घोड़मुतवा


कई शब्द नितांत पारिवारिक होते हैं। विवेक शानभाग का एक नॉवेल्ला है – घाचर घोचर। मुझे यह पसंद है क्यूं कि इसमें वातावरण नितांत निम्न मध्यवर्ग से शुरू होता है। बहुत कुछ वैसा जिससे अपने को मैं जोड़ पाता हूं। घाचर घोचर किसी डिक्शनरी में नहीं मिलेगा। कन्नड़ भाषाकोश में भी नहीं। अब शायद इसContinue reading “घोड़मुतवा”

आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3


आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3 : तहरी, त्रिपुंडी और चितलंगिया का दालान नीलकंठ की ई-मेल समय पर थी। छ बजे सवेरे। वह ज्यों का त्यौं नीचे है – सवेरे नींद एकदम समय पर टूटी — चार बजे। यह अजीब है कि बाहर खुले में नींद पहले से बेहतर आती है। मन भी हल्का थाContinue reading “आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा — दिन 3”

वनतुलसी की गंध, बांस का पुल, बघेरे की आहट और गेंहुअन का भय


नीलकंठ की आर्मचेयर नर्मदा परिक्रमा दिन 2 सवेरे आंख खुली तो सब कुछ चुप था। रात की जद्दोदहद याद आई। रात में बांई ओर नर्मदा की धारा थी, और दाहिने – मच्छरों का मोर्चा। टॉर्च की रौशनी में ओडोमॉस की ट्यूब निकाल मैने उसे सारे खुले अंगों पर मला था। तब जब मच्छरों ने युद्धविरामContinue reading “वनतुलसी की गंध, बांस का पुल, बघेरे की आहट और गेंहुअन का भय”

Design a site like this with WordPress.com
Get started