चूल्हे का डिजाइन मिनिमलिस्ट है। उसमें दो कतारें हैं ईंटों की। बारह ईंटें जमा कर रखने से चूल्हा बन गया। चूल्हे में दोनो तरफ से लकड़ियांं लगाई गयी हैं। लकड़ियां भी पानी के टंकी बनाने में प्रयुक्त लकड़ी-बल्ली है।
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लघुभ्रमणिका
आगे भगवानपुर की ओर कोहरे की एक पट्टी नजर आती है। मानो सलेटी रंग का कोई बहुत मोटा अजगर जमीन पर लेटा और धीरे धीरे रेंग रहा हो। उसके पीछे सूर्योदय हो चुका है। पर उनका ताप कोहरे के अजगर को खतम नहीं कर सका है।
राजमणि राय और उम्र का एकाकीपन
उनकी बातों से लगा कि वे मेरी सिम्पैथी चाहते हैं पर अकेले जीने में बहुत बेचारगी का भाव नहीं है। राजमणि ने अकेले जिंदगी गुजारने के कुछ सार्थक सूत्र जरूर खोज-बुन लिये होंगे। इन सज्जन से भविष्य में मिलना कुछ न कुछ सीखने को देगा।
