सपाटा और सन्नाटा


ज्ञाता कहते हैं कि विश्व सपाट हो गया है। न केवल सपाट हो गया है अपितु सिकुड़ भी गया है। सूचना और विचारों का आदान प्रदान सरलतम स्थिति में पहुँच गया है। अब सबके पास वह सब कुछ उपलब्ध है जिससे वह कुछ भी बन सकता है। जहाँ हमारी सोच को विविधता दी नयी दिशाओंContinue reading “सपाटा और सन्नाटा”

उत्क्रमित प्रव्रजन


मेरा वाहन चालक यहां से एक-सवा घण्टे की दूरी से सवेरे अपने गांव से आता है। देर रात को वापस लौटता है। लगता है अगर काम उसको जम जायेगा तो यहीं इलाहाबाद में डेरा जमायेगा। वह प्रथम पीढ़ी का प्रव्रजक होगा। इस शहर में और अन्य शहरों में भी पिछले पचीस तीस साल में गांवोंContinue reading “उत्क्रमित प्रव्रजन”

कहीं धूप तो कहीं छाँव


यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। मैने एक बार अपने एक मित्र से मिलने का समय माँगा तो उन्होने बड़ी गूढ़ बात कह दी। ’यहाँ तो हमेशा व्यस्त रहा जा सकता है और हमेशा खाली।’ मैं सहसा चिन्तन में उतरा गया। ऐसी बात या तो बहुत बड़े मैनेजमेन्ट गुरू कह सकतेContinue reading “कहीं धूप तो कहीं छाँव”

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