आलू और कोल्डस्टोरेज


तेलियरगंज, इलाहाबाद में एक कोल्ड स्टोरेज है। उसके बाहर लम्बी कतारें लग रही हैं आलू से लदे ट्रकों-ट्रैक्टरों की। धूप मे‍ जाने कितनी देर वे इन्तजार करते होंगे। कभी कभी मुझे लगता है कि घण्टो‍ नहीं, दिनों तक प्रतीक्षा करते हैं। आलू की क्वालिटी तो प्रतीक्षा करते करते ही स्टोरेज से पहले डाउन हो जातीContinue reading “आलू और कोल्डस्टोरेज”

विदर्भ: मैं विक्तोर फ्रेंकल पर लौटना चाहूंगा


आठ महीने से अधिक हुये मैने विक्तोर फ्रेंकल के बारे में पोस्ट लिखी थी: विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद और जीवन के अर्थ की खोज अब जब विदर्भ की आत्महत्याओं नें मन व्यथित किया है, तब इस पोस्ट की पुन: याद आ रही है। विदर्भ की समस्या वैसी ही जटिल है जसे नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प कीContinue reading “विदर्भ: मैं विक्तोर फ्रेंकल पर लौटना चाहूंगा”

विदर्भ की आत्महत्याओं का तोड़ (वाकई?)


मुझे झेंप आती है कि मेरे पास विदर्भ की समस्या का कोई, बेकार सा ही सही, समाधान नहीं है। वैसे बहुत विद्वता पूर्ण कहने-लिखने वालों के पास भी नहीं है। सरकार के पास तो नहियंई है। वह तो मात्र कर्ज माफी का पेड़ लगा कर वोट के फल तोड़ना चाहती है। हमारे साथी अधिकारी श्रीयुतContinue reading “विदर्भ की आत्महत्याओं का तोड़ (वाकई?)”

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