पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता — एक ऑबिच्युरी से उपजा आत्मसंवाद


एक सज्जन ने मुझे फोन किया। “जीडी, तुमने अमर उजाला देखा? सबसे ऊपर एक छोटे से कस्बा नुमा शहर के आदमी के देहावसान पर पूरे पेज का विज्ञापन है। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि मडीयाहू जैसे कस्बे के आदमी का दस-पंद्रह लाख खर्च कर कोई ऑबीच्यूरी छपायेगा।” अमर उजाला मेरे घर आताContinue reading “पूर्वांचल की ग्रे नैतिकता — एक ऑबिच्युरी से उपजा आत्मसंवाद”

मुन्ना पांडे की प्रसन्नता और मेरा आईना


संभव है कि नागपुर पहुँचते-पहुँचते मैं यह तय कर पाऊँ कि कौन ज़्यादा संतुलित जीवन जी रहा है—
मुन्ना पांडे या मैं। मैं आईने में खुद को निहारता हूं। पर शायद मैं खुद को नहीं, मुन्ना पांडे सरीखे को देखना चाहता हूं।

आवअ तनी अरटियावा जाये गुरू!


मैने कोविड के दौरान चीनी महिला फैंग फैंग की वूहान डायरी पढ़ी। उसमें वे आपसी संवाद के लिये वीचैट की चर्चा जब तब करती हैं। वीचैट बहुधा उनकी चैट मॉडरेट कर उतार दिया करता था। पर फिर भी मुझे लगता था कि चीन के पास अपना चैट एप्प है और भारत के पास नहीं। उसमेंContinue reading “आवअ तनी अरटियावा जाये गुरू!”

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