लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग


श्रीश पाठक “प्रखर” का अभियोग है कि मेरी टिप्पणी लेकॉनिक (laconic) होती हैं। पर मैं बहुधा यह सोचता रहता हूं कि काश अपने शब्द कम कर पाता! बहुत बार लगता है कि मौन शब्दों से ज्यादा सक्षम है और सार्थक भी। अगर आप अपने शब्द खोलें तो विचारों (और शब्दों) की गरीबी झांकने लगती है।Continue reading “लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग”

शराब पर सीरियस सोच


प्रवीण जिस शराब के गंगा की रेती में दबाये जाने की बात कर रहे हैं, वह शायद अंग्रेजी शराब है। यहां शिवकुटी के माल्या-प्वाइण्ट पर डालडा के पीपों में शराब बनती/रेत में गाड़ी जाती और फिर नाव से ले जाई जाती है। यह चित्र बोरी से ढके कुछ पीपों का है जो नाव के पार्कContinue reading “शराब पर सीरियस सोच”

तारेक और मिचेल सलाही


हम ठहरे घोंघा! सेलिब्रिटी बन न पाये तो किसी सेलिब्रिटी से मिलने का मन ही नहीं होता। किसी समारोह में जाने का मन नहीं होता। कितने लोग होंगे जो फलानी चोपड़ा या  ढ़िकानी सावन्त के साथ फोटो खिंचने में खजाना नौछावर कर दें। हम को वह समझ में नहीं आता! क्या बतायें; सेलियुग (सेलिब्रिटी-युग, कलियुगContinue reading “तारेक और मिचेल सलाही”

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