रहता था कऊड़ा जलाये।Continue reading “घाट पर सनिचरा नहीं था”

सिविल सर्विसेज़ का बदलता स्वरूप – श्री विवेक सहाय से मुलाकात का जिक्र


पिछले दिनों भारतीय नौकरशाही में हो रहे चरित्रगत परिवर्तनों के बारे में अहसास के दो अवसर मेरे समक्ष आये। एक था, फॉर्ब्स इण्डिया पत्रिका में एक पुस्तक की समीक्षा पढ़ने के रूप में और दूसरा था, हाल ही में रिटायर हुये रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष श्री विवेक सहाय से मुलाकात के रूप में। मैं दोनोContinue reading “सिविल सर्विसेज़ का बदलता स्वरूप – श्री विवेक सहाय से मुलाकात का जिक्र”

कुम्हार और मिट्टी के दीये


मेरे दफ्तर जाने के रास्ते में तेलियरगंज के बाद चार पांच घर कुम्हारों के हैं। बरसात के महीनों में उनकी गतिविधियां ठप सी थीं। अब देखता हूं कि बहुत व्यस्त हो गये हैं वे। तन्दूर, गुल्लक, मटके आदि बनाने का काम तो सतत चलता है, पर इस समय दीपावली आने वाली है, सो दिये बनानेContinue reading “कुम्हार और मिट्टी के दीये”

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free